Oct २८, २०२० ०९:३९ Asia/Kolkata
  • कभी इस्लामी जगत का नेतृत्व करते थे सऊदी अरब और मिस्र मगर अब यह नेतृत्व संभालते नज़र आ रहे हैं तुर्की और ईरान और अरब देशों के मुखिया बन गए हैं नेतनयाहू!

हमें इस्राईल के इंटेलीजेन्स मंत्री एली कोहेन का यह बयान सुनकर कोई हैरत नहीं हुई कि इस समय अरब देश इस्राईल से जो समझौते कर रहे हैं वह क्षेत्र में एतिहासिक परिवर्तनों के दायरे में होने वाली घटनाएं हैं जिनके आर्थिक और सामरिक पहलू हैं।

ईरान और तुर्की के नेतृत्व में बनने वाले मोर्चे के मुक़ाबले में अमरीका की कोशिश से मिस्र, सूडान, बहरैन और इमारात का एलायंस तैयार हो रहा है।

कोहेन ने यह बयान तब दिया है जब ट्रम्प के हवाले से एक बयान सामने आया है कि सऊदी अरब, क़तर, ओमान, मोरक्को और नाइजर अमरीका के राषट्रपति चुनाव में उनकी विजय के बाद तोहफ़े के तौर पर इस्राईल से शांति समझौते का एलान करेंगे।

दुख की बात तो यह है कि हालिया वर्षों का हमारा यह अनुभव रहा है कि अरब-इस्राईल संबंधों के बारे में इस्राईली अधिकारी जो भी ख़ुलासे करते हैं वह सही साबित होते हैं इसलिए हमें इस्राईली इंटैलीजेन्स मंत्री के बयान के बारे में कोई संदेह नहीं है क्योंकि यह अनुमान नहीं बल्कि रियाज़, अबू धाबी, मनामा और दोहा के उनके एलानिया और ख़ुफ़िया दौरों का नतीजा है।

अरब देशों से इस्राईल के जो भी समझौते हो रहे हैं वह इस्राईल का संकट हल करने और उसे इलाक़े में एकांत की स्थिति से निकालने के लिए हैं और हम यह मानते हैं कि सूडान और इस्राईल से समझौते के बारे में जो बातें आ रही हैं वह हमारे लिए चौंकाने वाली हैं। एक बात तो यह सामने आई है कि इस्राईल डेढ़ लाख से अधिक अफ़्रीकियों को निकाल कर सूडान में बसाना चाहता है क्योंकि उनकी वजह से इस्राईल के भीतर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

सूडान की सरकार ने इस पर औपचारिक रूप से सहमति भी जताई है। इसके बदले में सूडान को इस्राईल से अनाज मिलेगा। क्या सूडान के लिए इससे भी बड़े अपमान की कोई बात हो सकती है।

हमारी समझ में यह नहीं आता कि आख़िर अमरीका ने इन अरब देशों पर क्या जादू कर दिया है कि वह हर अपमान सहन करने के लिए तैयार हैं लेकिन इस बात पर हरगिज़ तैयार नहीं हैं कि ईरान और तुर्की के नेतृत्व वाले मोर्चे से वार्ता करें और इस समय जब पैग़म्बरे इस्लाम के अपमान की घटनाएं हो रही हैं तो इन दोनों इस्लामी देशों के साथ मिलकर मज़बूत मोर्चा बनाएं और ठोस जवाब दें।

यह बड़े खेद की बात है कि अधिकतर इस्लामी देश तो पैग़म्बरे इस्लाम के विषय पर बोल रहे हैं और विरोध जता रहे हैं मगर मक्का मदीना जैसे पवित्र स्थलों के मेज़बान सऊदी नरेश ने कान में रूई डाल ली है।

नेतनयाहू से अगर वह मदद की उम्मीद कर रहे हैं तो यह इन अरब नेताओं की भूल है क्योंकि नेतनयाहू शायद कुछ महीनों बाद जेल की सलाखों के पीछे नज़र आएंगे मगर सबसे बुरी बात यह है कि नेतनयाहू अरब सरकारों को हथकंडे के रूप में प्रयोग कर रहे हैं और उनका अंदाज़ देखिए तो अरब जगत के नेता के रूप में बयान देते हैं और तुर्की और ईरान के ख़तरे की बात करके इस ख़तरे का मुक़ाबला करने में इस्राईल की केन्द्रीय भूमिका का बखान करते हैं।

हम तो तुर्की और ईरान को मुबारकबाद देंगे जिन्होंने शीया सुन्नी फ़र्क़ को नज़रअंज़ाद करते हुए पूरे इस्लामी जगत के लिए महत्वपूर्ण स्टैंड अपनाया है। जब अरब नेताओं ने अपने सारे मुद्दे कूड़ेदान में डाल दिए हैं और सिर झुकाए ज़िबह होने के लिए नेतनयाहू और ट्रम्प के सामने खड़े हो गए हैं तो फिर इन हालात में इस्लामी जगत के नेतृत्व के लिए ईरान और तुर्की से बेहतर कौन हो सकता है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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