Aug २०, २०२१ १०:३५ Asia/Kolkata
  • अमरीका की हार और तालेबान की फ़त्ह से इस्राईल पर छाए ख़ौफ़ की हैं चार प्रमुख वजहें, हवाई जहाज़ के पहिए से लटकने वाले अफ़ग़ान एजेंट फ़िलिस्तीन में आकर बसे ज़ायोनियों से ख़ुश क़िस्मत हैं, कैसे?

इस्राईल का राजनैतिक और सैनिक नेतृत्व इस समय अफ़ग़ानिस्तान के हालात को बड़े चिंता भाव से और बड़ी बारीकी से देख रहा है हालांकि वह हालिया ग़ज़्ज़ा युद्ध में मिली भयानक हार के सदमें से भी अभी निकल नहीं पाया है।

इस्राईल की इस गहरी चिंता के चार प्रमुख कारण हैं,

  1. बीस साल की लड़ाई में आख़िरकार तालेबान ने अमरीकी क़ब्ज़े को शिकस्त दे दी है।
  2. इस्राईल और अमरीका मिलकर अरब और इस्लामी सरकारों को झुकाने और इस्राईल से समझौते करवाने पर ज़ोर दे रहे थे मगर इस बीच प्रतिरोध की विचारधारा को जब इतनी बड़ी कामयाबी मिल गई है तो इससे यह संदेश गया है कि अमरीका और इस्राईल से समझौता करने के बजाए प्रतिरोध की ताक़त से उन्हें परास्त करना ज़्यादा बेहतर है।
  3. तालेबान और फ़िलिस्तीनी संगठन हमास के बीच रिश्ते मज़बूत हो रहे हैं। हमास के नेता इस्माईल हनीया ने तालेबान के नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर से टेलीफ़ोन पर बात की और अमरीका की पराजय की मुबारकबाद पेश की। इससे यह भी पता चल गया कि जिस समय दोनों ही नेता दोहा में मौजूद थे उनके बीच आपसी रिश्ते मज़बूत हो चुके हैं।
  4. अमरीका की शिकस्त का तमाशा अब तो पूरी दुनिया ने देख लिया। ख़ास तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका से सहयोग करने वाले अफ़ग़ान एजेंटों का जो हाल हुआ है वह तो सबके लिए एक सबक़ है कि अमरीका अपने घटकों को कितनी बेरहमी से अकेला छोड़ देता है। स्थिति यह है कि जर्मन राष्ट्रपति ने अमरीकी विमान के पहिए से लटके हुए अफ़ग़ानों के गिर कर मर जाने की घटना को अमरीका और पूरे पश्चिम के लिए कलंक का टीका कहा है।

यह तय है कि काबुल एयरपोर्ट पर अमरीका से सहयोग करने वाले अफ़ग़ानों की दुरगत देख कर इस्राईलियों में गहरा भय फैल गया है। उन्हें यह महसूस हो रहा है कि काबुल एयरपोर्ट के दृष्य दरअस्ल ख़ुद उनका अंजाम भी दिखा रहे हैं। बस अंतर यह है कि इस्राईलियों के पास कोई एयरपोर्ट भी नहीं होगा जहां से वह भाग कर अमरीका या यूरोप चले जाएं।

जब हालिया 11 दिवसीय ग़ज़्ज़ा युद्ध हुआ तो फ़िलिस्तीनी संगठनों के मिसाइल हमलों के कारण इस्राईल के सारे एयरपोर्ट बंद करने पड़े थे जिसके नतीजे में पूरा इस्राईल दुनिया से कट गया था।

अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की शिकस्त, अफ़ग़ान सरकार का गिर जाना, सेना का बिखर जाना, अफ़ग़ान राष्ट्रपति का फरार, विदेशों के कूटनयिकों की वापसी यह सारे दृष्य बहुत जल्द इराक़ और सीरिया में भी दोहराए जाएंगे अलबत्ता कुछ अंतर के साथ मगर इसके नतीजे में इस्राईल बुरी तरह अकेला पड़ जाएगा।

अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने हालिया भाषण में कहा कि वह अमरीका के एक भी सैनिक को किसी एसे देश की रक्षा में मरने की अनुमति नहीं दे सकते जहां का राष्ट्रपति फ़रार हो जाए। हो सकता है कि यही जुमला जो बाइडन उस सयम भी दोहराएं जब इस्राईल में भी अफ़ग़ानिस्तान का दृष्य दोहराया जाएगा।

अमरीका की शिकस्त से फिर साबित हुआ कि अमरीका अब थानेदार का रोल निभाने की पोज़ीशन में नहीं रह गया है। अब चीन, रूस, ईरान, भारत, पाकिस्तान और तुर्की जैसी बड़ी ताक़तें सामने आ चुकी हैं।

अमरीकी युग अब आख़िरी सांसें ले रहा है। 1980 और 1990 के दशक में उसे कम्युनिस्ट शासनों के ख़िलाफ़ जो विजय मिली थी सब ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है।

मध्यपूर्व में पुलिसमैन की अमरीकी भूमिका का सबसे ज़्यादा फ़ायदा इस्राईल ने ही उठाया था तो अब इन बदलते हालात में वही सबसे ज़्यादा नुक़सान भी उठाएगा। इस्राईल में आकर बसने वालों को भागने के लिए न एयरपोर्ट मिलेंगे न विमानों के पहिए। बल्कि उनके सामने एक ही रास्ता होगा भूमध्य सागर का अतः सैयद हसन नसरुल्लाह के मशविरे पर अमल करते हुए उन्हें तैराकी सीख लेना चाहिए।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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