Oct २०, २०२१ १६:१० Asia/Kolkata

ईरान के विदेशमंत्री ने इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी के महासचिव से टेलीफोनी वार्ता में इस संगठन के सदस्य देशों द्वारा अफगानिस्तान के हालिया आतंकवादी हमलों की भर्त्सना की मांग की है।

इसी संबंध में विदेशमंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान ने राष्ट्रसंघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरस से भी टेलीफोन पर वार्ता की और अफगानिस्तान की स्थिति पर चिंता जताई। साथ ही विदेशमंत्री ने राष्ट्रसंघ के महासचिव से अफगानिस्तान में आतंकवाद से मुकाबले के संबंध में तुरंत क़दम उठाये जाने की मांग की।  

दो दशकों से अधिक समय तक अफगानिस्तान के लोगों को अमेरिका की युद्धप्रेमी कार्यवाहियों व नीतियों का सामना रहा है और अब अफगानिस्तान के लोगों को दाइश की आतंकवादी कार्यवाहियों व अपराधों का सामना है। रोचक बात यह है कि अमेरिका के समर्थन से इस आतंकवादी गुट के तत्वों ने अफ़गानिस्तान में प्रवेश किया है। दाइश ने शिया- सुन्नी मुसलमानों के मध्य फूट डालने के लक्ष्य से हालिया कुछ महीनों के दौरान शियों और उनकी मस्जिदों को लक्ष्य बनाया है।

अभी पिछले शुक्रवार को अफगानिस्तान के कंदहार में "इमाम बारगाह फातिया" नामक मस्जिद में बम का भीषण धमाका हुआ था जिसमें चालिस से अधिक लोग हताहत और 70 लोग घायल हुए थे। अफगानिस्तान की सत्ता की बागडोर संभालने के दूसरे सप्ताह में काबुल में भीषण बम धमाका हुआ था जिसमें लगभग 200 लोग मारे गये थे। मरने वालों में कई महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। कुछ हफ्ते पहले भी ईदगाह नामक मस्जिद के समीप बम का भीषण धमाका हुआ था जिसमें आठ व्यक्ति हताहत और 20 दूसरे घायल हुए थे। लगभग 12 दिन पहले अफगानिस्तान के कुन्दूज़ प्रांत के "सैयदाबाद" नामक मस्जिद में जो भीषण बम धमाका हुआ था उसमें 46 लोग मारे गये थे। उस विस्फोट की ज़िम्मेदारी आतंकवादी गुट दाइश ने स्वीकार की थी।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने इन अपराधों की भर्त्सना करते हुए आतंकवादी हमलों के प्रति चिंता जताई है।

दाइश की आतंकवादी गतिविधियों और हमलों से मुकाबले में तालेबान की अस्थाई सरकार की विफलता और इन आतंकवादी हमलों का जारी रहना एक बुनियादी समस्या है और इसके बारे में गम्भीर दृष्टिकोण अपनाये जाने की ज़रूरत है।

यहां एक बात का उल्लेख ज़रूरी है और वह यह है कि इस्लामी जगत और इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी की ज़िम्मेदारी है और ओआईसी के पास जो क्षमतायें व संभावनायें हैं उसके दृष्टिगत आतंकवाद और आतंकवादी गुटों से मुकाबले में उसने प्रभावी कार्यवाही नहीं की है।

सारांश यह है कि वर्ष 2001 में अमेरिका ने अलकायदा से मुकाबला करने और अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के बहाने हमला करके उस पर अतिग्रहण कर लिया था और 20 वर्षों तक अमेरिकी और नैटो के सैनिक अफगानिस्तान में मौजूद रहे परंतु वहां न तो शांति स्थापित हुई और न ही वहां से आतंकवादी तत्वों का सफाया हुआ।

बहरहाल अब अफगानिस्तान से अमेरिकी और विदेशी सैनिक जा चुके हैं और अफगान जनता व लोग अपने देश से विदेशी सैनिकों के चले जाने से बहुत प्रसन्नत हैं और वे विदेशी सैनिकों के चले जाने को समस्याओं के समाधान की दिशा में आरंभिक कदम के रूप में देख रहे हैं। MM

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