Jul ३०, २०२१ १५:२९ Asia/Kolkata

इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में ईदे ग़दीर का जश्न बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

ईदे ग़दीर के दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के रोज़े की ज़ियारत करने वालों का तांता लगा हुआ था और लोगों ने हज़रत अली अलैहिस्लाम से अपने दिल का दर्द बयान किया, रोज़े के ऊपर बना सुनहरा पंजा लोगों के ध्यान को अपनी ओर आकर्षित करता है, यह वही ताज है जो नादिर शाह दुर्रानी के काल में बना और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के रौज़े को दान कर दिया गया।

ग़दीरे ख़ुम का दिन अल्लाह का सबसे बड़ा दिन है, इसी उपलक्ष्य में मैं यहां आया ताकि अपने मौला अमीरल मोमीनेन की आज्ञापालन का अनुसरण करूं...पवित्र रोज़े की सुन्दरता में से एक उसके तीन दरवाज़े हैं जिनमें एक एक शैख़ तूसी के नाम का दरवाज़ा है जो शीया मुसलमानों के बहुत बड़े विद्वान और धर्मगुरू थे, उनकी क़ब्र भी रोज़े में ही है दूसरा दरवाज़ा बाबुस्साआ है या अली इब्ने मूसा रज़ा दरवाज़ा है और तीसरा दरवाज़ा बाबुल क़िबले के नाम से मशहूर है, यह दरवाज़ा अर्रसूल सड़क के सामने स्थित है।

इस सड़क से इराक़ियों और ईरानियों की अच्छी यादें जुड़ी हुई हैं, इस सड़क के पास इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का पुराना व एतिहासिक घर है और इसी सड़क पर इराक़ के वरिष्ठ धर्मगुरू आयतुल्लाह सीस्तानी का भी घर है, कहते हैं कि ईदे ग़दीर के दिन लोगों की दुआएं क़बूल होती हैं और हम इस दिन सारे बीमारों के स्वस्थ्य होने और घातक कोरोना बीमारी के ख़त्म होने की दुआ करते हैं ताकि दोबारा इराक़ के लिए तीर्थयात्रियों का रास्ता खुल जाए। (AK)

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