Aug ०२, २०२० १८:५३ Asia/Kolkata
  • ट्रम्प की ईरान विरोधी नीतियों ने किस तरह भारत की क्षेत्रीय स्थिति को कमज़ोर और ईरान-चीन सहयोग को मज़बूत किया

चीन और ईरान के बीच 25 वर्षीय व्यापक रणनीतिक साझेदारी के समझौते की रिपोर्टों ने वाशिंगटन में हलचल पैदा कर दी है। ख़ास तौर पर इसलिए कि तेहरान को अलग-थलग करने के लिए ट्रम्प प्रशासन की अधिकतम दबाव की नीति विफल हो गई है।

लेकिन यह केवल अमरीका नहीं है, जो ईरान-चीन महा गठबंधन को लेकर चिंतित है, बल्कि भारत को भी इससे बड़ा झटका लगा है, इसलिए कि ईरान से जुड़े भारत के कई हित हैं, जो इसके बाद ख़तरे में पड़ सकते हैं।

इस समझौते से नई दिल्ली में ख़तरे की घंटियों का बजना, कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हालिया दिनों में सीमा पर भारत और चीन के बीच जारी तनाव से दोनों देशों के रिश्तों में काफ़ी कड़वाहट आ चुकी है। इसके अलावा, नई दिल्ली को पड़ोसी देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी गहरी चिंता है।

बीजिंग ने अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना के ज़रिए हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीति बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं में भारी निवेश किया है, जिसमें बंदरगाहें भी शामिल हैं। अंततः इसका एक सैन्य आयाम भी हो सकता है। इनमें से एक पाकिस्तान स्थित ग्वादर है।

लेकिन यह डर कि चीन, भारत को ईरान से निकालने की कोशिश कर रहा है, यह उचित नहीं है। भारतीय परियोजनाएं अमरीकी प्रतिबंधों के कारण संघर्ष कर रही हैं, न कि चीन की विस्तारवादी नीतियों के परिणाम स्वरूप। इसके अलावा, मीडिया ने कुछ ज़्यादा ही ईरान और चीन रणनीतिक साझेदारी को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया है।

भारत काफ़ी समय से ईरान में निवेश के अवसर तलाश कर रहा था और 2015 में ईरान परमाणु समझौते से उसे आशा की एक नई किरण दिखाई दी।

भारतीय ऊर्जा कंपनियों ने फ़ारस की खाड़ी में स्थित फ़रज़ाद-बी गैस फ़ील्ड को विकसित करने के एक पुराने समझौते पर फिर से काम शुरू कर दिया था। 2016 में मोदी ने भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच एक नया व्यापार मार्ग स्थापित करने के लिए तेहरान में अपने ईरानी और अफ़गान समकक्षों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।

चाबहार बंदरगाह परियोजना से भारत को न केवल तेल आयात करने और अफ़ग़ानिस्तान तथा मध्य एशियाई देशों तक उत्पादों के निर्यात में मदद मिलेगी, बल्कि ग्वादर में चीन की उपस्थिति का मुक़ाबला करने में भी मदद मिलेगी।

लेकिन 2018 में ट्रम्प के परमाणु समझौते से निकलने के बाद तेहरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध फिर से लागू करने से भारत की कोशिशों को काफ़ी बड़ा झटका लगा।

चाबहार परियोजना को अमरीकी प्रतिबंधों से छूट मिलने के बावजूद, भारत का काम प्रभावित हुआ है। पिछले साल ही ऐसी रिपोर्ट आई थी कि 2017 से नई दिल्ली ने परियोजना के लिए विशेष किए गए बजट में से कुछ भी ख़र्च नहीं किया है।

ईरान के चाबहार से ज़ाहेदान और फिर अफ़ग़ानिस्तान तक के लिए रेल परियोजना में दिलचस्पी रखने के बावजूद, भारत आगे नहीं बढ़ पाया और ईरान ने ख़ुद ही इस परियोजना को पूरा करने का बीड़ा उठा लिया।

अमरीकी प्रतिबंधों से भारत का कनेक्टिविटी एजेंडा, नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, जो मुंबई को ईरान और काकेशस के माध्यम से सेंट पीटर्सबर्ग से जोड़ता है, खटाई में पड़ गया।

परमाणु समझौते के बाद, यूरोपीय कंपनियों ने भी ईरानी बाज़ार में अपनी जगह बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अमरीकी प्रतिबंधों ने उन्हें भी आगे बढ़ने से रोक दिया।

चीन को निंयत्रित करने के अमरीका के प्रयासों में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन ट्रम्प ईरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की नीति ने, नई दिल्ली की क्षेत्रीय स्थिति को कमज़ोर कर दिया है। जेसीपीओए या परमणु समझौते से निकलना ट्रम्प प्रशासन की एक बड़ी रणनीतिक ग़लती थी, जो आने वाले समय में वाशिंगटन के लिए बहुत भारी साबित होगी। msm (Rupert Stone Newsweek)

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