Aug ११, २०२० २०:३८ Asia/Kolkata
  • बहुत देर की मेहरबां आते-आते, परमाणु समझौते में अमरीका की वापसी से अब क्या कुछ बदल जाएगा?

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अब्बास मूसवी ने मंगलवार को एक बयान जारी करके कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2231 प्रस्ताव के तहत, अमरीका की ज़िम्मेदारी है कि वह ईरान के ख़िलाफ़ समस्त प्रतिबंधों को हटाए, जो उसने एकपक्षीय रूप से परमाणु समझौते से निकलने के बाद लगाए हैं।

मंगलवार को कुछ संचार माध्यमों ने किसी अज्ञात सूत्र के हवाले से एक ख़बर चलाई थी कि अमरीका, अगले 10 दिनों में परमाणु समझौते में वापस आ सकता है, जिसके बाद वह ईरान के ख़िलाफ़ कुछ प्रतिबंधों को हटाने का एलान करेगा।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस ख़बर को फ़ेक बताते हुए ख़ारिज कर दिया और कहा कि अभी स्पष्ट नहीं है कि यह अफ़वाह क्यों फैलाई जा रही है।

ग़ौरतलब है कि अमरीका ने 2015 में ईरान के साथ होने वाले अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

मई 2018 में अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के शासनकाल में होने वाले इस समझौते को सबसे बुरा समझौता क़रार देते हुए इससे निकलने का एलान कर दिया था और ईरान के ख़िलाफ़ अपनी अधिकतम दबाव की नीति के तहत कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे।

ईरान ने इन प्रतिबंधों के बावजूद, समझौते से निकलने का एलान नहीं किया, बल्कि अपनी परमाणु गतिविधियों में थोड़ा विस्तार कर दिया।

दूसरी ओर, ईरान और चीन के बीच 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी का समझौता होने की ख़बरें सामने आने के बाद, निकट भविष्य में ट्रम्प प्रशासन की अधिकतम दबाव की नीति का दम तोड़ना भी स्पष्ट हो गया।

अमरीका के सहयोगी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों ने वाशिंगटन की ईरान विरोधी नीतियों की यह कहकर आलोचना शुरू कर दी कि ट्रम्प ने ईरान को चीन के निकट धकेलने में अहम भूमिका निभाई है।

यूरोपीय देशों का मानना है कि ईरान और चीन की रणनीतिक साझेदारी से जहां तेहरान के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंध विफल हो जायेंगे, वहीं चीन को विश्व के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने का मौक़ा मिल जाएगा।

यही वजह है कि ईरान और चीन के बीच इस तरह की साझेदारी की ख़बरों के बाद से ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि ट्रम्प ईरान विरोधी नीतियों में यू-टर्न ले सकते हैं और वह या नवम्बर के चुनाव के बाद अमरीका का अगला राष्ट्रपति परमाणु समझौते में वापसी का एलान कर सकता है।

यहां यह सवाल अहम है कि अगर अमरीका परमाणु समझौते में वापस लौटता भी है तो क्या वह ईरान और चीन के बीच 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी के लिए होने वाले समझौते को रोक पाएगा?

चीन और मध्यपूर्व के देशों के बीच सहयोग कोई नई या अनोखी बात नहीं है। लेकिन ईरान और चीन के बीच रणनीतिक सहयोग, इसलिए अलग है, क्योंकि ईरान इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताक़त है, तो वहीं चीन दुनिया की उभरती हुई सबसे बड़ी ताक़त है। दोनों का अमरीका से टकराव चल रहा है, और इस रणनीतिक साझेदारी में आर्थिक सहयोग के अलावा सैन्य सहयोग भी शामिल हो सकता है। इसलिए अमरीका और यूरोप की चिंता का मुख्य कारण यही सच्चाई है।

हालिया वर्षों में ईरान, चीन और रूस ने हिंद महासागर तथा ओमान खाड़ी में संयुक्त सैन्य अभ्यास भी किए हैं। अमरीका विरोधी दुनिया की इन बड़ी शक्तियों के बीच सहयोग से वाशिंगटन की नींद हराम होना स्वाभाविक भी है। अगर ईरान और चीन के बीच रणनीतिक साझेदारी का समझौता हो जाता है, जिसकी संभावना भी है, तो मध्यपूर्व में अमरीकी वर्चस्व और हितों के लिए अब तक की सबसे गंभीर चुनौती होगी।

ट्रम्प प्रशासन ने ईरान को लेकर जो ग़लतियां की हैं, अब उनमें सुधार और चीज़ों को पहले वाली स्थिति में वापस लौटाना, संभव नहीं लग रहा है। तेहरान के पास ऐसी कोई वजह नहीं है कि वह वाशिंगटन पर भरोसा जता सके। अमरीका और पश्चिम को लेकर आशावादी ईरानी धड़े की आवाज़ भी अब काफ़ी धीमी हो चुकी है। इसलिए वाशिंगटन का कोई भी क़दम, ईरान और चीन के बीच बढ़ते सहयोग में रुकावट नहीं बन सकता। msm

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