Nov २३, २०२० १९:०५ Asia/Kolkata
  • क्या नेतनयाहू, पोम्पियो और बिन सलमान की तिगड़ी ने ईरान पर हमले को अंतिम रूप दे दिया?

सन् 2008 में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा की जीत की घोषणा के बाद, इस्राईली अधिकारियों को पूरा विश्वास था कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश व्हाइट हाउस छोड़ने से पहले ईरान के परमाणु संयंत्रों पर बमबारी का आदेश ज़रूर देंगे, लेकिन इस्राईली अधिकारियों की यह तमन्ना पूरी नहीं हुई और आज भी ईरानी परमाणु संयंत्र भरपूर क्षमता के साथ न सिर्फ़ खड़े हैं, बल्कि पहले से कहीं अच्छी गुणवत्ता और अधिक मात्रा में यूरेनियम संवर्धन कर रहे हैं।

ठीक 12 साल बाद एक बार फिर दुनिया भर में ऐसी अटकलों का बाज़ार गर्म है कि चुनाव हारने वाले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में बचे अपने कुछ हफ्तों के दौरान, या तो ईरान के परमाणु संयंत्रों के ख़िलाफ़ हमलों का आदेश देंगे या इसके लिए इस्राईल को हरी झंडी दिखा देंगे।

इन अटकलों को ट्रम्प द्वारा हालिया कुछ दिनों के दौरान उठाए गए क़दमों से बल मिला है। ट्रम्प ने अमरीकी रक्षा मंत्री मार्क इस्पर को बर्ख़ास्त कर दिया और पेंटागन के कई अन्य अधिकारियों के तबादले किए। इससे मीडिया में यह संदेश गया कि ट्रम्प ने इस्पर को इसलिए रास्ते से हटा दिया, क्योंकि वह ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की विवादित सैन्य कार्यवाही का कड़ा विरोध कर रहे थे।

इस हफ़्ते अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की क्षेत्रीय देशों की यात्रा और रविवार को इस्राईली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के सऊदी अरब के ख़ुफ़िया दौरे को भी ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी-इस्राईली हमले के अंतिम प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।

नेतनयाहू के सऊदी अरब के ख़ुफ़िया दौरे के दौरान, निओम में हुई त्रिपक्षीय बैठक में नेतनयाहू, बिन सलमान और पोम्पियो ने भाग लिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले चार वर्षों के दौरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इस्राईल ने ट्रम्प पर भारी निवेश किया है, ताकि उन्हें ईरान पर हमला करने के लिए तैयार कर सकें, लेकिन उनके इस निवेश का कोई नतीजा नहीं निकला और वे ट्रम्प को ईरान पर हमला करने के लिए तैयार नहीं कर सके। इसकी एक वजह व्हाइट हाउस और पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारी उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़े हो गए, ताकि अमरीका को एक भयानक युद्ध में झोंकने से बचा सकें।

अब ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अमरीकी अधिकारियों के कड़े विरोध के मद्देनज़र, नेतनयाहू ट्रम्प और फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के समर्थन से ख़ुद को इस आत्मघाती हमले के लिए तैयार कर रहे हैं। फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों विशेष रूप से सऊदी अरब के समर्थन के बिना, इस्राईल, ईरान पर हमले को अंजाम नहीं दे सकता है, इसलिए व्यक्तिगत रूप से सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का समर्थन हासिल करने और सऊदी हवाई सीमा के इस्तेमाल के लिए नेतनयाहू ने सऊदी अरब की यात्रा की है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ट्रम्प के चुनाव हारने के बाद से ईरान के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर संपर्कों, साज़िशों, अटकलों और अफ़वाहों का बाज़ार गर्म है। लेकिन यहां यह बात ध्यान योग्य है कि ईरान पर हमला दुनिया की किसी भी शक्ति के लिए एक आत्मघाती हमले की तरह होगा। क्योंकि पिछले 30 वर्षों के दौरान ईरान, उन सभी देशों के कहीं अधिक शक्तिशाली है, जिन पर अमरीका या इस्राईल ने हमले किए हैं।      

ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की सैन्य कार्यवाही एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है, यही कारण है कि इस्राईली और अमरीकी सैन्य विशेषज्ञों अपने राजनेताओं को ऐसा करने से रोकते रहे हैं। इसके बावजूद, अमरीका या इस्राईल ऐसा कोई क़दम उठाते हैं तो जहां इस्राईल पर लाखों रॉकेट बरसेंगे, वहीं यह क्षेत्र अमरीकी सैनिकों के लिए क़ब्रिस्तान बन जाएगा। msm

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