Sep ०४, २०१९ १७:४३ Asia/Kolkata
  • सीरिया का डर्टी वॉर, पश्चिमी साज़िशों का उलटा परिणाम, वॉशिंग्टन ने बनाया प्लान-बी, क्या होगा उसका अंजाम?

ऑस्ट्रेलियाई लेखक एवं शोधकर्ता एंडरसन ने “डर्टी वॉर” नामक एक किताब को संकलित किया है। उनके द्वारा संकलित की गई यह पुस्तक 13 अध्याय पर अधारित है। उनकी इस किताब के एक अध्याय में “सीरिया युद्ध में अमेरिकी साज़िशों का उलटा परिणाम, सीरिया की जीत, ईरान हुआ अधिक शक्तिशाली” के संबंध में कुछ दिलचस्प बातें लिखी गईं हैं।

एंडरसन ने अपनी डर्टी वॉर नामक किताब के माध्यम से सीरिया युद्ध को लेकर कई अहम बातें लिखी हैं। उन्होंने सीरिया युद्ध के संबंध में जो बात सबसे पहले लिखी है उसका शीर्षक है, “डर्टी वॉर सीरिया, शासन परिवर्तन और प्रतिरोध” इसके माध्यम से एंडरसन ने यह बताने का प्रयास किया है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों का सीरिया संकट में क्या रोल था और इन देशों ने सीरिया सरकार के ख़िलाफ़ षड्यंत्र करके कैसे इस देश में हस्तक्षेप किया और इन्हीं देशों के कारण कैसे सीरिया के लगभग 1 मिलयन लोगों का नरसंहार हुआ।

डर्टी वॉर किताब में सबसे पहले जिस बात का उल्लेख किया है वह है साम्राज्यवादी पश्चिमी देशों का सीरिया में हस्तक्षेप और मध्यपूर्व में पश्चिमी देशों की षड्यंत्रकारी योजनाएं। जैसे के सभी जानते हैं कि पश्चिमी देश स्वयं को दुनिया का सबसे उच्च सभ्यता वाला बताने का प्रयास करते हैं, लेकिन उन्होंने हमेशा अन्य देशों पर अपने साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को लागू करने का काम किया है। इस बीच अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की वर्चस्ववादी नीतियों में बदलाव आया है। इस बीच शक्तिशाली पश्चिमी देशों ने अपनी नई नीति के तहत मध्यपूर्व के देशों में साम्प्रदायिकता और चरमपंथ को सरकारों के ख़िलाफ़ बढ़ावा दिया। इसी के अंतर्गत उन्होंने अरब स्प्रिंग नामक एक आंदोलन आरंभ करवाया। वास्तव में अरब स्प्रिंग, पश्चिमी देशों की एक सोची समझी साज़िश थी जो उन्होंने लीबिया से आरंभ किया था। दुनिया ने देखा कि कैसे अरब स्प्रिंग को कामयाब करने के लिए नाटो ने लीबिया पर बम बरसाए और अंत में इस पूरे आंदोलन को आतंकवादी गुट अल-क़ाएदा से जुड़े सशस्त्र गुटों के हवाले कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप जो लीबिया अफ़्रिक़ी देशों में विकासशील देश माना जाता था वही इस झूठी क्रांति के कारण दसियों वर्ष पीछे चला गया।

लीबिया के बाद सीरिया का नंबर आया, लेकिन सीरियाई सरकार ने अपने देश की जनता और अपने सच्चे दोस्तों की मदद से बड़ी बहादुरी और ज़्यादा बलिदान के साथ पश्चिम की साम्राज्यवादी योजनाओं का जमकर मुक़ाबला किया। पश्चिम ने सीरिया सरकार के विरुद्ध बड़े स्तर पर प्रचार युद्ध छेड़ रखा था। सीरिया युद्ध के आरंभ में पश्चिमी देशों ने सबसे पहले यह दावा किया था कि वह सीरिया में एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष क्रांति का समर्थन कर रहा है जिसको रोकने के लिए सीरियाई सरकार अपने ही लोगों को मार रही है। इसी तरह यह भी कहा गया था कि इस क्रांति का नेत्तृत्व सीरिया के क्रांतिकारी और धर्मनिर्पेक्ष गुट कर रहे हैं। लीबिया त्रास्दी के बाद पश्चिमी मीडिया और सीरिया सरकार के विरोधी वर्ष 2013 में यह दावा कर रहे थे कि, सीरिया के चरमपंथी संप्रदायों का विद्रोह केवल इस देश की सरकार का विरोध करना था, लेकिन बाद में न चाहते हुए यह विरोध सैन्य संघर्ष में बदल गया। सबसे दिलचस्प बात यह है कि, वॉशिंग्टन और उसके सहयोगियों ने जब सीरिया में चरमपंथियों के साथ मिलकर युद्ध करने का निर्णय लिया था तो उस समय बहुत ही कम पश्चिमी पत्रकारों ने सीरिया में जारी झड़पों के बारे में लिखा था।

वैसे सीरिया के बारे में अमेरिका की कई योजना है। उन्हीं योजनाओं में से एक योजना थी सीरिया पर युद्ध के साथ-साथ आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसपर और अधिक दबाव बढ़ाने की, लेकिन इन सबके बावजूद दमिश्क़ लगातार अपना विजयी अभियान आगे बढ़ाता रहा और माना जा रहा है कि सीरिया की जीत मध्यपूर्व में कई राजनीतिक बदलाव लाएगी। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मध्यपूर्व में अमेरिका की सभी योजनाएं, जिसमें शासन परिवर्तन, सरकारों को कमज़ोर करना और सांप्रदायिक आधार पर क्षेत्रीय देशों को बांटना, विफल रही हैं और हम इस समय इस बात के गवाह है कि प्रतिरोध के मोर्चे की शक्ति, जिसमें ईरान, सीरिया, फ़िलिस्तीन और हिज़्बुल्लाह शामिल हैं और इन्हें रूस का भी समर्थन प्राप्त है लगातार बढ़ रही है। इस बात को निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सीरियाई सरकार अपनी जनता, सेना और अपने सहयोगियों की मदद से तकफ़ीरी आतंकवादियों पर विजयी प्राप्त करेगा।

इस बीच रूस की योजना से पहले सीरिया संकट के सात वर्ष गुज़रने के बाद इस देश की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब थी, लेकिन साथ ही यह कहा जा सकता है कि इस देश के अधिकतर क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी। हालांकि उत्तर पूर्वी हलब, रक़्क़ा और उत्तरी दमिश्क़ के जोबर दूमा इलाक़े कई वर्षों तक तकफ़ीरी आतंकियों के क़ब्ज़े में थे, लेकिन आतंकवादी गुट सीरिया के अन्य क्षेत्रों में लंबे समय तक नहीं टिक पाए। यहां यह ध्यान योग्य बात यह है कि इस डर्टी युद्ध के कारण लाखों सीरियाई नागरिक पश्चिमी सीरिया स्थानांतरित होने पर मजबूर हो गए। इस संबंध में वर्ष 2015 में लाजेक़िया के गवर्नर ने एलान किया था कि, इस इलाक़े में रहने वालों की संख्या 13 लाख लोगों से बढ़कर 30 लाख पहुंच गई है। इसी तरह सुवैएदा में 130 दरआ के परिवारों ने शरण ली थी। इस तरह पश्चिमी सीरिया में देश के विभिन्न इलाक़ों से आने वाले शरणार्थियों की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही थी। यहां यह बात बताना ज़रूरी है कि यरमूक फ़िलिस्तीनी शिविर पर लगातार हो रहे आतंकी हमलों से डर कर वहां के शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या दमिश्क़ में शरण लेने पहुंची थी।

सीरिया युद्ध के संबंध में लिखने वाले लेखक जब इस देश के युद्ध के बारे में लिखते हैं तो वह इस बात का उल्लेख करना भूल जाते हैं कि सीरियाई सरकार ने कैसे उन घनी आबादी वाले इलाक़ों की सुरक्षा की। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्ष 2015 के आरंभ बिजली की कमी अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई थी, लेकिन इसके बावजूद स्वास्थ्य केंद्र और यहां तक कि खेलों के स्थल पहले की ही तरह काम कर रहे थे। हां यह बात सच है कि सीरिया के लोगों का जीवन सामान्य स्तर से नहीं गुज़र रहा था लेकिन हां वे अपना जीवन गुज़ार रहे थे इस तरह कि वे अपने दैनिक जीवन को जारी रखे हुए थे। इसको यहां बताने का उद्देश्य यह है पश्चिमी मीडिया जो लगातार सीरिया युद्ध के बारे में झूठ फैलाने में लगा हुआ है इन बातों का कभी उल्लेख नहीं करता है।

साक्ष्य यह साबित करते हैं कि वह तमाम अपराध जो सीरियाई सेना पर लगाए जाते हैं, वास्तव में उन्हें उन सशस्त्र बलों ने अंजाम दिया है जिनकों विदेशियों का समर्थन प्राप्त है और यह पश्चिमी देशों की एक रणनीति है जिसके माध्यम से वह अंतर्राष्ट्रीय मंच का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। वॉशिंग्टन और उसके सहयोगी आज भी इस बात पर बल दे रहे हैं सीरिया में शासन परिवर्तन हो और बश्शार असद को सत्ता से दूर कर दिया जाए। इस संबंध में रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने घोषणा की है कि अमेरिका को चाहिए कि वह 2012 के सीरिया के संबंधित जेनेवा समझौतों से बाहर निकल जाए, क्योंकि इस समझौते में कहीं भी बश्शार असद के सत्ता छोड़ने पर बात नहीं हुई थी, बल्कि इस समझौते के अनुसार सीरिया की जनता अपने भविष्य का फ़ैसला ख़ुद करेगी। साधारण लेकिन मूल बात यह है कि अमेरिका सभी बातों को जानता है लेकिन इन बातों को समझना नहीं चाहता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतीन हमेशा इस बात को कहते हैं कि, पश्चिमी देश साम्राज्यवादी लालच को समाप्त करें और यह कहकर लोगों के दिमाग़ में ज़हर न घोलें कि वर्चस्ववादी नीति के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सीरिया के बारे में अमेरिका की बी-योजना, इस देश को तोड़ने और कमज़ोर करने पर आधारित थी। इस योजना के तहत अमेरिका चाहता था कि वह सीरिया को कई टुकड़ों में बांट दे। वॉशिंग्टन की योजना-बी के अनुसार वह चाहते थे कि सीरिया की शक्ति एक केंद्रीय सरकार से हटकर कई राज्यों में बांटकर उसकी ताक़त को कम कर दिया जाए। इस योजना को लागू करने के लिए दाइश के ख़तरे को एक बहाने के रूप में पेश किया गया। हालांकि अमेरिका और उसके घटकों ने ही इस तकफ़ीरी आतंकावदी गुट को बनाया है। (RZ)

 

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