Aug १२, २०२२ १५:०० Asia/Kolkata

दोस्तो जायोनी शासन ने शुक्रवार 5 अगस्त को दोपहर बाद गज्जा पट्टी पर भीषण हमला आरंभ किया था जो तीन दिनों तक जारी रहा।

ज़ायोनी शासन के पाश्विक हमलों में 15 बच्चों सहित 45 फिलिस्तीनी शहीद और 360 से अधिक घायल हो गये। इसी प्रकार उसके इस हमले में फिलिस्तीनियों के एक हज़ार मकानों को क्षति पहुंची।

रोचक बात है कि इस्राईल ने संघर्ष विराम के लिए पहल की और तीन दिन में ही मिस्र की मध्यस्थता में संघर्ष विराम करके उस पर अमल भी आरंभ कर दिया।

सवाल यह पैदा होता है कि इस्राईल ने इतनी जल्दी क्यों संघर्ष विराम कर लिया? जबकि वह समय के आधुनिकतम हथियारों से लैस है और गत 73 वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि वह निर्दोष बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की हत्या करने में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लेता?

जानकार हल्कों का कहना है कि इस सवाल के जवाब से पहले कुछ बिन्दों को ध्यान में रखना ज़रूरी है।

पहला बिन्दु यह है कि जंग हथियारों से लड़ी जाती है परंतु विजय हथियारों से नहीं होती है। दूसरे शब्दों में विजय के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि जिसके पास अधिक और आधुनिकतम हथियार होंगे वही विजयी होगा।

दूसरा बिन्दु यह है कि जंग में हौसला और मनोबल बहुत ज़रूरी है। बहुत से लोगों की संख्या कम होती है और उनके पास समय के आधुनिकतम हथियार भी कम होते या होते ही नहीं है फिर भी वे जंग जीत जाते और दुश्मन को हार का कटु स्वाद चखा देते हैं।

तीसरा बिन्दु जंग करने वाले की आस्था पर ध्यान दिया जाना बहुत ज़रूरी है। जिस युद्धरत पक्ष की भावना यह होगी कि अगर वह युद्ध में मारा जायेगा तो खत्म हो जायेगा तो वह उस बहादुरी का परिचय नहीं दे सकता जो देना चाहिये। इन बिन्दुओं के अलावा भी कई बिन्दु हैं जिनका युद्ध में विजयी होने के लिए ध्यान में रखा जाना बहुत ज़रूरी है।

इन बिन्दुओं को दृष्टि में रखते हुए बहुत आसानी  से समझा जा सकता है कि इस्राईल ने युद्ध विराम में इतनी जल्दी क्यों की? यह बात बिल्कुल सही है कि जितने और जिस तरह के आधुनिकतम हथियार इस्राईल के पास हैं उतने बहुत से इस्लामी और ग़ैर इस्लामी देशों के पास भी नहीं हैं, फिलिस्तीन के संघर्षकर्ता गुटों की तो बात ही अलग है परंतु फिलिस्तीन के संघर्षकर्ता गुटों के पास जो हौसला व मनोबल है वह न केवल जायोनी सैनिकों बल्कि उसके आक़ाओं के सैनिकों में भी नहीं है।

जायोनी ज़िन्दा रहने को बहुत पसंद करते हैं, वे मौत के नाम से भागते हैं, जबकि फिलिस्तीनी महान ईश्वर पर आस्था रखते और उसकी राह में जान देने को शहादत समझते हैं।

इस तीन दिवसीय युद्ध में एक अन्य बिन्दु पर ध्यान देना ज़रूरी है और वह यह है कि इस युद्ध में समस्त फिलिस्तीनी गुट शामिल नहीं थे केवल जेहादे इस्लामी ने इस्राईल के पाश्विक हमलों का जवाब दिया। अगर दूसरे फिलिस्तीनी गुट एक साथ मिलकर इस्राईली हमलों का जवाब देते तो यह युद्ध विराम और जल्दी होता।

इस युद्धविराम से एक पाठ यह मिलता है कि जो इंसान महान ईश्वर पर भरोसा रखता है और उसे सर्वशक्तिमान समझता है वह दुनिया की किसी भी वर्चस्ववादी शक्ति से नहीं डरता और वह न्यूनतम संभावना के साथ आधुनिकतम और संभावना व हथियारों से लैस शासन से भी मुकाबला करने से नहीं डरता। यह वही इस्राईल है जिसने वर्ष 1967 में होने वाले 6  दिवसीय युद्ध में कई अरब देशों की सेनाओं को हरा दिया था जबकि आज एक फिलिस्तीनी गुट ने अकेले इस्राईल को तीन दिन में ही युद्ध विराम करने और अपनी शर्त मानने पर मजबूर कर दिया है।

इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि फिलिस्तीनी दिन- प्रतिदिन मज़बूत होते और अपनी अंतिम विजय के निकट होते जा रहे हैं और इस्राईल बड़ी तेज़ी से अपने अंत व पतन के निकट होता जा रहा है। ईरान की इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता के उस बयान को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने जेहादे इस्लामी के नेता ज़ियाद नोखला के साथ भेंट में कहा है कि आप ने सिद्ध कर दिया कि जायोनी शासन की नाक ज़मीन पर रगड़ सकते हैं। MM

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