Aug २५, २०२० १६:१४ Asia/Kolkata
  • अपने घरों के अज़ाखानों को कर्बला तसव्वुर करके अज़ादारी करें, पाबंदियों में कैसे करें अज़ादारी? स्वर्गीय आयतुल्लाह बहजत द्वारा मोहर्रम के बारे में कही गई कुछ ज़रूरी बातें

ईरान के वरिष्ठ धर्मगुरुओं में से एक स्वर्गीय आयतुल्लाहिल उज़्मा शेख़ मोहम्मद तक़ी बहजत मोहर्रम महीने के आरंभिक दस दिनों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में बहुत ज़्यादा शोक में डूबे रहते थे और कहते थे कि, केवल ईश्वर ही जानता है कि कर्बला वालों को याद करने का कितना सवाब, पुण्य है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पौत्र हज़रत इमाम हुसैन (अ) और उनके वफ़ादार साथियों के महान बलिदान की याद में पवित्र मोहर्रम महीने में आयोजित होने वाली अज़ादारी को लेकर धर्मगुरुओं और धार्मिक बुद्धिजीवियों की नज़र में हमेशा विशेष महत्व रहा है। यही कारण है कि ज़्यादातर वरिष्ठ धर्मगुरू और महान धार्मिक बुद्धिजीवी मोहर्रम के मौक़े के अलावा भी साल के विभिन्न अवसरों पर इमाम हुसैन (अ) और उनके वफ़ादार साथियों की शहादत के ग़म में आयोजित होने वाली शोकसभाओं का आयोजन अपने-अपने घरों में बहुत ही श्रद्धा पूर्वक तरीक़े से करते थे। धर्मगुरुओं की नज़र में घरों में आयोजित होने वाली अज़ादारी से दिल रोशन होता, घरों में बरकत आती है और इंसान को अपनी ज़िन्दगी का सही लक्ष्य प्राप्त होता है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों की महानता और उनके जीवन से जुड़ी बातों के बयान करने की आवश्यकता इस बात को दर्शाती है कि लोक-परलोक के जीवन में सफलता के लिए इन महापुरुषों की हमे कितनी ज़्यादा ज़रूरत है। आज हम आपको ईरान के महान धर्मगुरु आयतुल्लहिल उज़्मा स्वर्गीय शेख़ मोहम्मद तक़ी बहजत द्वारा बयान किए गए इमाम हुसैन (अ) की याद में मनाई जाने वाली अज़ादारी के महत्व के बारे बताएंगे। यह सब वह बातें है जिन्हें स्वयं स्वर्गीय आयतुल्लाहिल उज़्मा बहजत के आधिकारिक कार्यालय ने पुष्टि की है।

 

ईश्वर से कहोः तूने कहा मैं आ गया

स्वर्गीय आयतुल्लाह बहजत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में होने वाली शोकसभाओं में भाग लेने को ईश्वर की निशानियों का सम्मान बताते थे। उनका मानना था कि ईश्वर की निशानियों का जितना हो सके सम्मान करना चाहिए। आयतुल्लाह बहजत कहते थे कि जितना संभव हो सके अपनी ज़िन्दगी के ज़्यादातर हिस्से को इमाम हुसैन (अ) की याद में बिताओ। उनका कहना था कि, इमाम हुसैन की याद में आयोजित होने वाली मजलिसें में भाग लेने का अर्थ है कि आप पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों से अपनी मोहब्बत का एलान कर रहे हैं। यह वही मोहब्बत है कि जिसके बारे में पवित्र क़ुरआन में आया है और जिसे पैग़म्बरी का इनाम क़रार दिया गया है। इसीलिए इन मजलिसों में भाग लेना इसी काम के समान है। आयतुल्लाह बहजत कहते हैं कि आप मजलिसों में इस नियत के साथ जाएं और ईश्वर से कहें कि, तूने कहा मैं आ गया। हम वही मोहब्बत को अंजाम दे रहे हैं कि जिसको तू चाहता था। जिसको तू चाहता है हम उसको से मोहब्बत करते हैं।      

केवल ईश्वर ही जानता है कि उनको याद करने का कितना इनाम है

स्वर्गीय आयतुल्लाह बहजत की हंसी बिना आवाज़ की थी, वह हमेशा मुस्कुराते रहते थे। लेकिन मोहर्रम के दिनों में उनके चेहरे पर कभी किसी ने हंसी और मुस्कुराहट नहीं देखी, वह मोहर्रम में इमाम हुसैन (अ) के ग़म में इतना डूब जाते थे कि हर वक़्त उनके चेहरे पर ग़म साफ़ देखा जा सकता था। ऐसे मौक़े पर वह कहते थे कि, केवल ईश्वर ही जानता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का याद करने का कितना सवाब और कितना इनाम है।  

कोई आएगा जो सब ठीक कर देगा

स्वर्गीय आयतुल्लाह बहजत से जब सवाल किया गया कि, उस जगह (ग़ैर-शिया देशों में) हमारे ऊपर बहुत दबाव है, जैसे बहुत सी ऐसी जगह है जहां इमाम हुसैन (अ) की शोकसभाओं और उनका मातम करने की भी इजाज़त नहीं है। इन स्थानों पर काला कपड़ा पहनने और धार्मिक वस्त्र धारण करने पर भी बहुत कड़े प्रतिबंध लगे हुए हैं।

स्वर्गीय आयतुल्लाहिल उज़्मा शेख मोहम्मद तक़ी बहजत ने इस सवाल के जवाब में कहा कि, उन्हें पाबंदियां लगाने दें, हम अपने घरों में मातम करें, इधर-उधर न जाएं, अपने-अपने घरों में मातम करने वालों को बुलाएं, उन्हें खाना खिलाएं, शरबत पिलाएं। मजलिस और मातम के लिए ऐसी जगहों को ढूंढें कि जहां कोई रुकावट न पैदा हो, वहां इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी का आयोजन करें। आयतुल्लाह बहजत कहते हैं कि आप ग़ुस्सा न करें, एक चीज़ कि जिसका ध्यान रखें वह यह है कि काम को ज़्यादा ख़राब न करें, इसलिए कहता हूं कि ग़ुस्सा न करें, उसका इंतेज़ार करें, एक है जो आएगा और सब ठीक कर देगा। केवल यह सोचें कि ऐसा क्या करें कि हम इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी को अंजाम दे सकें। अपना पूरा ध्यान इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी पर लगाएं। अपने घरों में मजलिसो-मातम करें, घरों के अज़ाखानों को कर्बला तसव्वुर करके अज़ादारी करें। स्वर्गीय आयतुल्लाह बहजत कहते हैं कि एक बहुत ही बड़े धर्मगुरु थे, जिनको मैंने तो नहीं देखा था, लेकिन जिससे मैंने सुना उन्होंने उनको देखा था, वह कहते थे कि, जब तुम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मजलिसों में जा रहे हो और कोई तुमसे यह सवाल करे कि तुम कहां जा रहे हो तो तुम यह न कहो कि हम मजलिस जा रहे हैं बल्कि उससे कहो कि हम कर्बला जा रहे हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों पर आंसू बहाओ

पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों विशेषकर इमाम हुसैन (अ) की मूसीबतों पर आंसू बहाव, यह काम एक ऐसा पुण्य और सवाब का काम है कि इससे ज़्यादा किसी अन्य मुस्तहेब काम में इनता सवाब नहीं है। आयतुल्लाह बहजत कहते हैं कि ईश्वर के ख़ौफ़ से रोने का सवाब भी शायद इमाम हुसैन (अ) के ग़म में रोने से ज़्यादा नहीं है।  (रविश ज़ैदी)

 

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