Jan १८, २०२१ ०८:५४ Asia/Kolkata
  • ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर यूरोप और इस्राईल ने क्यों खड़ा कर दिया तूफ़ान? क्या परमाणु बम बनाने के क़रीब है तेहरान? सैन्य अभ्यास और लंबी रेंज के मिसाइलों से क्या है ईरान का संदेश?

ईरानी प्रशासन ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए को औपचारिक रूप से सूचना दी है कि वह यूरेनियम उत्पादन का नया कारख़ाना लगा रहा है। दूसरी ओर जो बाइडन की नई टीम के कुछ अधिकारियों ने बयान दिया है कि ईरानी अधिकारियों से उन्होंने ख़ामोशी के साथ संपर्क करना शुरू कर दिया है।

इस बीच इस्राईल और यूरोपीय देशों ने एक तूफ़ान खड़ा कर दिया है और बार बार मांग कर रहे हैं कि ईरान यूरेनियम उत्पादन का कारख़ाना न लगाए क्योंकि यह तो परमाणु डील के ख़िलाफ़ है, इससे परमाणु बम बनाया जा सकता है।

ईरान ने इन सरकारों विशेष रूप से ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी के शोर शराबे को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए कहा कि यूरेनियम उत्पादन का कारख़ाना लगाना परमाणु समझौते का उल्लंघन नहीं है क्योंकि यह काम नागरिक लक्ष्यों के लिए किया जा रहा है।

यूरोपीय देशों की पीड़ा का मुख्य कारण यह है कि उन्हे यक़ीन हो गया है कि वर्ष 2018 में ट्रम्प प्रशासन का परमाणु समझौते से बाहर निकलना और ईरान पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह फ़्लाप साबित हुआ है, इसके उलटे परिणाम निकले हैं। ईरान अब बीस प्रतिशत के ग्रेड तक संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन कर रहा है और अगर वह परमाणु बम बनाने का फ़ैसला कर ले तो एक साल से कम अवधि में बना लेगा।

यूरेनियम उत्पादन के कारख़ाने का इस्तेमाल सामरिक और नागरिक दोनों लक्ष्यों के लिए हो सकता है। परमाणु बम के निर्माण में यह कारख़ाना संवर्धित यूरेनियम के साथ दूसरा महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। ईरान के इस क़दम से यूरोपीय देशों पर बिजली गिरी है। अब वह ईरान पर और बाइडन प्रशासन दोनों पर दबाव डालना चाहते हैं कि परमाणु मुद्दे पर वार्त शुरू हो जाए और दोनों पक्ष परमाणु समझौते का पालन शुरू कर दें।

परमाणु समझौते की बहाली के मसले में सबसे चिंता का विषय यूरोपीय देशों की वह शर्तें हैं जिनका उल्लेख फ़्रांस के विदेश मंत्री जान एफ़ लोदरियान ने किया। उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि केवल परमाणु समझौते की बहाली काफ़ी नहीं है ईरान से उसकी मिसाइल ताक़त और क्षेत्रीय प्रभाव के बारे में भी गंभीरता से बात करनी होगी।

फ़्रांस के विदेश मंत्री ने जो कुछ कहा है वह केवल यूरोप की मांग नहीं बल्कि इस्राईल का भी आग्रह है ताकि ईरान अपनी विशाल, व्यापक और बहुत मज़बूत रक्षा क्षमताओं से वंचित हो जाए। इसी तरह पूरे इलाक़े में फैले ईरान के मज़बूत घटक उससे अलग हो जाएं। इनमें मुख्य रूप से हिज़्बुल्लाह, अंसारुल्लाह हश्दुश्शअबी और फ़िलिस्तीनी संगठनों का नाम लिया जा सकता है।

ईरान जिस मोर्चे का नेतृत्व कर रहा है और जिसे प्रतिरोधक मोर्चा कहा जाता है वह आज इतना ताक़तवर हो चुका है कि इसकी अतीत में कोई मिसाल नहीं है। इसीलिए इस्राईल पर ख़ास तौर से पागलपन सवार है। इस्राईल यह मांग भी करने लगा है कि परमाणु मुद्दे पर होने वाली वार्ता में उसे भी शामिल किया जाए। इमारात और सऊदी अरब भी इसी प्रकार की इच्छा ज़ाहिर कर चुके हैं मगर इन मांगों पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है।

ईरान ने तो इस पर दो तरह से जवाब दिया है।

एक तो ईरान ने बहुत बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया जिसमें 1800 किलोमीटर दूरी तक मार करने वाले मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ जो इस्राईल के हर कोने तक पहुंचने में सक्षम हैं।

दूसरे ईरान की सिपाहे पासदारान फ़ोर्स के एरोस्पेस विभाग के कमांडर जनरल हाजीज़ादे ने कहा कि ईरान पूरे इलाक़े में मौजूद सारी अमरीकी छावनियों को कुछ ही क्षणों के भीतर ध्वस्त कर देने में सक्षम है और ईरान एक साथ पांच सौ मिसाइल फ़ायर करने की क्षमता हासिल कर चुका है।

हमें नहीं मालूम कि इस संदेश की गहराई को इस्राईल और यूरोपीय देशों ने समझा है या नहीं मगर हमें यह पता है कि ईरान एक महान क्षेत्रीय ताक़त बन चुका है जो अपनी रक्षा करने में सक्षम है। यूरोपीय देशों की ज़बान से जो इस्राईली शर्तें पेश की जा रही हैं ईरान उन पर हरगिज़ विचार नहीं करेगा बल्कि वह इन शर्तों को गंभीरता से लेने वाला नहीं है।

रायुल यौम

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