Jan २३, २०२२ १५:५२ Asia/Kolkata

केवल नक़ब मरुस्थल की ही झड़पों ने ही इस्राईल को भयभीत नहीं किया है, बल्कि इस घटना के ब्योरे ने भी इस्राईल की नींद हराम कर दी है,

इस्राईल पलायन की बड़ी नीति के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनी डट गये हैं, इस तरह से कि इस्राईली समाचार पत्र येस्राईल ह्यूम लिखता है कि वह अपनी फ़िलिस्तीनी पहचान की ओर लौट गये हैं, मानो इस्राईल के वर्चस्व में कभी रहे ही न हों, यह समचार पत्र इस्राईल की सुरक्षा एजेन्सियों को फटकार लगाता है कि क्यों उसने नक़ब में फ़िलिस्तीनियों की दूसरी पीढ़ी पर ध्यान नहीं दिया?

एक फ़िलिस्तीनी टीकार नेहाद अबू ग़ूश का कहना है कि फ़िलिस्तीन की नई पीढ़ी इस्राईल की जातीय सफ़ाए की नीति का मुक़ाबला कर रही है, इस नीति की वहज से नक़ब के 90 प्रतिशत लोग पलायन पर मजबूर हो गये, नई नस्ल प्रतिरोध कर रही है और पूरी ताक़त के साथ डटी हुई है।

इस्राईली समाचार पत्र येस्राईल ह्यूम लिखता है कि इस्राईल को मरुस्थलवासी क़बीलों के इंतेफ़ाज़ा से डर है, यह भय इस्राईल की संसद में अरब पार्टियों के भय से ज़्यादा है, इस्राईली संसद के कुछ अरब सदस्यों ने नक़ब में इस्राईली सैनिकों को दमनकारी और विनाशकारी सैनिक तक क़रार दे चुके हैं, बहरहाल नक़ब की घटना ने इस्राईल की सुरक्षा एजेन्सियों के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है।

फ़िलिस्तीन के एक टीकाकार अशरफ़ अक्का का कहना है कि अवैध इलाक़ो में रहने वाले फ़िलिस्तीनियों को यह एहसास है कि उन्हें एक ओर फेंक दिया गया है, इसी चीज़ की वजह से हालात विस्फोटक हो सकते हैं, यद्यपि संसद में अरबों का भी प्रतिनिधित्व है लेकिन यह जातीवादी सरकार है और यह केवल यहूदियों को ही अहमियत देती है।

अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन और इस शासन के शोध केन्द्रों को चिंता है कि अगर किसी दिन 1948 की धरती में रहने वाले फ़िलिस्तीनियों ने नस्लभेदी और जातीवाद के ख़िलाफ़ इंतेफ़ाज़ा कर दिया तो क्या होगा? इस्राईल के सुरक्षा अधिकारी और राजनेता व टीकाकार जो नक़ब क्रांति के बारे में शोध कर रहे हैं, कभी भी 74 वर्षों से फ़िलिस्तीनियों पर होने वाले अत्याचारों के बारे में ज़बान तक नहीं खोलते। (AK)

 

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