Sep १६, २०२० २०:२६ Asia/Kolkata
  • अरब-इस्राईल गठजोड़ का मुक़ाबला करने के लिए ईरान, तुर्की और क़तर को एक संयुक्त मोर्चा बनाना होगा

15 सितम्बर को यूएई-इस्राईल शांति समझौते को औपचारिक रूप दे दिया गया, जिसका लम्बे समय तक मध्यपूर्व की भू-राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

मुख्य रूप से क्षेत्र में ईरान और तुर्की के बढ़ते प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए इस्राईल और अरब देशों के बीच इस तरह के समझौतों की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन के साथ इस्राईल के तथाकथित शांति समझौतों के विपरीत, जो अरब समाज में कभी गहरा प्रभाव नहीं छोड़ सके, फ़ारस खाड़ी के अरब देशों के साथ तालमेल के माध्यम से इस्राईल को केन्द्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है।

संयुक्त अरब अमीरात में राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित करके, इस्राईल दूसरे अरब देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास करेगा।

इसी तरह, यह समझौता, तुर्की और क़तर के लिए एक बुरी ख़बर है। दोनों देश अन्य क्षेत्रीय देशों की रूढ़ीवादी व्यवस्था के सथान पर एक वैकल्पिक विचारधारा विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।

आने वाले वर्षों में अरब-इस्राईल के गठजोड़ के प्रभाव को रोकने के लिए, ईरान, तुर्की और क़तर को न केवल राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में एकजुट होना होगा, बल्कि अपनी रणनीति को भी अधिक धारदार बनाना होगा। क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करेंगे, तो निश्चित रूप से अरब रूढ़िवाद और इस्राईली विस्तारवाद का गठजोड़ पूरे क्षेत्र को आग के समुद्र में धकेल सकता है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अरब-इस्राईल नए गठबंधन से सबसे ज़्यादा नुक़सान ईरान को पहुंच सकता है। हालांकि यूएई ने यह दावा ज़रूर किया है कि यह समझौता, ईरान के मुक़ाबले में नहीं है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने तुरंत रूप से क्षेत्रीय रणनीति और राष्ट्रीय हितों पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभाव को समझने में कोई ग़लती नहीं की।

ईरान के सैन्य अधिकारियों और नेताओं ने इस समझौते की कड़े शब्दों में निंदा करने में कोई झिझक नहीं दिखाई और भविष्य में देश की सुरक्षा को होने वाले किसी भी संभावित ख़तरे के प्रति यूएई को चेतावनी दी।

अमरीका और इस्राईल, ईरान के चारो ओर एक घेरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि इस्राईल क्षेत्र में ऊर्जा और तेल से लेकर, राजनीतिक तथा जासूसी नेटवर्क क़ायम कर सके।  

यहां सबसे अहम सवाल यह कि ईरान, इस्राईल और अमरीका की इस नई साज़िश का मुक़ाबला कैसे कर सकता है?

इस समझौते के सुरक्षा प्रभावों का मुक़ाबला करने के लिए निश्चित रूप से ईरान, इस्राईल और यूएई दोनों पर दबाव बनाएगा, ताकि कोई भी संयुक्त सुरक्षा या रक्षा परियोजना शुरू करने से पहले वह दो बार सोचें।

इस्राईल पर दबाव बनाना ईरान के लिए आसान है, क्योंकि ईरान ने पहले ही इस्राईल को उत्तर से लेकर दक्षिण तक घेरे में ले रखा है।

इसके अलावा, ईरान, क़तर और तुर्की के साथ एक रणनीतिक साझेदारी बना सकता है, क्योंकि यह दोनों देश भी यूएई-इस्राईल सहयोग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। तुर्की और यूएई के बीच लीबिया से लेकर यमन तक टकराव चल रहा है।

दूसरी ओर, इस्लामी प्रतिरोध ने ईरान, सीरिया, इराक़ और यमन से लेकर हिज़्बुल्लाह और हमास का एक मज़बूत गठजोड़ मौजूद है, जिसमें तुर्की और क़तर के शामिल होने से यह रूढ़िवादी अरब-इस्राईल नए गठजोड़ के मुक़ाबले में सबसे मज़बूत मोर्चा बन सकता है।

अगर यह तीनों देश, रूढ़िवादी अरब देशों, इस्राईल और अमरीका का मुक़ाबला करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मतभेदों को भुलाकर, एक प्लेफ़ार्म पर आना होगा। इससे न सिर्फ़ यूएई और इस्राईल को बांधकर रखने में मदद मिलेगी, बल्कि फ़िलिस्तीनी आकांक्षाओं को जीवित रखने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त होगी। msm

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