Jul २२, २०२१ १७:२१ Asia/Kolkata
  • इस्राईल का पेगासस जासूसी स्कैंडल अरब सल्तनतों की बुनियादें हिला रहा है...जासूसी का यह कार्यक्रम दो धार वाली तलवार कैसे बन गया? सब कुछ बिल्कुल उल्टा भी पड़ सकता है!

यह केवल संयोग नहीं है कि इस्राईल के साथ हालिया महीनों में जिन अरब सरकारों ने अब्राहम शांति समझौता किया था वही पेगसस जासूसी स्कैंडल में बुरी तरह लिप्त पायी जा रही हैं। इस साइबर अपराध के तहत 50 हज़ार से अधिक पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, जजों, राजाओं, मंत्रियों और बड़ी हस्तियों की जासूसी की गई।

अरब सरकारों की बात की जाए तो उनमें अधिकतर सुरक्षा की दृष्टि से बहुत डरी हुई रहती है क्योंकि उन्हें अपने देश की जनता से ही काफ़ी ख़तरा लगा रहता है। यह सरकारें इस्राईल से साइबर जासूसी के प्रोग्राम ख़रीद लेती हैं और आराम से अपने विरोधियों और महत्वपूर्ण लोगों की जासूसी करती रहती हैं।

अब तक दुनिया भर में यह जानकारी फैल चुकी है कि इस्राईल के इस जासूसी प्रोग्राम से कितनी बड़ी संख्या में लोगों को निशाना बनाया गया है। जासूसी का निशाना बनने वालों में मोरक्को नरेश, फ़्रांसीसी राष्ट्रपति, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, इराक़ी राष्ट्रपति, लेबनान के प्रधानमंत्री, भारत में विपक्ष के बड़े नेता राहुल गांधी बहुत से जज, पत्रकार वैग़रा शामिल हैं।

वैसे तो सरकारों ने अपने अपने विरोधियों और आलोचकों की जासूसी करके इस कार्यक्रम का फ़ायदा उठाया मगर इस पूरे स्कैंडल का सबसे ज़्यादा फ़ायदा इस्राईल को मिला जिसे इस तरह जानकारियों का बड़ा भंडार मिल गया। इस्राईल इन जानकारियों को इस्तेमाल करके जासूसी का निशाना बनने वालों को ब्लैक मेल कर सकता है।

आरंभिक जांच से यह पता चला है कि जासूसी का यह कार्यक्रम निशाना बनने वाले व्यक्ति के मोबाइल फ़ोन में वायरस डाल देता है जो मोबाइल के कैमरे और रिकार्डिंग सिस्टम पर कंट्रोल रखता है और वह मोबाइल इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की सारी गतिविधियां आप्रेशन रूम में सुरक्षित होती रहती हैं।

यह बात सही है कि अधिकतर अरब नेता नोकिया का पुराना मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करते हैं और आधुनिक फ़ोन के इस्तेमाल से बचते हैं ताकि ख़ुद को जासूसी का निशाना बनने से बचा सकें मगर जासूसी का नया कार्यक्रम अलग अलग तरीक़ों से उन तक भी पहुंच बना लेता है।

इस समय पश्चिमी दुनिया में इस मुद्दे को लेकर बड़ा हंगामा है क्योंकि इस प्रकार की जासूसी लोकतंत्र और व्यक्तिगत आज़ादी की बुनियादों पर हमले कर रही है, पत्रकारों और राजनैतिक हस्तियों के राज़ छिपे नहीं रह पा रहे हैं। इसीलिए जासूसी में लिप्त लोगों के खिलाफ़ अदालती कार्यवाही शुरू होने जा रही है और क़ानूनों में बदलाव की मांग की जा रही है।

यह भी स्वाभाविक है कि सुरक्षा एजेंसियां और सरकारें जासूसी के कार्यक्रम में लिप्त होने की बात का खंडन करेंगी और इस्राईल की कोई निंदा नहीं करेंगी मगर इस खंडन से कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि इस मामले का पर्दाफ़ाश करने वाले दुनिया के 37 से अधिक मीडिया संस्थान हैं जिनका यह अभियान अभी जारी है।

आने वाले दिनों और हफ़्तों में अभी और भी राज़ सामने आएंगे जिनमें केवल विपक्षी नेताओं और पत्रकारों ही नहीं बल्कि सरकारों, नरेशों और अधिकारियों तथा उनके परिवारों की अलग तसवीर सामने आ सकती है। हम यहां यह भी ज़रूर कहना चाहेंगे कि इस्राईल अपने दोस्तों के भी राज़ नहीं छिपाता बल्कि बदनाम और अपमानित करवाने में आगे आगे रहता है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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