Oct २२, २०१९ १०:२४ Asia/Kolkata
  • मनामा में सुरक्षा सम्मेलन, इस्राईल और अमरीका की भागीदारी, जब ईरान के सामने इस्राईल और अमरीका अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे हैं तो इन अरब सरकारों की रक्षा क्या करेंगे? अपनी जनता का अपमान कर रही हैं अरब सरकारें!

अरब जगत के विख्यात टीकाकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ाः बहरैन में सोमवार को 60 सरकारों की भागीदारी से जो सम्मेलन शुरू हुआ है और जिसका उद्देश्य ईरान के बढ़ते प्रभाव और ख़तरे को रोकना बताया गया है उसका संदेश यह है कि अमरीका फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों का पीछा नहीं छोड़ने वाला है बल्कि वह इसी कोशिश में है कि ज़ायोनी शासन को उनका मोक्षदाता साबित करे।

मुसीबत तो यह है कि फ़ार्स खाड़ी की सरकारें बार बार अमरीका से ठगे जाने के बावजूद होश में नहीं आ रही हैं और अपनी धरती पर इस तरह के उत्तेजक सम्मलनों की मेज़बानी कर रही हैं जिसका मक़सद इस्राईल से राजनैतिक, सामरिक और आर्थिक क्षेत्रो में संबंधों को बढ़ाना है।

हमारी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि फ़ार्स खाड़ी की सुरक्षा के नाम पर अमरीका इतनी सरकारों को क्यों जमा कर रहा है जिनका इस इलाक़े से कोई संबंध भी नहीं है और जिनके बारे में अब तक यह नहीं सुना गया कि उनके पास कोई मज़बूत नौसेना मौजूद है कि वह फ़ार्स खाड़ी की सुरक्षा की योजना में कोई रोल अदा करें। इसमें इस्राईल भी शामिल है जिसकी युद्धक नौका को हिज़्बुल्लाह ने वर्ष 2006 के युद्ध में ध्वस्त कर दिया था और उसके बाद इस्राईल की हिम्मत नहीं हुई कि मध्यपूर्व में लेबनान की जलसीमा में प्रवेश करे।

इस्राईल के पास इतनी ताक़त नहीं है कि वह फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों की वायु और समुद्री रक्षा कर सके। यदि उसके बस की बात होती तो साठ देशों को सम्मेलन में एकत्रित न किया जाता।

बात यह है कि इस्राईल का अस्तित्व इस इलाक़े के लिए ख़तरा है ईरान नहीं जो हज़ारों साल से इस इलाक़े में मौजूद है मगर अमरीकी प्रशासन जब भी अरब सरकारों को लूटना चाहता है तो ईरान के ख़तरे का राग अलापना शुरू कर देता है।

अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो बड़ी बेशर्मी से एक बार फिर महाविनाश के हथियारों की बात करने लगे हैं। उन्होंने मनामा सम्मेलन में कहा कि महाविनाश के हथियारों का प्रसार अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के लिए ख़तरा है और हम सब के लिए ज़रूरी है कि यह हथियार हासिल करने की कोशिश करने वाले देश पर अंकुश लगाने के लिए ज़रूरी क़दम उठाएं। उनका इशारा ईरान की तरफ़ था।

हमें यह नहीं मालूम कि सऊदी अरब, इमारात और बहरैन इस सम्मेलन में इस्राईली प्रतिनिधिमंडल के साथ कैसे बैठे होंगे जो चुपके चुपके अपने मध्यस्थ ईरान भेज रहे हैं और ईरान से अपने विवादों को हल करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

एक ही दिन पहले ईरान के सांसद अली अकबर तूरकी ने बताया कि इमारात ने ईरान के 70 करोड़ डालर रिलीज़ किए हैं और दुबई स्थित कुछ एक्सचेजं कंपनियों ने ईरान के साथ काम शुरू कर दिया है।

इमारात, बहरैन और सऊदी अरब यह इशारा देते हैं कि वह अमरीका के दबाव में आकर इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं तो सवाल यह है कि कुवैत ने कैसे इस सम्मेलन में भाग लेने से इंकार कर दिया और कहा कि वह अपने देश की जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस सम्मेलन से दूर रहेगा। हालांकि वर्ष 1991 में अमरीका ने उसको इराक़ी क़ब्ज़े से आज़ादी भी दिलाई थी।

इस्राईल अब ख़ुद अपनी रक्षा कर पाने में असमर्थ है तो फ़ार्स खाड़ी के देशों की रक्षा क्या करेगा? तेल अबीब तो दिन रात हिज़्बुल्लाह के मिसाइलों के डर से कांपता रहता है। दूसरी तरफ़ अमरीका की सरकार इस्राईल की रक्षा में अपना एक भी सैनिक गवांने के लिए तैयार नहीं है।

ईरान के घटक संगठनों ने इमारात की फ़ुजैरा बंदरगाह के क़रीब छह तेल टैंकरों पर हमले किए, सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन विमानों और मिसाइलों से हमले किए, ईरानी मिसाइल ने अमरीका का ड्रोन ग्लोबल हाक मार गिराया, ईरान ने ब्रिटेन के तेल टैंकरों को पकड़ लिया और अमरीकी युद्धक नौकाओं के बीच से उसे निकाल कर ले गया तो अमरीका ने कोई जवाबी कार्यवाही करने के बजाए अपने सारे युद्ध पोत फ़ार्स खाड़ी से निकाल कर दूर पहुंचा दिए कि कहीं ईरान कोई मिसाइल हमला इन युद्ध पोतों पर न कर दे।

अरब सरकारें वह हरकतें कर रही हैं जिनसे इन देशों की जनता उनके ख़िलाफ़ बग़ावत कर सकती है।

अमरीका ने कुर्दों को अकेला छोड़ दिया जो उसके इशारे पर कई मोर्चों पर लड़ चुके थे। जब तुर्की ने हमला किया तो अमरीकी सैनिक वहां से भाग निकले। इस्राईल ने भी जो कुर्दों का घटक है मुंह दूसरी ओर मोड़ लिया।

अरब देशों की जनता ऊंट की तरह संयम दिखाती है, संयम दिखाती है लेकिन फिर जब उठ खड़ी होती हैं तो सामने जो कुछ होता है उसे उलट पलट कर रख देती हैं।

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