Dec ०८, २०२१ १९:४५ Asia/Kolkata
  • तेहरान में लगने वाली है अरब नेताओं की लाइन, इमारात के एनएसए ने कर दी शुरुआत, ईरान-इमारात नज़दीकी से क्यों सदमे में है इस्राईल? अरब टीकाकार अतवान का जायज़ा

इस समय जहां अधिकतर अरब देशों में कूटनैतिक शिथिलता छाई हुई है वहीं फ़ार्स की खाड़ी के इलाक़े के अरब देशों की कूटनैतिक गतिविधियों में नई रफ़तार देखने को मिल रही है और इसका केन्द्र ईरान है।

सोमवार से दो बेहद महत्वपूर्ण यात्राएं शुरू हुई हैं जो पूरे इलाक़े की तसवीर बदल सकती हैं। एक यात्रा इमारात के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शैख़ तहनून बिन ज़ायद की है। वह अपने ईरानी समकक्ष अली शमख़ानी की दावत पर तेहरान पहुंचे।

दूसरी यात्रा सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की है जो ठीक इसी समय क्षेत्र की यात्रा शुरू करते हुए ओमान पहुंचे। बिन सलमान इमारात, बहरैन, क़तर और कुवैत की भी यात्राएं कर रहे हैं। ईरान का विषय, ईरान की मिसाइल ताक़त और यमन जंग बिन सलमान की यात्रा के मुख्य विषयों में हैं।

पहली यात्रा की बात की जाए तो इमारात के एनएसए तहनून बिन ज़ायद संधि और समझौते के मास्टरमाइंड कहे जाते हैं। इमारात अब ईरान के सिलसिले में अपनी नीति में बदलाव लाने के मूड में है।

इससे पहले तक इमारात ने अपने घटक देशों के साथ मिलकर ईरान पर लगे प्रतिबंधों को अधिक घातक बनाने की कोशिश की थी मगर यह कोशिशें नाकाम रहीं तो अब ईरान से मतभेद ख़त्म करके सहयोग का रास्ता खोजने की कोशिश शुरू हो गई है।

इमारात ने तो अब मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन और तुर्की से भी अपने मतभेदों को सुलझाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। इमारात के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ायद ने तुर्की की यात्रा में वहां दस अरब डालर के निवेश की बात की। यह तुर्की की इकानोमी को सहारा देने का इशारा है।

इमारात की नीतियों में आने वाले इस बड़े बदलाव के दो मुख्य कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि मुस्लिम ब्रदरहुड की ताक़त पूरे इलाक़े में घटी है, दूसरा कारण इलाक़े से अमरीका का धीरे धीरे अपना बोरिया बिस्तर समेटना है। अब अमरीका का ध्यान रूस और चीन पर केन्द्रित है।

जहां तक बिन सलमान की यात्रा का सवाल है तो यह भी सऊदी अरब की नीतियों में बुनियादी बदलाव की निशानी है। सऊदी अरब का प्रभाव पूरे इलाक़े में घटा है और वह यमन युद्ध से किसी तरह निकल जाना चाहता है। इस विचार के कई कारण हैं।

एक तो यह कि बिन सलमान ने अपनी यात्रा की शुरुआत ओमान से की है जो सऊदी अरब-ईरान मतभेद को सुलझाने में अच्छे मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। बग़दाद में ईरान और सऊदी अरब की वार्ता के बाद अब यह नई कोशिश हो सकती है। हो सकता है कि बिन सलमान टकराव की नीति पूरी तरह छोड़ने का मन बना रहे हों क्योंकि इस नीति की वजह से सऊदी अरब अलग थलग पड़ गया है।

आख़िर में हम यह कहना चाहेंगे कि इन बड़े परिवर्तनों की वजह दो शिकस्तें हैं। एक शिकस्त वह है जो अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका को झेलनी पड़ी है और दूसरी हार वह है जो इस्राईल को ग़ज़्ज़ा युद्ध में झेलनी पड़ी है। जबकि इस बीच ईरान की ताक़त बहुत तेज़ी से बढ़ी है और वह बड़ी क्षेत्रीय शक्ति बन गया है।

फ़ार्स खाड़ी में अरब देशों को यक़ीन हो चुका है कि अमरीका अब सुपर पावर नहीं रहा और न ही इस्राईल के पास इतनी ताक़त है कि उनकी रक्षा कर सके, इसी लिए इस्राईल से समझौतों की प्रक्रिया ठंडी पड़ गई है और ईरान के साथ अरब देशों की नज़दीकी बढ़ रही है।

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