Jan १८, २०२० १५:५४ Asia/Kolkata
  • नया सवेराः आज हम Lina Constantin के बारे में चर्चा करेंगे जिन्होंने इस्लाम को गले लगाया

एक बार मैं अपने घर में अकेली बैठी हुई थी।  शाम का समय था।  थोड़ी दूर पर मौजूद मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आ रही थी।  यह आवाज़ मुझको बहुत अच्छी लग रही थी।  मैंने अज़ान को दोहराना आरंभ किया।

यह सुनकर लगता है कि अमुक व्यक्ति, आसमानी धर्म इस्लाम की वास्तविकता को पहचानकर मुसलमान हुआ है।  हालांकि एसा नहीं है कि केवल ग़ैर मुस्लिम देशों के रहने वाले ही मुसलमान होते हैं।  इस्लामी देशों में रहने वाले बहुत से अल्पसंख्यकों के भीतर भी इस्लाम की ओर झुकाव की भावना देखी गई है।  इसका एक कारण यह है कि इस प्रकार के लोग मुसलमानों के बीच में रहते हैं इसलिए बड़ी सरलता से इस्लामी शिक्षाओं से अवगत हो जाते हैं। 

इस्लामी देशों में मिस्र एसा देश है जहां पर कई धर्मों के अनुयाई रहते हैं।  वहां पर अल्पमत में इसाई धर्म के मानने वाले रहते हैं।  मिस्र में लगभग दस प्रतिशत इसाई जीवन व्यतीत करते हैं।  मिस्र में रहने वाले बहुत से इसाई, इस्लामी शिक्षाओं से प्रभावित होकर मुसलमान बन चुके हैं।  मिस्र में रहने वाले इसाइयों में से जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया उनमें से एक, Lina Constantin लीना कांस्टेंटिन भी हैं।  मुसलमान होने के बाद लीना कांस्टेंटिन ने अपना नाम बदलकर मुस्लेमा कर लिया है।

मिस्र में मुसलमान और ईसाई धर्मगुरुओं में अच्छे रिश्ते हैं

लीना कांस्टेंटिन पूर्वोत्तरी मिस्र से स्वेज नगर की रहने वाली हैं।  उनका जन्म भी इसी नगर में हुआ था।  यह मिस्र का एक तटवर्ती नगर है जिसकी जनसंख्या लगभग 7 लाख 50 हज़ार है।  बहुत से इसाइयों की भांति लीना भी इसाई धर्म में पाए जाने वाले कुछ विरोधाभासों को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकीं।  यही वजह थी कि लीना बचपन से धार्मिक आयोजनों में कम जाया करती थीं। 

लीना कहती हैं कि मिस्र में रहने वाले अन्य इसाइयों की भांति मैं भी अपने धर्म की शिक्षाओं के साथ पली बढ़ी थी।  मेरे माता-पिता यह चाहते थे कि मैं भी उनके साथ हर रविवार को गिरजाघर जाऊं।  उनकी इच्छा थी कि चर्च जाकर मैं धर्मगुरू के हाथों को चूमूं और फिर वह हमारे सिर पर हाथ फेरकर दुआ दें और फिर मैं उनकी कही हुई उन बातों को सुनूं जिनको मैं स्वीकार नहीं कर सकती।  लीना कहती हैं कि अपनी आयु के बच्चों की भांति मैं भी धर्मगुरू के उपदेशों को बिना समझे हुए सुनती थी और जैसे ही उनका प्रवचन समाप्त होता मैं बहुत तेज़ी से अपने दोस्तों से मिलने और उनके साथ मिलकर खेलने के लिए भागती थी।

क़ुरआन कहता है कि मिल जुल कर रहने की दावत देता है

 

मिस्री इसाई लीना कांस्टेंटिन का कहना है कि एक बात जो मुझको हमेशा अखरती थी वह यह थी कि हमारे धर्मगुरू, मुसलमानों को काफ़िर कहा करते थे।  उनका कहना है कि हमारे चारों ओर जो मुसलमान रहा करते थे उनसे मुझको कोई शिकायत नहीं थी।  हम मुसलमानों के साथ मैत्रीपूर्ण ढंग से रहते थे जबकि हमारे धर्मगुरूओं का कहना था कि वे अच्छे नहीं होते और उनके साथ संबन्ध रखता उचित नहीं है।

हमारे धर्मगुूरू बताते थे कि मुसलमान, इसाई शिक्षाओं के अनुसार काम नहीं करते जिसके कारण ईश्वर उनसे क्रोधित है।  उन्होंने ईश्वर की बात को नहीं माना इसलिए वे काफ़िर हो गए हैं।  लीना का कहना था कि मेरे लिए यह बात स्वीकार करना संभव नहीं था क्योंकि मैं उनके बीच जीवन गुज़ार रही थी।  वे कहती हैं कि जब मैं कुछ बड़ी हुई तो मेरा एडमिशन, स्वेज नगर के एक स्कूल में करवाया गया।  वहां पर कई बच्चों से मेरी दोस्ती हो गई जिनमें से कई मुसलमान भी थे।  मेरे मुसलमान दोस्तों का व्यवहार मेरे साथ बिल्कुल भी बुरा नहीं था।  वे मेरे साथ खेलते और पढ़ते थे।

मिस्र का एक पुराना गिरजाघर

 

लीना का कहना है कि इसाई धर्मगुरूओं की विरोधाभासी बातें से सदैव ही मेरे मन को परेशान करती थीं।  अब लीना इसका कारण जानना चाहती थी किंतु उनके कोप से मुझको डर लगता था।  लीना कहती हैं कि मैंने सोचा कि क्यों न यह सवाल मैं अपने शिक्षक से पूछूं।  उन्होंने कहा कि मेरे शिक्षक भी इसाई थे।  मैने बड़ी हिम्मत करके उनसे पूछा कि हमारे यहां मुसलमानों को बुरा क्यों कहा जाता है।  इसके जवाब में मेरे टीचर ने मुझसे कहा कि इन बातों को समझने के लिए अभी तुम्हारी उम्र कम है।  तुम अभी इन बातों में न पड़ो सिर्फ इसका ख़याल रखो कि मुसलमानों के व्यवहार से प्रभावित न होने पाओ।  मैंने अपने टीचर की बात तो सुनी लेकिन इसपर मुझको विश्वास नहीं हुआ क्योंकि जो कुछ मैं अपने चारों ओर देख रही थी वह उससे बिल्कुल अलग था जो मुझे बताया जा रहा था।  लीना का कहना है कि बाद में मुझको यह पता चला कि क़ुरआन, अपने मानने वालों को ग़ैर मुसलमानों के साथ अच्छे संबन्ध बनाने के लिए प्रेरित करता है ताकि वे लोग भी इस्लाम की वास्तविकता को समझ सकें।

 

यह वास्तविकता है कि इस्लाम, अन्तिम ईश्वरीय धर्म के रूप में अपने से पहले वाले उन धर्मों को मान्यता देता है जिनकी किताबों में हस्तक्षेप नहीं किया गया है।  इस बात को क़ुरआन में कई स्थानों पर कहा गया है।  क़ुरआन धर्मों के बीच एकता का आह्वान करता है।  सूरे आले इमरान की आयत संख्या 64 में ईश्वर कहता हैः हे रसूल, तुम उनसे कहो कि ऐ अहले किताब तुम ऐसी बात पर तो ध्यान दो जो हमारे और तुम्हारे बीच समान हैं कि खुदा के सिवा किसी की इबादत न करें और किसी चीज़ को उसका सहभागी न बनाएं और ख़ुदा के सिवा हममें से कोई किसी को अपना पालनहार न बनाए।  इस्लाम, सच्चे इसाइयों को मुसलमानों का मित्र बताता है।

लीना कांस्टेंटिन, मुसलमानों को इसाइयों का अच्छा दोस्त बताती हैं।  वे कहती हैं कि मेरी सबसे अच्छी सहेली एक मुसलमान लड़की थी।  जब लीना की सहेली स्वेज नगर से क़ाहिरा चली गई तो इससे उसको बहुत दुख हुआ।  लीना की सहेली ने क़ाहिरा जाने से पहले उसे एक उपहार दिया जिसने लीना के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया।  यह उपहार क़ुरआन था।  लीना ने अब क़ुरआन का अध्ययन शुरू कर दिया।  बाद में लीना अपने मुसलमान मित्रों से इस्लाम के बारे में बातें करने लगी।  धीरे-धीरे उसको इस्लाम की सच्चाई का पता चलने लगा।  उसको यह समझ में आ गया कि इस्लाम के बारे में उसके धर्मगुरूओं ने जो कुछ कहा था वह, उस वास्तविकता से बिल्कुल ही अलग था जो उसनी समझी थी।  लीना धीरे-धीरे इस्लाम की ओर उन्मुख होने लगीं किंतु इस बात को उन्होंने सार्वजनिक नहीं किया था क्योंकि उनके पति चर्च या गिरजाघर में एक अधिकारी के पद पर थे।

धर्मों के बीच एकता महत्वपूर्ण है

 

मुसलमान धर्मगुरूओं के प्रवचनों और क़ुरआन की आयतों को रेडियों के माध्यम से सुनकर लीना में इस्लाम के प्रति लगाव बढ़ता जा रहा था।  उनका कहना था कि क़ुरआन को सुनकर मुझको विशेष प्रकार की शांति मिलती थी।  लीना का कहना था कि उनकी बहुत पुरानी समस्या का समाधान क़ुरआन ने कर दिया।  इस बारे में वे कहती हैं कि एक बार मेरे पति घर पर नहीं थे।  मैंने अपनी दोस्त का दिया उपहार अर्थात क़ुरआन लेकर उसे पढ़ना शुरू किया।  वे कहती हैं कि मेरी नज़र सूरे आले इमरान की आयत संख्या 59 पर पड़ी जिसमें ईश्वर कहता है कि ईश्वर के निकट तो ईसा की स्थिति, आदम जैसी है कि उनको मिट्टी का पुतला बनाकर कहा कि होजा तो वह फौरन इन्सान हो गए।  लीना कहती हैं कि इस आयत को पढ़कर मुझको एक एसे प्रश्न का उत्तर मिल गया जिसको मैं वर्षों से खोज रही थी।  थोड़ी ही देर में दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और मैंने क़ुरआन को फिर अल्मारी में जाकर छिपा दिया।  इस घटना के बाद मेरी स्थति बहुत बदल गई।

 

हज़रत ईसा मसीह के बारे में मेरे मन में जितने सवाल थे मुझको उनके जवाब मिलते जा रहे थे।  अब मुझको यह तय करना था कि बात किसकी सही है।  मेरे सामने दो बाते थीं।गिरजाघर में पादरी की कही बातें या क़ुरआन में हज़रत ईसा के बारे लिखी बातें।  लीना कहती हैं कि मैंने क़ुरआन में एक स्थान पर यह भी पढ़ा था कि हे रसूल, तुम कह दो कि ख़ुदा एक है।  ख़ुदा बरहक़ व बेनियाज़ है।  न उसने किसी को जन्म दिया न उसको किसी ने जन्म दिया और उसका कोई समान नहीं है।  इसको पढ़कर मुझको विश्वास हो गया कि हज़रत ईसा के बारे में जो क़ुरआन में लिखा है वही सही है।  अपने भीतर भारी परिवर्तनों के बाद आख़िरकार लीना कांस्टेंटिन मुसलमान हो गई।  इस बारे में उनका कहना है कि एक बार मैं अपने घर में अकेली बैठी हुई थी।  शाम का समय था।  थोड़ी दूर पर मौजूद मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आ रही थी।  यह आवाज़ मुझको बहुत अच्छी लग रही थी।  मैंने अज़ान को दोहराना आरंभ किया।

उनका कहना है कि लंबे समय से मैं जिस चीज़ को ढूंढ रही थी वह मुझको मिल चुकी थी।  जब मेरी मुसलमान दोस्तों को यह पता चला कि मैंने स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार कर लिया है तो उन्होंने मुझको बधाइयां देनी आरंभ कर दीं।  इस प्रकार से लीना कांस्टेंटिन अब मुस्लेमा हो गई थी।

 

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