Jul ०४, २०२२ १४:५२ Asia/Kolkata

लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध हिज़बुल्लाह ने "कारीश" नामक गैस फील्ड पर शनिवार को टोही ड्रोन भेजा।

"कारीश" नामक गैस फील्ड, इस्राईल की सीमा से सौ किलोमीटर की दूरी पर है जबकि यह शासन इस क्षेत्र को अपनी संप्रभुता में शामिल करता है।  इस गैस फील्ड में 203 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस मौजूद है।  इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करके ज़ायोनी शासन उससे अपने हिसाब से लाभ उठाना चाहता है। 

इसी के साथ वह इस गैस फील्ड को आर्थिक और राजनीतिक हथकण्डे के रूप में भी प्रयोग करना चाहता है।  यह शासन चाहता है कि यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा विशेषकर गैस के निर्यात का जो संकट पैदा हुआ है उसका फाएदा उठाते हुए वह इस क्षेत्र की प्राकृतिक गैस का निर्यात करे।  इस तरह से वह कई देशों को अपने साथ करके उनसे अपने काम निकलवाना और हित साधना चाहता है।

ज़ायोनी शासन ने इस संदर्भ में ब्रिटेन की एक कंपनी से गैस निकालने के बारे में हालिया दिनों में एक समझौता भी किया है।  संचार माध्यमों में बताया गया है कि कारीश नामक विवादित गैस फील्ड की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अमरीका को दी गई है।  इसीलिए अमरीका के दो युद्धपोत वहां पर पहुंचे हैं।  अगर यह ख़बर सही है तो फिर हिज़बुल्लाह द्वारा "कारीश" नामक गैस फील्ड पर टोही ड्रोन का भेजा जाना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। 

इससे यह भी पता चलता है कि लेबनान का इस्लामी प्रतिरोधक आन्दोलन हिज़बुल्लाह किसी भी स्थति में अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हटने वाला नहीं है।  लगभग 1400 वर्ग किलोमीटर वाली कारीश गैस फील्ड तक हिज़बुल्लाह के टोनी विमानों की पहुंच के बाद हिज़बुल्लाह के विरोधियों ने फिर से इस प्रतिरोधक आन्दोलन के निशस्त्रीकरण की मांग शुरू कर दी है।

लेबनान के भीतर मतभेदों के बावजूद कहा जा सकता है कि अधिकांश लेबनानी दूसरे देशों की भांति अपने ऊर्जा स्रोतों से लाभ उठाकर आर्थिक समस्याओं पर नियंत्रण कर सकते हैं और जिन लेबनानियों ने अमेरिका से उम्मीद लगा रखी थी कि वह हमारी मदद करेगा उन्होंने अपनी आंखों से देख लिया कि अमेरिका ने इस्राईल का पक्ष ले रखा है और विवादास्पद क्षेत्र में उसने जहाज़ भेज रखा है। जो लोग यह समझते हैं कि अमेरिका लेबनान और इस्राईल के मध्य या फिलिस्तीन और जायोनी शासन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभायेगा वे गलतफहमी का शिकार हैं।

क्योंकि अमेरिका ने अपने क्रिया कलापों से यह सिद्ध कर दिया है कि वह न केवल मध्यस्थ नहीं है बल्कि एक पक्ष है और मुख्यरूप से उसके समर्थन के कारण ही इस्राईल फिलिस्तीनियों के खिलाफ अपने अपराधों को जारी रखे हुए है और जायोनी शासन को भलीभांति ज्ञात है कि उसके खिलाफ राष्ट्रसंघ या सुरक्षा परिषद में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं होगा और अगर पारित करने के लिए पेश भी किया जायेगा तो अमेरिका उसे वीटो कर देगा।

सारांश यह है कि इस्राईल जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों की उपेक्षा करता है उसकी मुख्य वजह मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वाले देशों का निःसंकोच समर्थन है और जब तक इस प्रकार का समर्थन जारी रहेगा तब तक इस बात की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिये कि इस्राईल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करेगा और इसी समर्थन के कारण वह स्वंय को अंतरराष्ट्रीय कानून से परे समझता है। MM

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