Oct २४, २०२० ११:३५ Asia/Kolkata
  • आयत क्या कहती हैं? बुरे अतीत वाले लोग बाद में सही मार्ग पर आ कर अपना सुधार कर लें।

उस ईमान व समर्पण का महत्व है जो अंधे अनुसरण नहीं बल्कि ज्ञान व पहचान के आधार पर हो।

सूरए नम्ल की आयत क्रमांक 41 से 43 का अनुवाद:

सुलैमान ने कहा, उसके लिए उसके सिंहासन का रूप बदल दो। देखते हैं कि वह (वास्तविकता को) समझ लेती है या उन लोगों में से है जो नहीं समझ पाते। तो जब वह आई तो कहा गया, क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है? उसने कहा, यह तो मानो वही है और हमें तो इससे पहले ही (सुलैमान की सच्चाई का) ज्ञान दिया चुका था; और हम आज्ञाकारी हो गए थे। और उसे (ईमान लाने से) जिस चीज़ ने रोक रखा था वह उन चीज़ों की उपासना थी जिन्हें वह ईश्वर के अतिरिक्त पूजती थी कि निःसंदेह वह एक काफ़िर जाति में से थी (मगर वह कुफ़्र के बाद ईमान ले आई)।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

यदि समाज में अंधविश्वासी विचार और ग़लत आस्थाएं प्रचलित हो जाएं तो वे सत्य को पहचानने और लोगों के ईमान लाने के मार्ग में रुकावट बन जाती हैं।

 

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

  1. उस ईमान व समर्पण का महत्व है जो अंधे अनुसरण नहीं बल्कि ज्ञान व पहचान के आधार पर हो।

  2. यदि समाज में अंधविश्वासी विचार और ग़लत आस्थाएं प्रचलित हो जाएं तो वे सत्य को पहचानने और लोगों के ईमान लाने के मार्ग में रुकावट बन जाती हैं।

  3. चूंकि मनुष्य में परिवर्तन आता रहता है इस लिए किसी का भी बुरा अतीत, उसके भविष्य के भी बुरे होने का तर्क नहीं हो सकता।

  4. संभव है कि बुरे अतीत वाले लोग बाद में सही मार्ग पर आ कर अपना सुधार कर लें।

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