Mar २०, २०२१ १५:२३ Asia/Kolkata

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने कहा है कि वर्ष 1399 कोरोना वायरस की महामारी और अमरीका के अत्यंत कड़े दबाव, दोनों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की क्षमताओं के उजागर होने का साल है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने हिजरी शम्सी कैलेंडर के नए साल के आरंभ के उपलक्ष्य में अपने संदेश में वर्ष 1399 हिजरी शम्सी (21 मार्च 2020 से 20 मार्च 2021 तक) को कोरोना वायरस की महामारी और अमरीका के अत्यंत कड़े दबाव, दोनों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की क्षमताओं के उजागर होने का साल क़रार दिया। उन्होंने कहा कि आज ख़ुद दुश्मन खुल कर यह बात मान रहे हैं कि अधिकतम दबाव की नीति विफल हो गई है।

 

सन 1400 हिजरी शम्सी की शुरुआत पर इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का संदेश निम्नलिखित हैः

 

बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

सारी प्रशंसाएं ब्रह्मांड के रचयिता ईश्वर के लिए हैं और दुरूद व सलाम हो पैग़म्बर मुहम्मद और उनके पवित्र परिजनों पर।

हे दिलों व आंखों को बदलने वाले! हे रात व दिन का संचालन करने वाले! हे साल और परिस्थितियों को बदलने वाले! हमारी स्थिति को बेहतरीन स्थिति में बदल दे।

अपने सभी प्रिय देश वासियों विशेष कर शहीदों और अपने शरीर के अंगों का बलिदान देने वाले सिपाहयों के परिजनों और ख़ुद शारीरिक रूप से अपंग हो जाने वाले जांबाज़ों और (थोपे गए युद्ध में भाग लेने वाले) सभी बलिदानी सिपाहियों और उन सभी राष्ट्रों को, जो ईदे नौरोज़ मनाते हैं, ईदे नौरोज़ और नए साल के आगमन की बधाई देता हूं। इस साल हमारी यह ईद (नौरोज़) शाबान महीने की ईदों के पवित्र अवसर पर आई है और हमें आशा है कि ईश्वर की इच्छा से यह अवसर हमारे नए साल के लिए भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से असंख्य बरकतों का कारण बनेगा। सन 1400 (हिजरी शम्सी) इस लिहाज़ से बहुत पावन है कि इसमें 15 शाबान की तारीख़ दो बार आएगी और हमारी जनता, इमाम महदी अलैहिस्सलाम का शुभ जन्म दिवस दो बार मनाएगी।

सन 1399 (हिजरी शम्सी) विभिन्न और कुछ ऐसी घटनाओं के साथ अपने अंत को पहुंचा है जो बेजोड़ हैं। इन्हीं घटनाओं में से एक, जो वास्तव में हमारे राष्ट्र के लिए बिल्कुल नई है, कोरोना की महामारी है, जिसने पूरे राष्ट्र की ज़िंदगी को प्रभावित किया है। लोगों का काम-काज, पढ़ाई का माहौल, धार्मिक समारोहों, यात्राओं, स्पोर्ट्स और देश के अनेक अन्य मामलों को प्रभावित किया और देश में रोज़गार को बड़ा नुक़सान पहुंचाया। लेकिन सबसे ज़्यादा तकलीफ़ वाली बात हमारे दसियों हज़ार नागरिकों की मौत है जिसने दसियों हज़ार परिवारों को दुखी और शोकाकुल कर दिया। मैं उन सभी प्रिय घरानों से संवेदना प्रकट करता हूं और उनके दुख में सहभागी हूं। ईश्वर उन्हें धैर्य व प्रतिफल प्रदान करे और मरने वालों को क्षमा प्रदान करके उन्हें अपनी दया का पात्र बनाए।

सन 1399 (हिजरी शम्सी) एक दृष्टि से राष्ट्र की क्षमताओं के उजागर होने का साल था। इसी बड़ी परीक्षा यानी कोरोना की महामारी में वास्तव में हमारे प्रिय राष्ट्र, उपचार व स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर अध्ययनकर्ताओं व वैज्ञानिकों तक, जनता के एक एक आदमी से लेकर, संघर्ष करने वाले संगठनों और सेवा प्रदान करने वाले गुटों तक सभी ने इस अप्रिय घटना को नियंत्रित करने में अपनी महान क्षमताओं व योग्यताओं को साबित कर दिया और वह भी प्रतिबंधों के समय में। शत्रु के अधिकतम दबाव की हालत में! प्रतिबंधों के बावजूद और देश से बाहर की संभावनाओं से लाभ उठाने की सभी राहों के बंद होने के बावजूद हमारे राष्ट्र ने, हमारे वैज्ञानिकों ने, हमारे डॉक्टरों व नर्सों ने, पैरामेडिकल स्टाफ़ ने, प्रयोगशालाओं और रेडियोलोजी के केंद्रों में काम करने वाले लोगों ने और उन सभी लोगों ने जो चिकित्सा के विभाग से जुड़े हुए हैं, वास्तव में एक बड़े अनुभव का सामना किया और बेजोड़ क्षमताओं व योग्यताओं का प्रदर्शन किया। इसी तरह देश ने दुश्मन के अधिकतम दबाव के मुक़ाबले में भी अपनी क्षमताओं को सिद्ध कर दिया।

हमारे दुश्मन, जिनमें सबसे आगे अमरीका है, अपने अधिकतम दबाव से हमारे राष्ट्र को झुका देना चाहते थे। आज वे ख़ुद और उनके यूरोपीय दोस्त कहते हैं कि अधिकतम दबाव विफल हो गया। हम तो जानते ही थे कि विफल होगा और हम दुश्मन को पराजित करने का संकल्प भी रखते थे। हम जानते थे कि ईरानी राष्ट्र, प्रतिरोध करेगा लेकिन आज वे ख़ुद भी मान रहे हैं कि यह अधिकतम दबाव नाकाम हो गया।

सन 99 (1399 हिजरी शम्सी) का स्लोगन “उत्पादन में तेज़ विकास” था। मैं अगर उन अनेक सार्वजनिक, सरकारी और विभिन्न केंद्रों व संस्थाओं की रिपोर्टों के आधार पर जो विभिन्न मार्गों से हम तक पहुंचती हैं, जायज़ा लेना चाहूं तो कहूंगा कि यह स्लोगन किसी हद तक, स्वीकार्य हद तक पूरा हुआ। मतलब यह कि विभिन्न मामलों से संबंधित विभागों में वास्तव में उत्पादन में उछाल आया है, हालांकि वह उतना नहीं है जितनी अपेक्षा थी, यानी जिन जगहों पर यह स्लोगन पूरा हुआ, जो अधिकतर मूल और निर्माणकारी मामलों में था, उसका नतीजा देश के आम आर्थिक हालात और जनता की आर्थिक स्थिति में दिखाई नहीं दिया, यानी यह रफ़्तार महसूस नहीं हुई जबकि हमें अपेक्षा थी कि पैदावार में उछाल, जनता की स्थिति में बेहतरी लाएगा। अलबत्ता उत्पादन में तेज़ विकास और उछाल का नारा, सही अर्थों में एक क्रांतिकारी और बड़ा अहम स्लोगन है। अगर वास्तव में देश में पैदावार में उछाल आ जाए, जो ईश्वर ने चाहा तो ज़रूर आएगा, तो देश की अर्थव्यवस्था पर भी बड़े गहरे प्रभाव डालेगा, देश की मुद्रा का मूल्य बढ़ेगा और अन्य आर्थिक मामलों में भी इसके प्रभाव पड़ेंगे। इसके अलावा राष्ट्रीय आत्म विश्वास भी बढ़ेगा, जनता भी राज़ी रहेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। यानी अगर देश में पैदावार में उछाल हो, ईश्वर की इच्छा से यह हो जाए और आशा है कि यह होगा, तो इसके नतीजे और फ़ायदे बहुत बड़े होंगे।

अब देखना यह है कि 1399 (हिजरी शम्सी) में यह उछाल क्यों नहीं आया? इस लिए कि एक तरफ़ तो रुकावटें थीं और दूसरी तरफ़ सभी विभागों में उत्पादन को समर्थन नहीं मिला। यानी उत्पादन को सभी आवश्यक क़ानूनी और सरकारी समर्थन की भी ज़रूरत होती है और इस बात की भी ज़रूरत होती है कि उत्पादन के रास्ते में मौजूद सभी रुकावटें दूर की जाएं। उदाहरण के तौर पर मान लें कि कोई अधूरी फ़ैक्ट्री, ऐसा कारख़ाना जिसमें उसकी क्षमता का केवल तीस-चालीस प्रतिशत काम हो रहा है या बिल्कुल बंद हो गया है, कुछ युवाओं की हिम्मत और कोशिशों से यह कारख़ाना चलाया जाता है, उनका हौसला बढ़ाया जाता है, हिम्मत बंधाई जाती है और कारख़ाना चलने लगता है। जब उत्पादन शुरू होता है तो अचानक दिखाई देता है कि उस जैसी चीज़ें विदेशों से आयात की जा रही हैं, धोखेबाज़ तस्करों के माध्यम से ये चीज़ें देश में लाई जाती हैं या क़ानून में पाई जाने वाली कमज़ोरियों से फ़ायदा उठा कर क़ानूनी मार्गों से आयात की जा रही हैं। स्पष्ट सी बात है कि उस उत्पाद को बढ़ावा नहीं मिल पाएगा। यह उत्पादन के राह में रुकावट है। यानी जो काम किया गया, उसमें विफलता हाथ लगती है। इसी तरह समर्थन और उत्साहवर्धन का न होना भी एक समस्या है। उदाहरण के तौर पर पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहन न होना। उत्पादन के काम में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है। जो लोग निवेश कर सकते हों, उनका हौसला बढ़ाया जाए। ज़रूरी है कि देश में कारोबार के हालात इस प्रकार के हों कि उन्हें हौसला मिले कि वे यह काम करने के लिए आगे बढ़ें, या उनके लिए उत्पादन के ख़र्चे न बढ़ें लेकिन खेद की बात है कि यह काम नहीं किए गए अर्थात जो ज़रूरी काम थे, वे नहीं किए गए। न हौसला बढ़ाया गया और न ही उत्पादन के ख़र्चों के बारे में कुछ सोचा गया। ऐसे ही किसी साल में, 1399 नहीं था, शायद वह 1398 से पहले था, उत्पादन के ख़र्चे, बिक्री के मूल्य से ज़्यादा थे। यह बातें उत्पादन के विकास में रुकावट हैं। हमने सन 1399 में एक तरह से देश में यह आंदोलन शुरू किया। ईरानी राष्ट्र ने एक निर्धारित व सीमित पैमाने पर उत्पादन में उछाल का स्वागत किया। इस को जारी रहना चाहिए।

सन 1400 (हिजरी शम्सी) जो इस नए साल के आगमन से शुरू हो रहा है, वास्तव में एक लिहाज़ से नई सदी का आरंभ है। वास्तव में नई शताब्दी शुरू हो रही है। इस आधार पर देश के मामलों को दीर्घकालीन दृष्टि से देखने की ज़रूरत है। उनका दीर्घकालीन दृष्टि से जायज़ा लेने की ज़रूरत है। सन 1400 बहुत ही अहम और संवेदनशील साल है। उन चुनावों की वजह से भी जो इस साल के आरंभ में होने जा रहे हैं। सन 1400 के (तीसरे महीने) ख़ुर्दाद (मई-जून) में अहम चुनाव होंगे। यह चुनाव देश की परिस्थितियों और भविष्य पर गहरे प्रभाव डाल सकते हैं। नई सरकार सत्ता में आएगी। ईश्वर की इच्छा से ताज़ा दम और विभिन्न भावनाओं व संकल्पों के साथ देश में नई सरकार, प्रशासनिक मामलों की ज़िम्मेदारी संभालेगी। इस लिए एक दृष्टि से इस साल के चुनाव बहुत अहम व संवेदनशील हैं। ईश्वर ने चाहा तो मैं चुनाव के बारे में बाद के भाषण में कुछ बातें करूंगा। इस वार्ता में इतना ही काफ़ी है। इस लिहाज़ से कि सन 1399 में पैदावार में एक हलचल आई और उत्पादन में किसी हद तक उछाल भी आया, सन 1400 में उत्पादन में उछाल के उजागर होने की अच्छी संभावनाएं हैं। इससे ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाना चाहिए। इस मिशन को गंभीरता से आगे बढ़ाना चाहिए। पैदावारी उछाल का भरपूर क़ानूनी व सरकारी समर्थन किया जाए। वर्तमान सरकार भी, जब तक सत्ता में है और अगली सरकार भी अपने गठन के आरंभ से ही पूरी कोशिश करे कि इस राह में मौजूद रुकावटों को दूर करे और आवश्यक समर्थन करे ताकि इंशाअल्लाह सही अर्थों में पैदावारी उछाल आए। इस लिए मैंने इस साल का स्लोगन “उत्पादन, समर्थन और रुकावटों का निवारण” रखा है। यानी स्लोगन पैदावार, समर्थन और रुकावटें दूर करने पर आधारित है। हम उत्पादन को मूलमंत्र क़रार दें, आवश्यक समर्थन करें और पैदावार के रास्ते में मौजूद रुकावटों को दूर करें।

आशा है कि ईश्वर की इच्छा और उसकी दया व कृपा से यह स्लोगन पूरा होगा। इंशाअल्लाह बाद के भाषण में इस बारे में और इसी तरह चुनावों के बारे में कुछ बातें आपकी सेवा में पेश करूंगा।

आशा है कि इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की आत्मा और हमारे महान शहीदों की आत्माएं हमसे राज़ी होंगी और यह साल ईरानी राष्ट्र के लिए शुभ होगा और इमाम महदी अलैहिस्सलाम ईरानी राष्ट्र, अधिकारियों और जनता के लिए दुआ करेंगे, यह राष्ट्र उनकी कृपा का पात्र बनेगा और जिस तरह अतीत में इस राष्ट्र पर उनकी कृपा दृष्टि रही है, उसी तरह भविष्य में भी रहेगी।

वस्सलामो अलैकुल व रहमतुल्लाहे व बरकातोहू

 

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