Nov २४, २०२० १८:४१ Asia/Kolkata
  • ईरान के सामने ट्रम्प की नाकामी के क्या कारण हैं?

पिछले 4 वर्षों के दौरान, ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की नीति आश्चर्यजनक रूप से न सिर्फ़ पूरी तरह से नाकाम हो गई है, बल्कि इसका अंत भी बहुत बुरा हो रहा है।

इस नीति को किसी भी आकलन के आधार पर आकार नहीं दिया गया था, जिससे परमाणु अप्रसार को रोकने, मध्य पूर्व में तनाव को कम करने या अमरीकी हितों को सुरक्षित रखने में मदद मिल सके। इसका केवल एक ही आधार था कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जो भी किया, उसका उलटा किया जाए। ओबामा की प्रमुख विदेश नीति की उपलब्धि वह कूटनीति थी, जिसके नतीजे में समझौता या JCPOA वजूद में आया था, जो एक बहुपक्षीय समझौता था, जिससे इस तरह की तमाम अकटकलें ख़त्म हो गई थीं कि ईरान परमाणु हथियार विकसीत कर सकता है। लेकिन ट्रम्प ने इससे निकलने का एलान करके इसे भारी नुक़सान पहुंचाया।

ट्रम्प प्रशासन ने सिर्फ़ परमाणु समझौते से बाहर निकलना काफ़ी नहीं समझा, बल्कि ईरान पर अधिकतम दबाव डालने के लिए अभूतपूर्व कड़े प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन इस नीति से अमरीका को कोई लाभ नहीं पहुंचा, बल्कि यह नीति हर मोर्चे पर बुरी तरह से नाकाम हो गई।

ईरान ने ट्रम्प के सामने घुटने टेकने के बजाए अपनी परमाणु गतिविधियों में विस्तार करना शुरू कर दिया, जिसके नतीजे में आज उसके पास परमाणु समझौते में निर्धारित की गई सीमा से 12 गुना संवर्धित यूरेनियम है। इसी तरह से ट्रम्प की अधिकतम दबाव की नीति क्षेत्रीय देशों में ईरान के प्रभाव को किसी भी तरह से कम नहीं कर सकी है।

पूरी तरह से मुंह की खाने के बावजूद, ट्रम्प प्रशासन अपने अंतिम दिनों में भी अधिकतम दबाव के लिए हाथ पैर मार रहा है, जो उसके बुरे अंत की दास्तान लिख रहा है। इस सच्चाई को स्वीकार करने के बजाए वह आज भी खोज खोजकर ईरानियों और ईरानी संस्थानों पर प्रतिबंध लगा रहा है, भले से ही वह पहले से लागू प्रतिबंधों में शामिल हों। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिबंध इतने अधिक हो गए हैं कि उसमें कुछ और जोड़ने की गुंजाइश ही नहीं बची है।

अधिकतम दबाव की ट्रम्प प्रशासन की ज़िद और पागलपन ने अमरीका की वैश्विक साख को गंभीर नुक़सान पहुंचाया है। जेसीपीओए को ठुकराने को तब तक पागलपन ही कहा जाएगा, जब तक उससे बेहतर कोई विचार पेश न किया जाए।

हालांकि ट्रम्प प्रशासन अपने शासनकाल के अतिंम दिनों में ईरान के प्रमुख परमाणु संयंत्र नतंज़ पर हमले की योजना पर काम कर रहा है। कहा जा रहा है कि हमले के लिए अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो इस्राईली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के साथ मिलकर भूमि तैयार कर रहे हैं। लेकिन ईरान की संभावित कड़ी प्रतिक्रिया का डर, फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों को खुलकर सहयोग करने से रोक रहा है, जिसके बिना ट्रम्प और नेतनयाहू के लिए आगे बढ़ना संभव नहीं है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ईरान को लेकर ट्रम्प की विदेश नीति, व्यक्तिगत उद्देश्यों और संबंधों के लिए अमरीकी हितों को ताक़ पर रखने का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। पिछले 4 वर्षों में विश्व में अमरीका के अलग-थलग पड़ने और गिरती हुई साख में इस मुद्दे की अहम भूमिका रही है। व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद, ट्रम्प को इसकी कोई परवाह भी नहीं रहेगी, लेकिन अमरीका के राष्ट्रीय हितों पर इसका बुरा असर, लंबे समय तक बाक़ी रहेगा। msm

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