Sep १४, २०२० १६:१७ Asia/Kolkata
  • आयत क्या कहती हैं? क़दम उठाने के बाद ही दुआ व प्रार्थना सार्थक होती है।

आवश्यकता होने पर ईश्वरीय पैग़म्बर की बेटियां चरवाहे का काम कर सकती हैं लेकिन कभी भी अपमान सहन नहीं कर सकतीं और न भीख मांग सकती हैं।

सूरए क़सस की आयत क्रमांक 22 और 23 का अनुवाद:

और जब मूसा ने मदयन का रुख़ किया तो कहा आशा है कि मेरा पालनहार सीधे रास्ते की ओर मेरा मार्गदर्शन करेगा। और जब मूसा मदयन के पानी (के कुएं) पर पहुँचे तो उन्होंने वहां (अपने चौपायों को) पानी पिलाते लोगों के एक गुट को देखा और उन (लोगों) से हटकर एक ओर दो स्त्रियों को पाया, जो अपने जानवरों को रोक रही थीं। उन्होंने पूछाः तुम्हारा (अलग खड़े होने से) क्या तात्पर्य है? उन्होंने उत्तर दियाः हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते जब तक ये चरवाहे अपने जानवर निकाल न ले जाएँ और (हम इस लिए यहां आए हैं कि) हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

अपने घर-बार और शहर से पलायन के लिए तैयार रहना, बड़े सुधारकों के कार्यक्रमों में से एक है ताकि भविष्य की कठिनाइयों और कड़ी परिस्थितियों के लिए तैयार हो सकें।

 

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

  1. अपने घर-बार और शहर से पलायन के लिए तैयार रहना, बड़े सुधारकों के कार्यक्रमों में से एक है ताकि भविष्य की कठिनाइयों और कड़ी परिस्थितियों के लिए तैयार हो सकें।

  2. क़दम उठाने के बाद ही दुआ व प्रार्थना सार्थक होती है, प्रयास करने और क़दम उठाने के बजाए दुआ करने का कोई लाभ नहीं है।

  3. महिलाओं व पुरुषों के बीच की सीमा का पालन करना और कार्य स्थान पर उनका एक दूसरे से अधिक मेल-जोल से दूर रहना, एक मान्यता है जैसा कि उन दो लड़कियों ने, जो ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत शुऐब की बेटियां थीं, मर्दों की भीड़ में अपनी भेड़ों को पानी नहीं पिलाया और इस बात की प्रतीक्षा में रहीं कि पुरुष चले जाएं तो वे अपनी भेड़ों को पानी पिलाएं।

  4. आवश्यकता होने पर ईश्वरीय पैग़म्बर की बेटियां चरवाहे का काम कर सकती हैं लेकिन कभी भी अपमान सहन नहीं कर सकतीं और न भीख मांग सकती हैं।

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