Aug ०९, २०२२ १४:०१ Asia/Kolkata
  • यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन के प्रमुख की आशूर की तक़रीर से तहलका

यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन के प्रमुख सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी ने आशूर के दिन अपनी तक़रीर में चार महत्वपूर्ण बिंदुओं को बयान करके तहलका मचा दिया है।

सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी ने कहा कि दुश्मन धार्मिक विषयों में उलटफेर की कोशिश में है और यह बड़ा ख़तरा है। इससे पहले ईरान की इस्लामी क्रांति के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई भी अपनी तक़रीर में इस बिंदु को उठाया था। इसका मतलब यह है कि कुछ ताक़ते हैं जो धार्मिक विषयों और धार्मिक विमर्श को उनके असली रूप से हटाकर किसी अन्य शक्ल में पेश करने की कोशिश करती हैं। धार्मिक विषयों के साथ ही सामाजिक मुद्दों और ज़मीनी सच्चाई को भी बदलने की कोशिश की जाती है और यह दुश्मन की साफ़्ट वार का हिस्सा है।

दुश्मनों को यह पता है कि धर्म इस्लामी समाज को एकजुट करने में बड़ी प्रभावी भूमिका रखता है इसलिए उनकी कोशिश होती है कि धर्म को निशाना बनाएं। सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी ने कहा कि दुश्मन इस कोशिश में है कि धार्मिक शिक्षाओं और उसूलों को समाज में हाशिए पर डाल कर मुसलमानों को गुमराह करे और फिर उन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर ले।

सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी की तक़रीर का दूसरा बिंदु यह था कि आशूर से दूसरा बड़ा सबक़ यह मिलता है कि ज़ुल्म का विरोध करना चाहिए। अगर प्रतिरोध की बात की जाए तो ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद से यह विचार प्रबल रूप से फैला है और इसका असर स्पष्ट रूप से नज़र आया है। मगर प्रतिरोध का सबसे अच्छा सबक़ आशूर की घटना से ही मिलता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में आशूर के दिन प्रतिरोध की जो मिसाल क़ायम की है वह हर दौर में और हर समाज के लिए प्रासांगिक है। इस रास्ते पर चलकर हर दौर में बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। इमाम हुसैन इसी रास्ते पर चलते हुए शहीद हो गए। सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी का कहना था कि अन्याय और ज़ुल्म की जब बात आ जाए तो हमें इमाम हुसैन के रास्ते पर चलना चाहिए और हरगिज़ सर नहीं झुकाना चाहिए।

सैयद अब्दुल मलिक की तक़रीर का तीसरा बिंदु यह था कि कुछ अरब सरकारें इस्राईल से रिश्ते स्थापित कर रही हैं। यह काम औपचारिक और अनौपचारिक दो तरीक़े चल रहा है। इमारात और बहरैन ने सितम्बर 2020 में एलान करके इस्राईल से संबंध स्थापित कर लिए और यह सिलसिला अब तक जारी है वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब ने इस्राईल से अपने रिश्तों का एलान तो नहीं किया है लेकिन सऊदी अरब और इस्राईल के बीच सहयोग चल रहा है। सैयद अब्दुल मलिक अलहौसी ने कहा कि सऊदी अरब ने एक ज़ायोनी को मक्के में जाने की अनुमति दी जो इस्लामी पवित्र स्थलों का खुला अपमान है। इसके अलावा इस्राईली विमानों के लिए सऊदी अरब ने अपनी वायु सीमा खोल दी है।

चौथा बिंदु यह है कि दुश्मनों का अस्ली लक्ष्य इस्लामी जगत पर वर्चस्व स्थापित करना है। इस विषय पर पश्चिमी देश और ज़ायोनी ताक़तें कई दशकों से काम कर रही हैं। उनके सामने सबसे बड़ी रुकावट वे देश और संगठन हैं जो स्वाधीनता पर ज़ोर देते हैं और स्वाधीनता के लिए दुश्मन से जंग करन पर तैयार हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वाधीनता की रक्षा का रुजहान लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके कारण पश्चिमी ताक़तों और ज़ायोनियों पर अब मायूसी छा रही है।

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