Jul ०३, २०२० ११:१३ Asia/Kolkata
  • अमरीकी दबाव के सामने अभेद्य होता जा रहा है ईरान,  दबाव और कोरोना वायरस के बावजूद पनप रही है ईरानी इकानोमी

अमरीकी मैगज़ीन फ़ारने पालीसी ने एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अमरीका की अधिकतम दबाव की नीति अब ईरान के सामने नाकाम हो चुकी है।

लेखक का कहना है कि अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने 5 जून को बयान दिया था कि ईरान को बड़े समझौते के लिए अगले चुनाव तक इंतेज़ार नहीं करना चाहिए बल्कि ख़ुद ट्रम्प के साथ एक अच्छी डील करना चाहिए। ट्रम्प का यह रिमार्क क़ैदियों के तबादले के बाद आया जिसके तहत अमरीकी नौसैनिक मिकाइल वाइट को ईरान से रिहाई मिली और डाक्टर माजिद ताहेरी को अमरीका में जेल से रिहा किया गया।

ट्रम्प जब ईरान से समझौता करना चाहते हैं और अपनी साख बेहतर बनाने की फ़िक्र में हैं तो यह भी सत्य है कि ईरान पर अधिकतम दबाव डालने की उनकी रणनीति ने समझौते की सारी संभावनाओं को ख़त्म कर दिया।

दबाव से ईरान की अर्थ व्यवस्था को नुक़सान पहुंचा और ईरानी जनता परेशान भी हुई लेकिन अर्थ व्यवस्था उस तरह ध्वस्त नहीं हुई जिसकी अमरीका उम्मीद कर रहा था। बल्कि ईरान में तो आर्थिक बहाली के आसार नज़र आने लगे हैं। ईरान में इस समय उत्पादन और रोज़गार दोनों बढ़ रहा है। ईरान का ग़ैर पेट्रोलियम उत्पादन 1.1 प्रतिशत बढ़ा है। मशहूर ईरानी इकानामिस्ट सईद लेलाज़ ने कहा कि कोरोना वायरस की महामारी के बावजूद ईरान की अर्थ व्यवस्था इस साल ग्रोथ करेगी। ट्रम्प ने ईरान पर दबाव डालने की जो रणनीति अपनाई उससे तो अब यह हालत हो गई है कि ईरान के अंदर कोई भी अधिकारी अमरीका से वार्ता के बारे में कुछ कहता ही नहीं।

ट्रम्प के वार्ता के प्रस्ताव के जवाब में ईरान की सुप्रीम नेशनल सेक्युरिटी काउंसिल के सेक्रेट्री अली शमख़ानी ने कहा कि क़ैदियों का तबादला वार्ता का नतीजा नहीं और भविष्य में अमरीका से कोई वार्ता नहीं होने वाली है। इस बयान से साफ़ ज़ाहिर है कि ईरान में अमरीका से वार्ता का कोई भी विकल्प अब मेज़ पर नहीं है।

अभी कुछ महीने पहले हालात कुछ अलग थे। दिसम्बर 2019 में ईरान और अमरीका के बीच क़ैदियों की एक और लेनदेन हुई थी और उस समय दोनों देशों के बीच हाई लेवल मीटिंग हुई थी। अमरीका फिर इसी स्तर की मीटिंग चाहता है लेकिन ईरान का कहना है कि अमरीका डिप्लोमेटिक प्रयासों को बार बार नाकाम बनाने वाली हरकत करता है।

दिसम्बर में राष्ट्रपति रूहानी ने जापान का दौरा किया था जिसके बारे में जापानी मीडिया का कहना था कि अमरीक से मिले ग्रीन सिग्नल के बाद यह दौरा हुआ था और इसके नतीजे में कोई डील हो सकती है और इस डील के तहत जापान को ईरान से तेल ख़रीदने की छूट मिल सकती है जबकि जापान अपने यहां सील पड़े ईरान के कई अरब डालर रिलीज़ कर सकता है।

मगर जब जनवरी 2020 में अमरीका ने ईरान के कमांडर जनरल क़ासिम सुलैमानी को शहीद कर दिया तो उसके बाद वार्ता का हर रास्ता बंद हो गया। पूरे ईरान में अमरीका के ख़िलाफ़ भावना भड़क उठी। राष्ट्रपति रूहानी ने भी बयान दिया कि अमरीका समझता है कि अधिकतम दबाव की रणनीति के सामने ईरान झुक जाएगा लेकिन यह कभी नहीं होने वाला है।

ईरान के नए संसद सभापति मुहम्मद बाक़िर क़ालीबाफ़ ने कहा कि अमरीका से वार्ता और समझौता बेकार और नुक़सासनदेह है हमारी रणनीति यह है कि हम शहीद क़ासिम सुलैमानी के ख़ून का इंतेक़ाम लेंगे। क़ालीबाफ़ आईआरजीसी के पूर्व कमांडर हैं और जनरल क़ासिम सुलैमनी के क़रीबी साथियों में गिने जाते हैं।

ट्रम्प अगर यह मानते हैं कि अधिकतम दबाव की नीति के नतीजे में ईरान वार्ता पर मजबूर हो जाएगा तो यह उनकी भूल ही होगी। ट्रम्प ईरान से वार्ता करना चाहते हैं तो उनके पास एक ही रास्ता है कि दबाव का ख़याल दिमाग़ से निकालें और ईरान का विश्वास जीतने की कोशिश करें।

स्रोतः फ़ारेन पालीसी

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