Nov ०८, २०२१ २०:३२ Asia/Kolkata
  • अरब टीकाकार अब्दुल बारी अतवान का जायज़ाः इराक़ी प्रधानमंत्री पर जानलेवा हमले में कौन लिप्त है? क्या इराक़ की हश्दुश्शाबी फ़ोर्स को मिटा देना चाहता है अमरीका?

तीन ड्रोन विमानों ने इराक़ के प्रधानमंत्री मुसतफ़ा अलकाज़ेमी के आवास पर हमला कर दिया जिसमें प्रधानमंत्री अलकाज़ेमी बाल बाल बच गए। इराक़ी सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा है कि उन्हें अंदाज़ा हो गया है कि इसमें कौन लोग लिप्त हैं। यह दावा जांच शुरू होने से पहले ही कर दिया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता ने हश्दुश्शाबी फ़ोर्स को आरोपी ठहराने की कोशिश जिसका गठन दाइश का सफ़ाया करने के लिए किया गया था और जिसे ईरान से क़रीब माना जाता है।

यह ड्रोन हमला ठीक उस समय हुआ जब इराक़ के विभिन्न भागों में संसदीय चुनाव के नतीजों को लेकर राजनैतिक संकट की स्थिति है जो सबको कमज़ोर कर रही है और यह अमरीका का बहुत पुराना खेल है।

ड्रोन हमले से एक दिन पहले बग़दाद के ग्रीन ज़ोन इलाक़े में हश्दुश्शाबी से जुड़े प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुईं जिसमें सुरक्षा बलों की फ़ायरिंग में तीन लोग मारे गए और 160 से अधिक घायल हो गए।

अलकाज़ेमी पर हमले के ज़िम्मेदारों के बारे में तीन संभावनाएं हैं।

1 हो सकता है कि हश्दुश्शाबी में शामिल अनेक संगठनों में से किसी संगठन ने यह हमला किया हो ताकि अलकाज़ेमी को कड़ा संदेश दिया जाए कि उसके हाथ लंबे हैं और वह अपने शहीदों का इंतेक़ाम ले सकता है।

2  हो सकता है कि यह हमला ख़ुद अलकाज़ेमी के तहत काम करने वाली किसी एजेंसी ने दिखावे की कार्यवाही के रूप में किया हो तकि अलकाज़ेमी को हमदर्दियां हासिल हों और वह दूसरी बार भी प्रधानमंत्री बन जाएं।

3  हो सकता है कि इस हमले में अमरीका लिप्त हो जिसका मक़सद हश्दुश्शाबी फ़ोर्स को ख़त्म करना हो ताकि यह फ़ोर्स इराक़ में वही रूप धारण न कर ले जो लेबनान में हिज़्बुल्लाह का है। संभव है कि इस हमले को बहाना बनाकर वह हश्दुश्शाबी के ख़िलाफ़ कोई बड़ी कार्यवाही की योजना बना रहा हो।

जो लोग पहली संभावना की ओर इशारा करते हैं और हश्दुश्शाबी को हमले का ज़िम्मेदार मानते हैं जिनमें सऊदी अरब का अलअरबिया चैनल बहुत आगे है वह हश्दुश्शाबी से जुड़े असायबे अहलुल हक़ संगठन के नेता क़ैस ख़ज़अली के बयान का हवाला देते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी को भी अलकाज़ेमी की हत्या करने की चिंता नहीं है जिनका टर्म ख़त्म होने के क़रीब है और अगर कोई उनकी हत्या करना चाहेगा तो इसके लिए ड्रोन विमान की ज़रूरत नहीं है बल्कि बड़े सस्ते तरीक़े से उनकी हत्या की जा सकती है।

जो लोग यह मानते हैं कि अलकाज़ेमी ने ख़ुद ही यह हमला करवाया होगा वह चुनाव आयोग के बयान का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया कि चुनाव में कोई गडबड़ी नहीं हुई। अब अलकाज़ेमी की कोशिश है कि इस हमले के बाद चुनावों पर एतेराज़ का सिलसिला बंद हो जाए और वह गठबंधन सरकार बनाए जो ईरान के प्रभाव से पूरी तरह दूर हो।

जो लोग तीसरी संभावना को प्रबल मानते हैं यानी इस हमले में अमरीका को लिप्त मानते हैं वह इशारा करते हैं कि हश्दुश्शाबी अमरीका की आंख का कांटा है जिसने दाइश का सफ़ाया करने के बाद हालिया दिनों सीरिया के तनफ़ इलाक़े में अमरीकी सैनिक छावनी पर हमला किया, उससे पहले एनुल असद छावनी को भी निशाना बनाया। इन हालात के कारण अमरीका इराक़ से निकलने पर मजबूर हो रहा है और उसकी कोशिश है कि हश्दुश्शाबी का सफ़ाया हो जाए ताकि उसे इराक़ से बाहर न निकलना पड़े।

एक इराक़ी टीकाकार ने कहा कि अमरीका कोशिश में है कि मुक़तदा सद्र की पार्टी, अलहलबूसी की पार्टी और कुर्द नेता मसऊद बारेज़ानी की पार्टी मिलकर सरकार बनाएं और अलकाज़ेमी दोबारा प्रधानमंत्री बन जाएं मगर इस योजना के मार्ग में हश्दुश्शाबी सबसे बड़ी रुकावट है। अब अमरीका चाहता है कि हश्दुश्शाबी का प्रभाव ख़त्म हो जाए तो उसकी योजना आसानी से पूरी हो सकती है।

बहरहाल अभी जांच जारी है और उसका नतीजा आना बाक़ी है नतीजा आने के बाद ही सही पता चलेगा कि हमले की हक़ीक़त क्या है?।

हश्दुश्शाबी को कमज़ोर करने का मतलब ईरान को ललकारना होगा। एसी स्थति में ईरान क्या जवाब देगा यह अभी मालूम नहीं है। बहरहाल इराक़ में हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं।

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