Jan ११, २०२२ ०६:५५ Asia/Kolkata
  • जनाब अबूतालिब अलै. कभी भी ईमान नहीं लाये! क्योंकि...

आदरणीय पाठकों आपने हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम के ईमान के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा होगा पर आज हम इस लेख में कुछ एसी बातें बयान करना चाहते हैं जिसे शायद बहुत कम लोगों ने सुना व पढ़ा होगा।

उस बात को बयान करने से पहले हम बहुत ही संक्षेप में बताना चाहते हैं कि हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम जब तक ज़िन्दा थे उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम स. के लिए जो क़ुर्बानियां दीं हैं वह किसी ने भी नहीं दी हैं। बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि उनकी कुर्बानियों को ध्यान में रखे बिना कुछ नादान मुसलमान उन्हें मुसलमान नहीं समझते हैं और बड़ी आसानी से कह देते हैं कि माअज़ अल्लाह वह काफ़िर थे।

सबसे पहले जब पवित्र कुरआन की आयते इंज़ार नाज़िल हुई तो पैग़म्बरे इस्लाम स. ने बनी अब्दुल मुत्तलिब को बुलाया और हज़रत अबूतालिब से ईमान लाने के बारे में कुछ भी नहीं कहा जबकि महान ईश्वर कह रहा है कि हे पैग़म्बर अपने खानदान वालों को डराइये व बताइये। तो क्या कोई मुसलमान यह कह सकता है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने महान ईश्वर के संदेश को नहीं समझा।

दूसरे शब्दों में खानदान के उन लोगों को बुलाया गया जो काफिर थे और उन सबका मुखिया अबूलहब था। हज़रत अबू तालिब अलै. से ईमान की बात क्यों की जाती? क्योंकि वह जीवन के आरंभ से ही मोमिन थे। पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अबूतालिब से ईमान लाने की बात न करके खुद उनके ईमान की गवाही दे दी।

हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम के ईमान की दूसरी दलील यह है कि अगर कोई पति-पत्नी दोनों काफिर हों और उनमें से कोई एक भी इस्लाम स्वीकार कर ले तो उनका निकाह टूट जाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की मां हज़रत फ़ातेमा बिन्ते असद हैं और उनके मोमिना होने में कोई बहस व संदेह नहीं है। अगर हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम माज़अल्लाह काफिर होते तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम की मां उनसे अलग हो जाती पर फ़ातेमा बिन्ते असद का जीवन भर हज़रत अबूतालिब अलै. के साथ रहना इस बात की दलील है कि हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम मोमिन थे।

हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम के ईमान की एक दलील यह है कि जिस साल पैग़म्बरे इस्लाम स. की धर्मपत्नी हज़रत ख़दीजा सलामुल्लाह अलैहा का स्वर्गवास हुआ उसी साल हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम का भी स्वर्गवास हो गया। पैग़म्बरे इस्लाम इस बात से बहुत दुःखी हुए इस प्रकार से कि उन्होंने हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम के निधन के बाद उस साल का नाम ही आमुल हुज़्न अर्थात दुःखों का साल रख दिया। पैग़म्बरे इस्लाम स. का यह क़दम जहां दोनों हस्तियों के महान स्थान को बयान करता है वहीं यह भी बयान करता है कि पैग़म्बरे इस्लाम इन महान हस्तियों के निधन से बहुत दुःखी थे। क्या पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी मर्ज़ी से दोनों महान हस्तियों ने स्वर्गवास के साल को आमुल हुज़्न का नाम दिया था? जबकि पवित्र कुरआन कह रहा है कि पैग़म्बर अपनी तरफ से बात ही नहीं करते मगर यह कि ईश्वर की ओर से।

हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम के ईमान की इतनी अधिक दलीलें हैं कि उन्हें बयान करने के लिए एक किताब भी कम है। अंत में हम यहां एक और दलील का उल्लेख करते हैं और वह यह कि अगर कोई पंडित बेहतरीन अरबी सीख ले और वह मुसलमान न हो तो कौन मुसलमान उससे निकाह पढ़ाना क़बूल करेगा? कोई भी मुसलमान नहीं। सारे मुसलमान कहेंगे कि पंडित का पढ़ा हुआ निकाह बातिल है। आम मुसलमान एक पंडित से न तो निकाह पढ़वाना चाहता है और न ही उसका पढ़ा हुआ निकाह सही तो आप बताइये कि पैग़म्बरे इस्लाम का निकाह किसने पढ़ा था? शीया- सुन्नी दोनों की किताबों में यह बात मौजूद है कि पैग़म्बरे इस्लाम का निकाह हज़रत अबूतालिब अलैहिस्सलाम ने पढ़ा था।

अब आप इंसाफ़ से बताइये कि क्या पैग़म्बरे इस्लाम स.का निकाह माज़अल्लाह किसी ग़ैर मोमिन ने पढ़ा है? सारांश यह कि ईमान वह लाता है जो पहले बेईमान होता है। असहाबे कहफ़ काफिरों और मूर्तिपूजकों के बीच सालों रहे और कभी भी उन्होंने अपने ईमान का इज़हार नहीं किया तो वे सब मोमिन रहे और किसी भी मुसलमान को उनके ईमान पर न तो कोई संदेह है और न किसी ने कोई सवाल उठाया परंतु इस्लामी जगत के कुछ नादान मुसलमान अशरफुल अंबिया के पालन- पोषण और मदद करने वाले को ग़ैर मुसलमान कहते हैं, कितने अफसोस की बात है। यह कुटिल प्रयास हज़रत अली अलैहस्सलाम के महान स्थान को कम दर्शाने हेतु पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से द्वेष रखने वालों की एक शैतानी चाल है जिसे कोई भी सद्बुद्धि रखने वाला इंसान न तो सहन करेगा और न ही स्वीकार करेगा।

महान व सर्वसमर्थ ईश्वर से प्रार्थना है कि हम सबको अपने ज्ञान का प्रकाश दे और लोक-परलोक में आले मोहम्मद अलै. के साथ महशूर फरमाये। आमीन

नोटः ये व्यक्तिगत विचार हैं। पार्सटूडे का इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं है। MM

 

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