Dec १५, २०२० १५:०८ Asia/Kolkata
  • क्या युनिवर्सिटी और मदरसों में समन्वय हो सकता है? ईरान ने इस उपलब्धि से बड़ी सफलताएं हासिल की हैं

18 दिसंबर को ईरान में मदरसों व यूनिवर्सिटियों में एकता व समन्वय दिवस रखा गया है। 41 साल पहले आज ही के दिन 18 दिसंबर 1979 को इमाम ख़ुमैनी के साथियों व इस्लामी क्रांति में प्रभावी योगदान देने वाले डॉक्टर मोहम्मद मोफ़त्तेह, आतंकियों के हाथों शहीद हो गए।

वह धार्मिक मामलों में माहिर होने के साथ साथ यूनिवर्सिटी में ऊंचे दर्जे की शिक्षा हासिल करके मदरसों और यूनिवर्सिटियों में एकता व समन्वय का नमूना बने। ये दोनों ही ईरान में विज्ञान व संस्कृति के अहम केन्द्रों में हैं। डॉक्टर मोफ़त्तेह न सिर्फ़ मदरसों और यूनिवर्सिटियों के बीच एकता व समन्वय का नमूना थे बल्कि विचारों में भी वह ईरानी समाज में इन दोनों संस्थानों के पढ़े हुए लोगों के बीच एकता में विश्वास रखते थे और इस्लामी क्रान्ति को इन्हों दोनों अहम वर्गों के बीच समन्वय का नतीजा मानते थे। डॉक्टर मोफ़त्तेह समाज की भलाई के लिए इस एकता को मज़बूत बनाने पर बल देते थे।

शहीद डाक्टर मुफ़त्तेह

 

मदरसों का इतिहास इस्लामी जगत में बुहत पुराना है ख़ास तौर पर शीयों में पहला मदरसा इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में पांचवीं शताब्दी हिजरी कमरी में क़ायम हुआ जिसे शैख़ तूसी रहमतुल्लाह अलैह ने क़ायम किया था। लेकिन यूनिवर्सिटी को आधुनिक संस्था माना जाता है। पश्चिम के साथ ईरानी समाज के चुनौतीपूर्ण संबंधों से पैदा होने वाली कुछ ज़रूरतें, इस संस्था के वजूद में आने का कारण बनीं जिसका लक्ष्य लोगों को शिक्षा व ट्रेनिंग की नज़र से माहिर बनाना है ताकि वे देश के विकास व तरक़्क़ी का बोझ उठाकर पश्चिम के साथ औद्योगिक, सैन्य व आर्थिक खाई को कम कर सकें।

हालांकि ईरान में पहली यूनिवर्सिटी की जड़ें अमीर कबीर के राष्ट्रपति काल में दारूल फ़ुनून नामक पॉलिटेक्निक की स्थापना से मिलती हैं, लेकिन 1934 में तेहरान यूनिवर्सिटी की स्थापना ईरान में पहली यूनिवर्सिटी के रूप में हुयी। उस वक़्त को 80 साल से ज़्य़ादा का वक़्त गुज़र रहा है। इस बीच तेहरान यूनिवर्सिटी सहित ईरान की दूसरी यूनिवर्सिटियों से बड़ी तादाद में स्टूडेंट पढ़ कर निकले जो देश के विकास के चक्र को चला रहे हैं। लेकिन मदरसे शताब्दियों से युवाओं की शिक्षा व ट्रेनिंग की ज़िम्मेदारी निभाते आ रहे हैं। ईरान में दूर दूर तक यूनिवर्सिटी का निशान भी नहीं था, उस वक़्त से मदरसे युवाओं को शिक्षा देते आ रहे हैं, हालांकि इन शिक्षाओं का दायरा धार्मिक मामलों तक सीमित था और आधुनिक शिक्षा उसमें नहीं मिलती थी।  

ईरान के क़ुम नगर का धर्मिक शिक्षा केन्द्र 99 साल पहले स्थापित किया गया

 

ईरान में इम्पोर्टेड एजुकेशन संस्था के रूप में यूनिवर्सिटी की स्थापना और एजुकेशन सिस्टम, शिक्षकों और छात्रों पर छाये ग़ैर धार्मिक रूझान से समाज में यह मानसिकता बनी कि यूनिवर्सिटी और मदरसे दो ऐसी संस्थाएं हैं जिनमें आपस में नहीं बन सकती, क्योंकि यूनिवर्सिटी के वजूद की बुनियाद, विज्ञान और तर्क पर है जबकि मदरसे की बुनियाद आस्था और उपासना पर टिकी है। यह मानसिकता यूनिवर्सिटी की स्थापना के दो दशकों तक समाज में मौजूद रही लेकिन बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक के बाद से यूनिवर्सिटियों में धार्मिक रूझान वाले सदाचारी छात्रों के दाख़िला लेने और मदरसों के बच्चों के वहाँ विज्ञान से परिचित होने से धीरे-धीरे इन दोनों संस्थाओं के बीच संबंधों पर जमी बर्फ़ पिघलने लगी और दोनों संस्थाओं के बीज समन्वय बनाने वाले नमूने सामने आए। इस बीच ईरान में बढ़ते ज़ुल्म के माहौल और मदरसों के छात्रों के साथ मिलकर यूनिवर्सिटी के छात्रों की ओर से देश की राजनैतिक व्यवस्था की समीक्षा से यह संबंध और मज़बूत हुए।

देश के राजनैतिक मंच पर इमाम ख़ुमैनी का उदय और यूनिवर्सिटी के संबंध में उनका सकारात्मक नज़रिया तथा उनकी ओर से मदरसों के छात्रों और यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच सहयोग पर ताकीद से, दोनों संस्थाओं में फैली नकारात्मक मानसिकता हार गयी। दूसरी ओर एक वरिष्ठ धर्मगुरू की ओर से क्रांतिकारी विचारों ने यूनिवर्सिटियों के छात्रों के बीच उनकी पोज़ीशन को मज़बूत किया क्योंकि ये छात्र समाज पर छाए हुए अत्याचारी माहौल से ख़ुश नहीं थे। इमाम ख़ुमैनी इस बात को समझ चुके थे कि देश को मुक्ति दिलाने, छाए हुए राजनैतिक भ्रष्टाचार पर क़ाबू पाने और लोगों को संगठित करने के लिए यूनिवर्सिटी और मदरसे के बीच एकता व समन्वय ज़रूरी है, इसलिए इस बिन्दु पर इमाम ख़ुमैनी अपने संघर्ष की शुरूआत से ही बल देते थे।

इमाम ख़ुमैनी के साथ डाक्टर मुफ़त्तेह

 

आयतुल्लाह डॉक्टर मुफ़त्तेह, इमाम ख़ुमैनी के मुख्य शिष्यों में थे, जो उनके इस विचार के ध्वजवाहक बने। डॉक्टर मुफ़त्तेह का मानना था कि यूनिवर्सिटी के शिक्षक स्टूडेंट इस्लामी शिक्षा हासिल करके और अपने भीतर नैतिकता पैदा करके, देश के भविष्य के लिए स्टूडेंट वर्ग के बीच एक प्रतिबद्ध पीढ़ी को ट्रेनिंग दे सकते हैं। इसी तरह मदरसों के छात्र भी यूनिवर्स्टियों में आधुनिक शिक्षा हासिल करके, धार्मिक शिक्षा का बेहतर ढंग से प्रचार-प्रसार कर सकते हैं।

डॉक्टर मुफ़त्तेह ने “मस्जिद और यूनिवर्सिटी के बीच समन्वय” शीर्षक के तहत लेख में, जो सन 1961 में छपा था, मदरसों और यूनिवर्सिटियों के बीच एकता व समन्वय को ज़रूरी बताते हुए लिखा थाः “अगर यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और धर्मगुरूओं के बीच किसी बात पर मतभेद पैदा हो और बुद्धिजीवी वर्ग अलग रास्ते और धार्मिक वर्ग अलग रास्ते पर चला जाए तो नाकामी का पहला चरण यही होगा।” यह विचार इस्लामी क्रान्ति की सफलता की कुंजी था।

इमाम ख़ुमैनी अपने बरसों के संघर्ष के दौरान इस विचार को व्यवहारिक बनाने और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोगों पर बल देते थे कि यूनिवर्सिटी से जुड़े लोगों से अपना संपर्क मज़बूत करें, उनके संबंध में नकारात्मक दृष्टिकोण न अपनाएं। इसी तरह इमाम ख़ुमैनी यूनिवर्सिटी के लोगों से कहते थे कि मदरसों के साथ संपर्क व विमर्श करें और सामूहिक रास्ते पर आगे बढ़ें। इमाम ख़ुमैनी यूनिवर्सिटी और मदरसे के बीच एकता को इस्लामी क्रान्ति की अहम उपलब्धियों में गिनवाते हुए कहते थेः “मैं यूनिवर्स्टियों और मदरसों के बीच समन्वय व सामंजस्य को बड़ी सफलता मानता हूँ।” इमाम ख़ुमैनी का यह नज़रिया इन दो संस्थाओं के प्रभावी रोल को, सिर्फ़ इस्लामी क्रांति की सफलता में ही नहीं बल्कि भविष्य में इस्लामी क्रान्ति की आकांक्षाओं और समाज की तरक़्क़ी के जारी रहने में भी देख रहा था।           

इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद, मदरसों और यूनिवर्सिटियों के बीच समन्वय, उसके स्वरूप और देश के भविष्य में उसका योगदान, दोनों ओर के वैचारिक हल्क़ों का अहम विषय था। एक वर्ग का यह मानना था कि मदरसों और यूनिवर्सिटियों के बीच समन्वय के लिए ज़रूरी है कि दोनों का विलय हो जाए वरना लंबे समय के लिए सही अर्थ में यह समन्वय हासिल नहीं हो पाएगा। इस म्कैनिकल विचार को समाज में बहुत ज़्यादा समर्थन नहीं मिला। दूसरा नज़रिया यह था कि इमाम ख़ुमैनी की नज़र में मदरसों और यूनिवर्सिटियों के बीच एकता व समन्वय का अर्थ म्कैनिकल एकता नहीं बल्कि देश के विकास का रास्ता तय्यार करने के लिए सामाजिक सामंजस्य के लिए सामाजिक सहयोग और ज्ञान को दिशा देने का उद्देश्य दोनों का एक होना चाहिए, क्योंकि म्कैनिकल अर्थ में एकता से मुश्किल हल नहीं होगी बल्कि दूसरी मुश्किलें पैदा होंगी। इस बुनियाद पर इन दोनों संस्थाओं ने इस्लाली गणतंत्र व्यवस्था के दौरान आपस में सहयोग तो किया लेकिन अपनी पहचान ख़त्म करने व म्कैनिकल विलय से परहेज़ किया।

इस बीच यूनिवर्सिटियों में नेक शिक्षकों व छात्रों और मदरसों के अच्छी सोच वाले छात्रों ने इन दोनों संस्थाओं के बीच समन्वय पैदा करने में प्रभावी योगदान दिया। आयतुल्लाह शहीद मुतह्हरी, आयतुल्लाह शहीद मुफ़त्तेह और आयतुल्लाह शहीद बहिश्ती इस आदर्श के मूल्यवान नमूना थे जो अफ़सोस कि क्रान्ति के शुरू के बरसों में ही आतंकियों के हाथों शहीद हो गए। ये वे हस्तियाँ थीं जिनके विचार व व्यवहार में मदरसों और यूनिवर्सिटी की शिक्षा की झलक नज़र आती थी। इन हस्तियों की शहादत के बाद भी यह रास्ता रुका नहीं बल्कि आगे बढ़ता रहा और मदरसों व यूनिवर्सिटियों के बीच एकता का समर्थन करने वाले नए विचारक भी सामने आए।                   

पिछले दो दशकों में ईरान में यूनिवर्सिटी और मदरसे के बीच एकता व समन्वय का वास्तविक प्रतीक, स्वर्गीय डॉक्टर दाऊद फ़ैरही थे। उन्होंने धार्मिक शिक्षा के साथ साथ तेहरान यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में डॉक्ट्रेट किया।

डाक्टर फ़ैरही

 

उन्होंने इस विषय पर किसी तरह की बहस को जन्म देने के बजाए, ख़ुद ही मदरसे और यूनिवर्सिटी के बीच वास्तविक एकता का प्रतीक बन गए। उन्होंने साबित किया कि यूनिवर्सिटी और मदरसे में इमाम ख़ुमैनी के मानने वाले आज भी उनके रास्ते पर चल रहे हैं और मुफ़त्तेह जैसे शहीद के ख़ून से ऐसे सैकड़ों छात्रों की ट्रेनिंग हुयी है जो इन दोनों संस्थाओं के बीच एकता के ध्वजवाहक हैं। अफ़सोस कि डॉक्टर दाऊद फ़ैरही कोरोना वायरस से इस दुनिया से चल बसे और हम उनके वजूद की बर्कत से वंचित हो गए।

 

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