Sep १७, २०२० १६:३४ Asia/Kolkata
  • क्या ईरान और तुर्की शीया सुन्नी एकता का सफल उदाहरण बन रहे हैं?

ईरान एक शीया बाहुल क्षेत्र है और तुर्की में सुन्नी समुदाय के लोगों की बड़ी आबादी बसती है। दोनों देशों की जनसंख्या लगभग बराबर है। ईरान इस्लामी क्रांति आने से पहले तक अमरीका का बहुत क़रीबी घटक था और क्रांति आने के बाद अमरीका उसका दुशमन बन गया है तो तुर्की भी लंबे समय से अमरीका का क़रीबी घटक और नैटो का संस्थापक सदस्य रहा है मगर रजब तैयब अर्दोग़ान के शासन काल में अब फ़्रांस के राष्ट्रपति मैकक्रां कह रहे हैं कि तुर्की हमारा पार्टनर नहीं रह गया है और उसे कड़ी सज़ा देने की तैयारी की जानी चाहिए।

दरअस्ल तुर्की ने हालिया वर्षों में अपनी स्वाधीन नीतियों पर काम किया है और नैटो का सदस्य होते हुए रूस और अमरीका के बीच इस चतुराई से अपने पत्ते इस्तेमाल कर रहा है कि दोनों प्रतिद्वंद्वियों से उसने बड़े फ़ायदे उठाए हैं।

ईरान की बात जाए तो इस देश पर इस्लामी क्रान्ति आने के बाद अमरीका ने प्रतिबंध लगाए और इन प्रतिबंधों को लगातार बढ़ाता और कठोर करता चला गया। अब तो शायद ही अमरीका के तरकश में प्रतिबंधों का कोई तीर बचा होगा जिसे वह ईरान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सके। मगर ईरान की स्थिति का जायज़ा लीजिए तो चीन ने इस देश से महत्वपूर्ण स्टैटेजिक समझौता किया है, रूस कई क्षेत्रों में ईरान से बड़ा महत्वपूर्ण सहयोग कर रहा है। और तो और ख़ुद अमरीका की ओबामा सरकार ईरान की ताक़त का लोहा मानकर उससे समझौता कर चुकी है और उसने अपने अरब घटकों को बहुत ज़्यादा नाराज़ भी कर दिया था अब यह अलग बात है कि बाद में ट्रम्प ने सत्ता में आकर इस समझौते से अमरीका को अलग कर लिया और बाद में गिड़गिड़ाते रहे कि किसी तरह ईरान से बातचीत और नया समझौता हो जाए। कभी फ़्रांसीसी राष्ट्रपति को, कभी ब्रिटिश प्रधानमंत्री को और कभी जापान के प्रधान को मध्यस्थता के लिए तैयार किया।

ईरान और तुर्की के बीच बड़े अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं जिसे यह दोनों देश 30 अरब डालर के स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों के बीच सीरिया के मुद्दे पर बड़े गंभीर मतभेद हैं मगर इसके बावजूद दोनो ही देशों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए कभी भी मतभेदों को कंट्रोल से बाहर नहीं होने दिया है। इसे दूरदर्शिता और परिपक्वता कहा जा सकता है। इसका फ़ायदा यह हुआ कि मतभेदों से ऊपर उठकर मज़बूत एलायंस के निर्माण का रास्ता भी साफ़ हुआ जिसमें ईरान, तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया के शामिल होने के इशारे मिल गए। ख़ुद सीरिया के संकट के समाधान में दोनों देशों के बीच सहयोग हो रहा है।  

इस सूझबूझ का नतीजा यह निकला कि फ़िलिस्तीन के विषय में दोनों ही देश मज़बूती से आवाज़ उठा रहे हैं और फ़िलिस्तीनी संगठनों को अपने संघर्ष में इन दोनों देशों से बड़ी उम्मीदे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर दोनों देशों ने आवाज़ उठाई और कड़ा संदेश दिया। कश्मीर के मुद्दे पर भी दोनों देशों ने खुलकर अपना पक्ष रखा।

मतलब यह है कि दोनों देशों ने अपने मतभेदों को कंट्रोल किया तो इस बात का अवसर पैदा हुआ कि अधिक महत्वपूर्ण मामलों में दोनों की आवाज़ को एक दूसरे से मज़बूती मिले।

क्या दुनिया के दूसरे हिस्सों में शीया-सुन्नी समुदायों के लिए यह अच्छी मिसाल नहीं है कि वह अपने मतभेदों को कंट्रोल से बाहर न होने दें और ज़्यादा बड़े और समावेशी हितों के बारे में सोचें?

ईरान ने अपने यहां और तुर्की ने भी अपने यहां शीया सुन्नी विवाद को कभी भी बेक़ाबू नहीं होने दिया है बल्कि संपूर्ण इस्लामी हितों पर ध्यान केन्द्रित रखा है। (AH)

नोटः लेखक के विचारों से पार्सटुडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।

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