Jan १८, २०२२ १७:०१ Asia/Kolkata
  • लातों के भूत बातों से नहीं मानते, जिनके घर शीशे के होते हैं वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारा करते

प्रिय प्राठको आपको अवश्य याद होगा कि 26 मार्च 2015 से सऊदी अरब ने यमन के ख़िलाफ पाश्विक हमला आरंभ कर रखा है।

इन वर्षों में सऊदी अरब और उसकी अगुवाई में बने गठबंधन के पाश्विक हमलों में दसियों हज़ार यमनी अपनी जान से हाथ धो चुके हैं, यमन की अधिकांश आधारभूत सेवायें व संसाधन तबाह हो चुके हैं, यही नहीं सऊदी अरब ने यमन का कड़ा हवाई, ज़मीनी और समुद्री परिवेष्टन कर रखा है जिसकी वजह से भी यमन की मज़लूम जनता को विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना है।

रोचक बात है कि सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना सऊदी अरब ने अपने पाश्विक हमलों को आरंभ कर रखा है और सुरक्षा परिषद ने एक बार भी नहीं कहा कि ये हमले ग़ैर कानूनी हैं। यही नहीं उसने एक बार भी इन हमलों की भर्त्सना तक नहीं की। दूसरे शब्दों में सऊदी अरब और उसके घटक लगभग सात वर्षों से यमन की मज़लूम जनता के खून से होली खेल रहे हैं और आजतक अमेरिका और ब्रिटेन सहित मानवाधिकारों की रक्षा का राग अलापने वाले किसी भी देश ने एक बार भी सऊदी अरब के पाश्विक हमलों की निंदा व भर्त्सना नहीं की मगर यमनी सेना के शूरवीर जवानों ने जब भी बड़ा जवाबी हमला करके सऊदी अरब और उसके घटकों के हमलों का जवाब देने का प्रयास किया तो मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वालों ने तुरंत जवाबी हमलों की निंदा की।

शोचनीय बिन्दु है कि जब सऊदी अरब और उसके घटकों के हमलों में यमनी लोग मारे जाते हैं तो मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाले उसके समर्थकों को सांप सूंघ जाते हैं और उनके मुंह पर ताले लग जाते हैं, उनके कान बहरे हो जाते हैं और वे अंधे हो जाते हैं उन्हें न कुछ दिखाई देता है और न सुनाई देता है। इन देशों के संचार माध्यम भी गूंगे हो जाते हैं। इन देशों के संचार माध्यम वास्तव में अपने देश के राजनेताओं की ज़बान और उनके प्रवक्ता होते हैं। इन देशों के संचार माध्यम स्वंय को निष्पक्ष व आजाद होने के दावा करते हैं पर अमल में वे वही करते हैं जो इन देशों के राजनेता चाहते हैं।

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश एक ओर मानवाधिकार की रक्षा का दम भरते हैं और दूसरी ओर सऊदी अरब को हथियार देते हैं और वह उन्हीं हथियारों से यमन की निर्दोष जनता की हत्या करता है। दूसरे शब्दों में मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वाले ज़ालिम के हाथ में हथियार देकर मज़लूम की हत्या का तमाशा देखते हैं।

जब सऊदी अरब ने यमन के खिलाफ अपने पाश्विक हमलों को आरंभ किया था तो इस विचार के साथ कि मात्र कुछ ही दिनों के भीतर वह पूरे यमन पर कब्ज़ा कर लेगा परंतु लगभग सात साल बीत गये और आजतक उसका सपना साकार न हो सका जबकि उसे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे वर्चस्ववादी देशों का समर्थन भी प्राप्त है।  अगर यह कहा जाये कि यमनी न केवल सऊदी अरब बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों का भी मुकाबला कर रहे हैं तो ग़लत न होगा।

सात वर्षों के दौरान यमन की बहादुर सेना ने सऊदी अरब और उसके घटकों को कई बार ईंट का जवाब पत्थर से दिया और अपेक्षा की जा रही थी कि हमलावर देश अब सुधर जायेंगे परंतु वे नहीं सुधरे और उनके पाश्विक हमले जारी हैं और यमनी सेना की ओर से जवाबी हमले भी होते रहते हैं। अभी कल सोमवार 17 जनवरी को यमनी ड्रोनों और मिसाइलों ने अरब इमारात के अबूधाबी नगर पर आग बरसा कर यह संदेश दे दिया है कि वह सुधर जाये, अपने हमलावर सैनिकों को यमन से निकाल ले, यमनी जनता की खून से होली खेलना बंद करे, कल का जवाबी हमला यह समझने के लिए काफी है कि उसे उसके आक़ा भी नहीं बचा सकते।

अरब इमारात के आक़ा का जो अंजाम अफगानिस्तान में हुआ वह उसकी आंख खोलने के लिए काफी है। संयुक्त अरब इमारात को सोचना चाहिये कि जब तालेबान ने उसके आक़ा का यह अंजाम कर दिया तो वह किस खेत की मूली है, उसकी क्या औक़ात है, तालेबान यमन की बहादुर सेना से अधिक शक्तिशाली नहीं हैं। बहरहाल जहां आंख खुल जाये वहीं सवेरा है। अरब इमारात की भलाई इसी में है कि जल्द से जल्द वह यमन से निकल जाये, वरना उसके आक़ा का जो अंजाम अफगानिस्तान में हुआ उससे बुरा अंजाम उसकी प्रतीक्षा में है और जिसके घर शीशे के होते हैं वह दूसरों को पत्थर नहीं मारा करता।

नोटः ये व्यक्तिगत विचार हैं। पार्सटूडे का इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं है। MM

 

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