Oct २०, २०१९ १०:३१ Asia/Kolkata
  • ईरान और सऊदी अरब के विवाद की वजह सांप्रदायिकता या कुछ और?

इस्लामी दुनिया में ईरान और सऊदी अरब को दो बड़ी ताक़तों के रूप में देखा जाता है जिनका दूसरे देशों में भी काफ़ी असर है।

क्या यह असर सांप्रदायिक बुनियादों पर है या इसके आधार कुछ और हैं? इस सवाल का जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस्लामी दुनिया के भविष्य की तसवीर की झलक इससे देखी जा सकती है।

क़तर के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता लूलूअ अलख़ातिर ने एक बयान दिया है जिसमें उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि ईरान और अरब देशों के बीच मतभेद की वजह सांप्रदायिक मुद्दे हरगिज़ नहीं हैं। यह इलाक़े में दो बड़े मज़बूत रुजहानों के प्रभाव और पैठ का मामला है। यदि दोनों के बीच कूटनैतिक चैनल स्थापित कर दिए जाएं तो विवादों को हल किया जा सकता है।

अलख़ातिर की यह बात इसलिए सही है कि इस्लामी जगत पर या अरब जगत पर एक नज़र डालकर हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि वही देश जो ईरान को एक शीया देश कहकर उसके साथ अपने मतभेदों का यह कारण पेश कर दिया करते थे आज ख़ुद उन सुन्नी देशों में गहरे आपसी मतभेद हैं। तुर्की शीया देश नहीं है लेकिन उसके साथ सऊदी अरब के मतभेद अपनी चरम सीमा पर पहुंचे हुए हैं।

यमन शीया देश नहीं है लेकिन सऊदी अरब ने इस देश पर युद्ध थोप रखा है। पिछले पांच साल से रियाज़ सरकार ने यमन की ईंट से ईंट बजा दी है। ग़ौरतलब है कि यमन पर हमले करने वाले गठबंधन में शामिल सऊदी अरब और इमारात के बीच आपसी जंग छिड़ गई है जिसे किसी तरह क़ाबू में करने की कोशिश की जा रही है।

दूसरी तरफ़ ईरान को अगर देखा जाए तो जहां सऊदी अरब के साथ ईरान के मतभेद हैं वहीं तुर्की के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं और दोनों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। फ़िलिस्तीनी संगठनों के साथ ईरान के संबंधों का मामला तो इस स्तर तक पहुंच गया है कि इस्राईल के साथ लड़ाई में फ़िलिस्तीनी संगठनों ने ईरान की मदद से शक्ति के संतुलन में बदलाव लाना शुरू कर दिया है। आज फ़िलिस्तीनी संगठन इस्राईल पर वह हमले कर रहे हैं जिनसे नेतनयाहू जैसे कट्टरपंथी लोग कोई भी झड़प शुरू होते ही सबसे पहले संघर्ष विराम की कोशिश में लग जाते हैं।

सवाल यह है कि जब सांप्रदायिकता इस विवाद की वजह नहीं तो असली वजह क्या है? असली वजह है साम्राज्यवादी शक्तियों के बारे में नज़रिया। इस्लामी गणतंत्र ईरान वह देश है जो साम्राज्यवादी शक्तियों की नीतियों और योजनाओं के ख़िलाफ़ लड़ रहा है। यह लड़ाई अब इतनी आगे पहुंच चुकी है कि साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए पश्चिमी एशिया के इलाक़े में बाक़ी रह पाना कठिन हो रहा है और वह इलाक़ा छोड़कर जाने की तैयारी में हैं क्योंकि ईरान इस लड़ाई में अकेला नहीं है बल्कि समान विचार रखने वाली और भी ताक़तें उभर कर सामने आई हैं। इनमें इराक़ का नाम लिया जा सकता है, सीरिया का नाम लिया जा सकता है, यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन का नाम लिया जा सकता है, फ़िलिस्तीनी संगठनों का नाम लिया जा सकता है।

एक बिंदु यह भी है कि सऊदी अरब की सरकार ने हमेशा अन्य देशों के साथ संबंधों में केवल सरकारों को अलग अलग हथकंडों से अपने साथ लाने की कोशिश की और जनता को नज़र अंदाज़ा किया जबकि ईरान ने हमेशा जनता के स्तर के संबंधों को महत्व दिया।

इन दो रुजहानों का भविष्य क्या होगा, वर्तमान हालात का जायज़ा लेकर इसका अनुमान लगाया जा सकता है। (अहमद अब्बास)

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