Dec १२, २०२० १५:१२ Asia/Kolkata
  • आयत क्या कहती हैं? अगर मनुष्य का हृदय मरा हुआ हो और वह सत्य को स्वीकार न करना चाहे तो फिर सत्य बात का उस पर कोई प्रभाव नहीं होगा।

खेद की बात है कि काफ़िर उन अंधे बहरे लोगों की तरह हैं जिन्होंने अपने ऊपर सत्य को समझने के सभी दरवाज़े बंद कर लिए हैं और अपने आपको सत्य को सुनने और देखने से वंचित कर लिया है।

सूरए नम्ल की आयत क्रमांक 80 व 81 का अनुवाद:

(हे पैग़म्बर!) निश्चय ही आप अपनी बात मुर्दों को नहीं सुना सकते और न ही बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं जब वे मुंह मोड़ कर जा रहे हों। और न आप अंधों को उनकी गुमराही से हटाकर (सही) मार्ग पर ला सकते हैं। आप तो बस उन्हीं को (अपनी बात) सुना सकते हैं जो हमारी आयतों पर ईमान लाना चाहें। तो वही (सत्य के प्रति) नतमस्तक होते हैं।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

जो भी द्वेष, हठधर्म और अंधे अनुसरण में ग्रस्त हो वह उस मरे हुए व्यक्ति की तरह है जिस पर किसी बात का प्रभाव नहीं होता, या उस जीवित किंतु बहरे व्यक्ति की भान्ति है जो आगे बढ़ता चला जा रहा है।

 

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

  1. क़ुरआने मजीद की संस्कृति में जीवन व मृत्यु, स्वाभाविक व भौतिक ज़िंदगी और मौत को भी कहा जाता है और आध्यात्मिक व नैतिक जीवन व मृत्यु को भी कहा जाता है।
  2. जो लोग सत्य बात को नहीं सुनते हैं और उससे प्रभावित नहीं होते हैं, उन्हें क़ुरआन मरा हुआ बताता है चाहे वे विदित रूप से जीवित ही क्यों न हों।
  3. इसके विपरीत जिन लोगों ने सत्य को समझ लिया और उसके मार्ग में प्रयास करते हुए शहीद हो चुके हैं, वे जीवित हैं और उन्हें ईश्वरीय आजीविका प्राप्त होती है चाहे विदित रूप से वे जीवित लोगों के बीच न हों।

  4. केवल बुद्धि, आंख और कान का होना पर्याप्त नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण बात सत्य के मुक़ाबले में नतमस्तक होने की भावना है और अगर यह न हो तो इंसान अपनी देखी और सुनी हुई बातों तक का इन्कार कर देता है या उनकी ग़लत ढंग से व्याख्या करता है।

  5. सोया हुआ व्यक्ति कोई आवाज़ सुन कर जाग जाता है लेकिन जो सोने का ढोंग कर रहा हो, उसे जितनी भी आवाज़ दी जाए वह कोई उत्तर नहीं देगा।

     

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