Oct १७, २०२१ १३:२७ Asia/Kolkata
  • ईरान की इस्लामी व्यवस्था को गिराना बेहद कठिन, ईरान सोवियत संघ नहीं, अपना रवैया बदले अमरीकाः जान हापकिन्ज़ विश्वविद्यालय

अमरीका के जान हापकिन्ज़ विश्वविद्यालय ने अपनी एक रिपोर्ट में अमरीकी सरकार की ग़लत नीतियों की समीक्षा करते हुए ईरान की इस्लामी लोकतंत्रिक व्यवस्था के मज़बूत जनाधार और जनसमर्थन की बात स्वीकार की है।

युनिवर्सिटी की इंटरनैश्नल स्टडीज़ फ़ैकेल्टी ने अपनी रिपोर्ट में अमरीकी नीति निर्धारकों को दस बुनियादी बिंदुओं के बारे में बताया है और उन्हें कुछ सुझाव दिए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान अन्य देशों की तुलना में जहां क्रांतियां आई हैं बिल्कुल अलग तरह की क्षमताएं रखता है, ईरान की व्यवस्था के पास यह ताक़त है कि समाज के अलग अलग वर्गों के महत्वपूर्ण हिस्सों को हमेशा अपने साथ रखे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान की सरकार के पास एसे दिमाग़ हैं जो विदेशी और गृह नीतियों को राष्ट्रीय हितों और शासन की रक्षा के आधार पर तय करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ईरान का समाज और राजनीति ईरानी राष्ट्रवाद को मज़बूत करने की दिशा में आगे बढ़ा है जिसकी वजह से समाज के भीतर शासन व्यवस्था का जनाधार बहुत व्यापक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय ईरान और अमरीका के संबंधों में जिस तरह की जटिलताएं हैं वह उभरती क्षेत्रीय ताक़त के साथ अमरीका जैसे देश के संबंधों में हरगिज़ नहीं होनी चाहिएं। पूर्व सोवियत युनियन के बारे में अपनाई गई नीतियों को उदाहरण बनाना न तो उचित है न ही यथार्थवादी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रम्प शासनकाल में अधिकतम दबाव की नीति अपनाई गई और जनरल क़ासिम सुलैमानी और डाक्टर फ़ख़्रीज़ादे की हत्या कर दी गई मगर इससे न तो ईरान की क्षेत्रीय नीतियों में बदलाव आया और न ही ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों को सीमित किया।

रिपोर्ट में अमरीकी अधिकारियों से कहा गया है कि अब जब सैयद इब्राहीम रईसी ईरान के राष्ट्रपति बन गए हैं तो अमरीका के पास वार्ता और समझौते का बहुत अच्छा अवसर है क्योंकि वह सिस्टम की अंदरूनी तहों से निकलकर आए हैं और उनका संबंध उस धड़े से है जो ईरान की विदेश एवं सुरक्षा नीतियों को निर्धारित करता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीका अगर परमाणु समझौते में लौटता है लेकिन ईरान और यूरोप के बीच व्यापार का प्रभावी मेकैनिज़्म न हो तो इसका सारा फ़ायदा चीन को होगा।

रिपोर्ट में ज़ोर देकर कहा गया है कि अमरीका बहुत तवज्जो से यूरोपीय घटकों और चीन और रूस से समन्वय स्थापित करे, अगर ईरान के नर्मी दिखाने के बावजूद अमरीका परमाणु समझौते में नहीं लौटता तो निश्चित रूप से ईरान के साथ चीन और रूस का आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ेगा।

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