Jan २१, २०२० ११:२९ Asia/Kolkata
  • क्या स्वेज़ नहर की लड़ाई अब ईरान के पास हुरमुज़ स्ट्रेट में लड़ी जाएगी? ईरान की जवाबी कार्यवाही क्या होगी?

अरब जगत के मशहूर टीकाकार अब्दुल बारी अतवान की समीक्षाः हुरमुज़ स्ट्रेट में जहां अमरीका और यूरोपीय देश अपने सैनिकों और सैनिक उपकरणों की भीड़ लगा रहे हैं तनाव अपूर्व रूप से बढ़ गया है।

फ़्रांस ने एलान किया है कि उसने एक समुद्री गठबंधन बनाया है जिसमें बेल्जियम, डेनमार्क, यूनान, इटली, हालैंड और पुर्तगाल जैसे देश शामिल हैं जबकि फ़्रांस ने अपना विमान वाहक युद्धपोत चार्ल्ज़ डिगोल भी भेज दिया है। ब्रिटेन ने अमरीकी गठबंधन के तहत फ़ार्स की खाड़ी में अपनी वापसी करने और सैनिक उपस्थिति बढ़ाने की घोषणा की है। अमरीका के गठबंधन में आस्ट्रेलिया, सऊदी अरब और इमारात भी शामिल हैं।

हुरमुज़ स्ट्रेट

 

इन गठबंधनों को बनाने और सैनिक उपस्थिति बढ़ाने का उद्देश्य सऊदी अरब को आश्वस्त करना बताया गया है जिसके तेल प्रतिष्ठानों पर बड़े हमले हुए थे लेकिन इस सारे ड्रामे का असली लक्ष्य ईरान के विरुद्ध युद्ध की तैयारी करना हो सकता है। क्योंकि परमाणु समझौते से ईरान के बाहर निकलने की संभावना बढ़ गई है।

सऊदी अरब ने अपनी धरती पर 3000 अमरीकी सैनिकों की तैनाती के बदले 50 करोड़ डालर की रक़म अमरीका को अदा की है। जब तक फ़ार्स खाड़ी के यह अरब देश इस तरह की अदायगी करते रहेंगे उस समय तक यूरोपीय देशों में अपने सैनिक और युद्धपोत फ़ार्स खाड़ी में भेजने का उत्साह भी बढ़ता रहेगा। लेकिन यह बात सऊदी अरब भी अच्छी तरह जानता है कि यह देश उसके लिए ईरान या किसी भी ताक़तवर देश से कोई लड़ाई लड़ने वाले नहीं हैं।

हुरमुज़ स्ट्रेट के इलाक़े में इस तरह बड़े पैमाने पर सैनिकों और सैनिक उपकरणों की भीड़ में कभी भी कोई घटना हो सकती है जिससे सैनिक टकराव की स्थिति बन सकती है।

ट्रम्प ने तो कई बार कहा कि वह ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे इस पर इस्राईल ने ख़ूब खुशी मनाई।

ईरान ने इराक़ में स्थित अमरीका की सैनिक छावनी एनुल असद पर जिस सफलता के साथ मिसाइल हमला किया है और इस हमले से जो भारी नुक़सान इस छावनी को पहुंचाया है उससे साफ़ हो गया है कि इस इलाक़े में अमरीका और उसके घटकों की कोई भी छावनी सुरक्षित नहीं है। इस हमले के बाद वास्तव में अमरीकी और यूरोपीय सैनिक समीकरणों में बड़ी उलट पुलट हो गई है। यही वजह है कि फ़्रांस ने ईरान के परमाणु समझौते के मामले में अपना रुख़ तेज़ी से बदल लिया। हमें याद रखना होगा कि स्वेज़ नहर की लड़ाई फ़्रांस ब्रिटेन और इस्राईल ने ही करवाई थी।

दूसरी ओर ईरान है जिसके पास बड़ी ताक़तवर संस्थाएं हैं, जिसके पास बड़े मज़बूत थिंक टैंक हैं जो हालात पर गहरी नज़र रखे हुए हैं। ईरान हाथ पर हाथ धरे बैठा रहने वाला देश नहीं है। ईरान सही समय पर कुछ कर गुज़रने वाला देश है।

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