Oct ०१, २०२१ १७:३४ Asia/Kolkata

अरबईने हुसैनी ख़त्म हो गया लेकिन उसकी सुन्दरता और प्रभाव अब भी जारी है।

वर्षों से यह नारा व्यवहारिक हो रहा है कि इमाम हुसैन की मुहब्बत हमको एक स्थान पर जमा करती है और हर साल इसके प्रभाव ज़्यादा ही सुन्दरता से सामने आ रहे हैं, इसकी मिसाल फ़िलिस्तीन के सुन्नी भाईयों और क़बीलों के सरदारों का अरबईन के मिलियन में शामिल होना और मार्च के रास्ते में निदाउल अक़सा नामक मौक़िब लगाना है।

हम फ़िलिस्तीन से हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ज़ायरों में शामिल होने और उनकी सेवा के लिए आए हैं, हमने यह मौक़िब पैग़म्बरे इस्लाम के रास्ते पर चलते हुए स्वतंत्रताप्रेम, विलायत, स्वाधीनता, सम्मान और ईमान में सुधार के नारों के साथ लगाया है, हमारे दिल व जान इमाम हुसैन और फ़िलिस्तीन के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं, कर्बला से बैतुल मुक़द्दस की दूरी 831 किलोमीटर है और इस साल फ़िलिस्तीन के सुन्नी मुसलमान भाईयों ने पोल नंबर 831 में शीया मुसलमानों के साथ मिलकर लब्बैक या हुसैन की आवाज़ बुलंद की।

कर्बला के गवर्नर इंजीनियर नसीफ़ बासिम अलख़ेताबी का कहना था कि हम अपने फ़िलिस्तीनी भाईयों का भव्य स्वागत करते हैं, आप अपने भाईयों और दोस्तो के बीच हैं, आप अपने दोस्त देश इराक़ में मौजूद हैं जिसके लोग हर दिल अज़ीज़ हैं। एक अन्य फ़िलिस्तीनी अधिकारी का कहना है कि निदाउल अक़सा नामक मौक़िब लगाने का मक़सद, उस रास्ते पर चलना जिसका गंतव्य आज़ादी और सफलता है, ज़ायोनी शासन तबाह हो जाएगा और निश्चित रूप से हम इस रास्ते पर कामयाब होंगे।

मौकिब के साथ ही फ़िलिस्तीनियों ने प्रतिरोध के शहीदों और ज़ायोनियों के अपराधों को याद करने के लिए प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसको रास्ते से गुज़रते हुए हर तीर्थयात्री ने देखा। एक अन्य फ़िलिस्तीनी अधिकारी का कहना है कि हम सब मुसलमान हैं, हमारे दिल एक दूसरे के लिए साफ़ हैं, हम अपने इराक़ी भाईयों और स्वतंत्रता के मतवालों के साथ अरबईन मार्च में शामिल हैं, यह इसी अभियान की एक निशानी है।

अरबईन का मतलब सिर्फ़ कर्बला की ओर पैदल यात्रा करना नहीं है, अरबईन मार्च, अत्याचारों  के मुक़ाबले में प्रतिरोध के दृश्यों को पेश करता है और यह दुनिया के अत्याचारग्रस्तों के लिए आशा की किरण में बदल चुका है, अरबईन मिलियन मार्च में फ़िलिस्तीन के सुन्नी मुसलमानों की ओर से निदाउल अक़सा नामक मौक़िब का आयोजन, इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के नारे को व्यवहारिक बनाना है जिसमें वह कहते हैं कि बैतुल मुक़द्दस का रास्ता कर्बला से होकर गुज़रता है।

 

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