Nov ११, २०१९ १२:२८ Asia/Kolkata
  • ईरान को क्यों एनपीटी से निकल जाना चाहिए?

एनपीटी पर हस्ताक्षर करके न सिर्फ़ यह कि ईरान को कोई फ़ायदा नहीं हुआ है बल्कि यह आशंका भी है कि कुछ पक्ष, इसी समझौते की आड़ में ईरान के परमाणु कार्यक्रम में गड़बड़ी पैदा करने और ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में लिप्त रहे हों।

ईरान ने परमाणु समझौते से अमरीका के निकलने और अपने ख़िलाफ़ उसके एकपक्षीय प्रतिबंधों को पुनः थोपे जाने की प्रतिक्रिया में परमाणु समझौते की कटिबद्धताओं के स्तर को कम करने का चौथा क़दम ऐसी स्थिति में उठाया है कि आईएईए की एक निरीक्षक द्वारा नतंज़ के परमाणु संयंत्र में नाइट्रेट विस्फोटक ले जाने के कारण उसे प्रवेश से रोकने की ख़बर मीडिया में छाई हुई है। ईरान की परमाणु ऊर्जा संस्था के प्रवक्ता बेहरूज़ कमालवंदी ने बताया कि जब यह निरीक्षक नतंज़ में यूरेनियम संवर्धन के प्लांट में घुसना चाह रही थी, तभी कई बार ख़तरे का अलार्म बजा जिससे पता चला कि उसके पास कुछ ख़तरनाक पदार्थ हैं। ईरान ने कहा है कि वह अपनी बात सिद्ध करने के लिए इस पूरे मामले की फ़िल्म और तस्वीरें आईएईए को देने को तैयार है लेकिन अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने अपने एक बयान में कहा है कि ईरान का यह क़दम शर्मनाक और अस्वीकार्य है और विश्व समुदाय को इस पर प्रतिक्रिया दिखानी चाहिए।

 

ईरान के ख़िलाफ़ इस प्रकार का विषैला प्रचार ऐसी स्थिति में किया जा रहा है कि जब इस बात के दृष्टिगत कि आईएईए की उक्त निरीक्षक ख़तरनाक पदार्थ लिए हुए थी, ये सवाल सामने आते हैं कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों में इससे पहले कई बार जो गड़बड़ हो चुकी है क्या अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के कुछ निरीक्षक उसमें लिप्त रहे हैं? और उन्होंने ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों की मशीनों को दूषित किया है? या ईरान के परमाणु कार्यक्रम की जासूसी की है? या स्टाक्सनेट वायरस परमाणु प्रतिष्ठानों के कंप्यूटरों तक पहुंचाया है? या ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में उनका हाथ है? ये सवाल इस आयाम से भी अहम हैं कि आईएईए में अमरीका का काफ़ी प्रभाव है और वह ज़ायोनी शासन के साथ मिल कर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नुक़सान पहुंचाना चाहता है और ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में इन दोनों का हाथ है। परमाणु कार्यक्रम की जासूसी, विध्वंस और परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या, उन नकारात्मक परिणामों का केवल एक भाग है जो एनपीटी पर हस्ताक्षर के कारण ईरान को भुगतने पड़ रहे हैं।

 

एनपीटी के अनुसार इस समझौते को स्वीकार करने वाले हर देश को आईएईए के निरीक्षकों को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों के निरीक्षण की अनुमति देने के बदले में परमाणु शक्तियों की ओर से शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक दी जानी चाहिए। लेकिन व्यहारिक रूप से ईरान के संबंध में ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि इसके विपरीत अमरीका ने विभिन्न बहानों से ईरान को उसके परमाणु अधिकारों से वंचित करने की कोशिश की है। इसके लिए उसने ईरान पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाए और विश्व समुदाय को ईरान के ख़िलाफ़ एकजुट करने की कोशिश की। उसने इसी तरह परमाणु समझौते से एकपक्षीय रूप से निकल कर एनपीटी की विश्वनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए। बात यहीं पर ख़त्म नहीं होती क्योंकि आईएईए ने ईरान की ओर से विश्वास बहाली के लिए उठाए गए क़दमों के जवाब में अधिकतर अवसरों पर न केवल यह कि अपने पेशेवराना दायित्वों का पालन नहीं किया बल्कि ज़ायोनी शासन की ओर से किए जाने वाले झूठे और बेबुनियाद दावों पर भी ध्यान दिया है जिसने एनपीटी को स्वीकार ही नहीं किया है और वह मध्यपूर्व की एकमात्र ऐसी सरकार है जिसके पास परमाणु हथियारों के भंडार हैं।

 

इस्राईल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में जो निराधार दावे किए हैं वे ईरान के ख़िलाफ़ जारी षड्यंत्रों का ही एक भाग हैं। इन हालात में जब ईरान को एनपीटी पर हस्ताक्षर करने से कुछ भी फ़ायदा नहीं हुआ है बल्कि उसके परमाणु कार्यक्रम को विभिन्न प्रकार के ख़तरों का सामना करना पड़ा है, क्या बेहतर नहीं होगा कि ईरान एनपीटी के दसवें अनुच्छेद पर अमल करे और इस संधि से निकल जाए? इस अनुच्छेद के अनुसार हर सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि अगर वह यह देखे कि इस संधि ने उसके राष्ट्रीय हितों को ख़तरे में डाल दिया है तो वह इस संधि से निकल सकती है। (HN)

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