May ०६, २०२१ १७:०३ Asia/Kolkata
  • कोई अंदाज़ा लगा सकता है कि ईरान-सऊदी अरब वार्ता की ख़बरों पर इस्राईल में कितना आक्रोश है? नेतनयाहू की महत्वाकांक्षी योजना पर बिन सलमान फेरना चाहते हैं पानी?

तेल अबीब में इस्राईली स्ट्रैटेजिक अध्ययन केन्द्र इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ती निकटता पर गहन बहस में लगा हुआ है। सेंटर का कहना है कि यह ईरान के ख़िलाफ़ अरब देशों का एलायंस बनाने की इस्राईल की योजना के लिए बहुत बड़ा झटका है।

दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि इस अध्ययन में यह बात स्वीकार की गई है कि इस्राईल ने ईरान के ख़िलाफ़ बड़े ज़ोर शोर से अरब देशों का जो एलायंस बनाने की कोशिश शुरू की थी वह नाकाम होने वाली है।

तेल अबीब विश्व विद्यालय से संबंद्ध अध्ययन केन्द्र ने कहा है कि हालिया हफ़्तों में ईरान और सऊदी अरब के बीच इराक़ में जो वार्ता हुई है वह वर्ष 2016 में तेहरान रियाज़ संबंधों के टूटने के बाद से बहुत बड़ी घटना है। यह सब कुछ अमरीका में सरकार बदलने के बाद के हालात की वजह से हो रहा है।

अध्ययन केन्द्र ने लिखा कि अमरीका में बाइडन सत्ता में आए तो एक तरफ़ उन्होंने ईरान के परमाणु समझौते में लौटने के लिए वार्ता शुरू कर दी और दूसरी तरफ़ सऊदी अरब की आलोचना में कठोर भाषा का इस्तेमाल किया और कहा कि रियाज़ के संबंध में वाशिंग्टन का बर्ताव बदलना चाहिए। सऊदी अरब ने हालात की नज़ाकत को समझते हुए फ़ौरन क़तर से समझौता कर लिया, यमन के सामने वार्ता का प्रस्ताव रख दिया और ईरान से बातचीत भी शुरू कर दी।

 

अध्ययन केन्द्र का कहना है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच वास्तव में निकटता आ रही है और यह इस्राईल की कोशिशों को बहुत बड़ा धचका है, दूसरी बात यह है कि सऊदी अरब की नीति में इस बदलाव के बाद ईरान के परमाणु समझौते का एक धुरंधर विरोधी ईरान के क़रीब होने लगा है।

अध्ययन में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि सऊदी अरब के ख़िलाफ़ यमन की स्थिति ईरान की मदद की वजह से बहुत मज़बूत हो चुकी है। दूसरी ओर इराक़, सीरिया और लेबनान में भी ईरान को मिलने वाली सफलताएं बहुत बड़ी हैं। इन हालात में ईरान सऊदी अरब को उस देश के रूप में देख रहा है जो इलाक़े में अमरीका की नीतियों और योजनाओं को प्रोत्साहित करता है। ईरान इसी तरह इस्राईल के साथ इमारात और बहरैन के समझौतों को भी नकारात्मक नज़र से देखता है।

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि पिछले दो साल में सऊदी अरब ने बहुत बड़ी मात्रा में हथियार ख़रीदे लेकिन रक्षा के क्षेत्र में वह मज़बूत नहीं हो सका है, आक्रामक शक्ति की तो ख़ैर बात ही अलग है। यमन युद्ध को लेकर वाशिंग्टन से भी रियाज़ के गहरे मतभेद हो गए हैं। गत 28 अप्रैल को सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने जो इंटरव्यू दिया उससे साफ़ ज़ाहिर था कि ईरान के मामले में सऊदी अरब की नीति में बुनियादी बदलाव हुआ है।

 

अध्ययन केन्द्र का कहना है कि पहले चरण में सऊदी अरब और ईरान के एक दूसरे के क़रीब आने की संभावना कम है क्योंकि दोनों के मतभेद बहुत गहरे हैं। क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के मामले में ईरान और सऊदी अरब के बीच कई देशों में प्रतिस्पर्धा है।

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि ईरान से सऊदी अरब की वार्ता शुरू होते ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि अब इस्राईल से संबंध बढ़ाने की रियाज़ की इच्छा पूरी तरह ख़त्म हो गई है। हो सकता है कि रियाज़ सरकार ईरान से संबंध सुधारने के साथ साथ इस्राईल से भी संबंध रखना पसंद करे।

बहरहाल इतना तो तय है कि इस्राईल ने जो योजना बनाई थी अब उसे ठंडे बस्ते में डालकर नए हालात के लिए ख़ुद को तैयार करना पड़ेगा।

इस्राईली पत्रकार ज़हीर अंद्राओस की रिपोर्ट

स्रोतःरायुल यौम

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