Jul ०७, २०२० ०९:०५ Asia/Kolkata
  • हालिया नतन्ज़ धमाके और मनोवैज्ञानिक युद्ध का एक अलग जायज़ा, हालात की बागडोर किसके हाथ में है? 

नतन्ज़ की घटना और उसके बाद शुरू होने वाले मनोवैज्ञानिक युद्ध का एक ख़ास लक्ष्य है और वह लक्ष्य यह मालूम करना है कि हालात की बागडोर किसके हाथ में है?

नतन्ज़ में जो हुआ वह इस्राईल ने किया है या नहीं? इस बारे में औपचारिक जानकारी नहीं है औपचारिक रूप से बस सुप्रीम नेशनल सेक्यरिटी काउंसिल के प्रवक्ता केवान ख़ुसरवी ने बयान दिया है कि इस घटना के कारणों से संबंधित विभिन्न संभावित पहलुओं की गहन जांच के बाद इस घटना की वजह मालूम कर ली गई है।

इस घटना के बाद इस्राईल के कुछ क़रीबी लोगों ने दावे किए कि इस्राईल ने एफ़-16 और एफ़-35 युद्धक विमानों की मदद से नतन्ज़ की परमाणु साइट को निशाना बनाया है। ज़ायोनी शासन के कुछ अधिकारी भी इस बारे में भ्रामक बयान दे रहे हैं। वह न तो खुलकर यह कह रहे हैं कि यह हमला इस्राईल ने किया है और ही इसमें इस्राईल के लिप्त होने की बात को पूरी तरह ख़ारिज कर रहे हैं।

इस्राईल के युद्ध मंत्री बेनी गांट्स का दावा इसी प्रकार का है। उन्होंने कहा कि ज़रूरी नहीं है कि ईरान में जो भी घटना हो उसमें इस्राईल का ही हाथ होगा। यह बड़े जटिल सिस्टम हैं जिनकी सुरक्षा व्यवस्था बड़ी मज़बूत होती है हमें नहीं पता कि ईरानियों को हमेशा जानकारी रहती है कि नहीं कि इन चीज़ों की देखभाल किस तरह की जानी चाहिए।

इस समय जो मनोवैज्ञानिक वातावरण बना है उसमें इस्राईल को इस प्रकरण का ज़िम्मेदार बताने की कोशिश की जा रही है। कुछ लोगों का यह विशलेषण हैं कि कुछ समय पहले इस्राईल के वाटर नेटवर्क में गड़बड़ी पैदा हो गई थी जिसका बहुत गहरा असर हैफ़ा के जल विभाग पर पड़ा था और इसके पीछे ईरान का हाथ था। कुछ विशलेषक कहते हैं कि आगामी 2 अकतूबर से ईरान पर लगे अंतर्राष्ट्रीय हथियार प्रतिबंध समाप्त हो जाएंगे अब ज़ायोनी शासन यह सोच रहा है कि नतन्ज़ के हमले के बाद ईरान अगर चुप रह जाता है तब भी इस्राईल का फ़ायदा है कि उसने ईरान की परमाणु साइट को नुक़सान पहुंचा दिया और अगर ईरान जवाबी कार्यवाही करता है तो इस्राईल विश्व स्तर पर प्रोपैगंडा करेगा कि जब प्रतिबंधों के समय में ईरान इस तरह के हमले कर रहा है तो प्रतिबंध हट जाने के बाद वह क्या करेगा। इसका नतीजा यह होगा कि बहुत से देश अमरीका और इस्राईल के कैंपेन का समर्थन कर देंगे और ईरान पर लगे हथियार प्रतिबंध की अवधि में और भी विस्तार कर दिया जाएगा।

विशलेषकों का तीसरा ग्रुप यह कहता है कि अगर यह काम इस्राईल और अमरीका ने किया है तो वह दरअस्ल ईरान को वार्ता की मेज़ पर बैठने पर मजबूर करना चाहते हैं ताकि ईरान को अपनी मिसाइल क्षमता पर समझौता करने के लिए तैयार किया जा सके।

अगर इन विचारों को सही मान लिया जाए तो इसका मतलब यह होगा कि पूरे प्रकरण की बागडोर ज़ायोनियों के हाथ में है। लेकिन बुनियादी बात यह है कि इस पूरे प्रकरण को एक बड़े कैनवास पर रख कर भी देखा जा सकता है और इसको समझने के लिए कुछ बिंदुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है।

पहली चीज़ तो यह है कि अमरीका और इस्राईल दोनों यह मानते हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध का विकल्प बरसों पहले उनकी मेज़ से ग़ायब हो चुका है। ओबामा सहित कई अमरीकी अधिकारी कह चुके हैं कि अगर ईरान के मामले में उनके पास सामरिक विकल्प मौजूद होता तो वह ईरान से हरगिज़ वार्ता न करते।

अमरीकी वार्ताकार विलियम बर्न्ज़ ने अपनी किताब में लिखा कि जार्ज बुश के ज़माने में जब ईरान के संबंध में सामरिक विकल्प सहित सारे विकल्प समाप्त हो गए तो अमरीकी सरकार ने ईरान से वार्ता का फ़ैसला किया।

इसके अलावा एनुल असद छावनी पर हमला और अमरीकी ड्रोन का मार गिराया जाना वह घटनाएं हैं जिनसे अमरीकियों को और भी यक़ीन हो गया कि ईरान के मामले में सामरिक विकल्प कारगर नहीं होगा।

दूसरी बात यह है कि आर्थिक प्रतिबंधों का विकल्प भी फ़ेल हो चुका है। अमरीका सारे प्रतिबंध लगा चुका है और अब उसके पास कोई नया प्रतिबंध बचा ही नहीं है। यही कारण है कि जब पिछले साले ट्रम्प ने एलान किया है कि उन्होंने ईरान पर नए प्रतिबंध लगा दिए हैं तो ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों के आर्किटेक्ट कहे जाने वाले रिचर्ड नेफ़्यु ने मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा था कि यदि यह हो पाता तो मुझे बड़ी ख़ुशी होती लेकिन खेद की बात यह है कि जिन प्रतिबंधों को नया कहा जा रहा है वह पुराने प्रतिबंध हैं जो ईरान पर पहले ही लग चुके हैं।

जान बोल्टन ने भी अपनी किताब में सुप्रीम लीडर के कार्यालय और जनरल क़ासिम सुलैमानी पर प्रतिबंध लगाने के बारे में लिखा कि कुछ समय से नए प्रतिबंध का मामला मज़ाक़ बनकर रह गया है। ट्रम्प इस प्रकार के बयान देकर केवल मनोवैज्ञानिक हमले करते हैं।

तीसरी बात यह है कि अब वार्ता का कोई तुक और कोई गुंजाइश नहीं रही, वार्ता की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है।

इन तीनों बिंदुओं के साथ ही एक और अहम बात भी है जिसका उल्लेख नेफ़्यू ने अपनी पुस्तक में किया है कि अमरीका और ईरान अब इस स्थिति में हैं कि अपनी ताक़त का प्रदर्शन करके दूसरे पक्ष को प्रभावित करना चाहते हैं। यानी यह इरादों की जंग है।

तो अब स्थिति यह है कि ईरान के ख़िलाफ़ सैनिक विकल्पों को इस्तेमाल करने की गुंजाइश नहीं है, ईरान पर प्रतिबंध लगाने का भी कोई नतीजा नहीं निकला है तो ले देकर मनोवैज्ञानिक युद्ध ही रह जाता है।

अगर इन सारे बिंदुओं को सामने रखा जाए तो नज़र आएगा का पूरे हालात की बगडोर ईरान के हाथ में है। दूसरा पक्ष अपने सारे विकल्प इस्तेमाल करके ख़ाली हाथ खड़ा है। जबकि ईरान के हाथ में विकल्प मौजूद हैं और उन्हें वह इस्तेमाल करके सक्रिय प्रतिरोध की मदद से वर्तमान स्थिति से ख़ुद को बाहर निकाल सकता है। पूरब की ओर नज़र इसी प्रकार की रणनीति है और ईरान के अधिकारी इस पर अमल भी कर रहे हैं।

इस पूरी तसवीर को सामने रखते हुए हम नतन्ज़ हमले पर विचार करें तो हमें समझ में आएगा कि यह हमला इस्राईल ने किया हो या न किया हो हालात ईरान के कंट्रोल में हैं। नतन्ज़ का हमला इस्राईल ने किया हो या न किया हो हालात के बारे में जो भी फ़ैसला करना है वह ईरान को करना है वैसे यह भी तय है कि नतन्ज़ की घटना जैसे छोटे मामलों को भी ईरान नज़रअंदाज़ नहीं करेगा इस घटना पर भी कार्यवाही होना तय है मगर ईरान एक बड़े अभियान को आगे बढ़ाने में व्यस्त है।

स्रोतः तसनीम न्यूज़

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