Nov १३, २०१९ २०:४९ Asia/Kolkata
  • प्रतिरोध के मोर्चे के अहम लोगों पर हमले करने की इस्राईल की चाल कितनी कामयाब हो पाएगी?

ग़ज़्ज़ा पट्टी में फ़िलिस्तीनी गुटों के नेताओं या प्रतिरोध के मोर्चे के अहम लोगों पर ज़ायोनी शासन के हमले रुकवाने का एकमात्र रास्ता, ठोस जवाब है।

पिछले कुछ दिनों के दौरान ज़ायोनी शासन ने कई आतंकी हमले करके फ़िलिस्तीन के जेहादे इस्लामी संगठन के कुछ नेताओं को निशाना बनाया है। ये हमले दमिश्क़ और ग़ज़्ज़ा पट्टी में हुए हैं। ज़ायोनी प्रधानमंत्री नेतनयाहू ने इन हमलों के बाद कहा है कि उनके मंत्री मंडल के सभी सदस्यों ने दस दिन पहले सर्वसम्मति से अबुल अता पर हमले की योजना को मंज़ूरी दी थी। उन्होंने इन आतंकी हमलों और ग़ज़्ज़ा पट्टी के कई इलाक़ों पर बमबारी के बाद, जिनमें बुधवार की शाम तक कम से कम 23 फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके थे, वही रणनीति अपनाई जो इस्राईल हमेशा अपनाता है। उन्होंने कहा कि इस्राईल तनाव नहीं चाहता लेकिन वह अपनी रक्षा के लिए हर वह काम करेगा जो ज़रूरी हो।

 

अलजज़ीरा टीवी की रिपोर्ट के अनुसार इस्राईल के सेनाध्यक्ष ने भी कहा है कि हम जल, थल और वायु मैदानों में टकराव के लिए तैयार हैं लेकिन हम तनाव बढ़ाना नहीं चाहते। इसके बाद मिस्र और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से गतिविधियां शुरू हो गई हैं ताकि संघर्ष विराम स्थापित हो जाए और इस्राईल के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनी गुटों की कार्यवाहियों को रोका जा सके। ज़ायोनी शासन ने इससे पहले भी, इस बहाने से कि उसे कई ओर से ख़तरों का सामना है, सीरिया, लेबनान और इराक़ पर हवाई और ड्रोन हमले किए हैं। इन हमलों में एक समानता यह है कि इस्राईल ने इन हमलों से पहले, यह दावा करके हमलों का मार्ग प्रशस्त किया कि संभावित रूप से सीरिया, लेबनान या इराक़ से वह ईरान के मीज़ाइल हमलों का निशाना बन सकता है। इस समय इस्राईली मीडिया में बार बार यह प्रोपेगंडा किया जा रहा है कि ईरान, यमन की धरती से इस्राईल पर मीज़ाइल हमला कर सकता है। यह प्रोपेगंडा इस संभावना को बल प्रदान करता है कि ज़ायोनी शासन के हमलों का अगला टार्गेट यमन के वे क्षेत्र होंगे जो यमनी सेना और अंसारुल्लाह के नियंत्रण में हैं।

 

ज़ायोनी शासन के हमलों की एक अन्य अहम बात यह है कि वह हर हमले के बाद अपने आपको मज़लूम साबित करने की कोशिश करता है और कहता है कि वह तनाव बढ़ाना नहीं चाहता ताकि सामने वाले पक्ष की कड़ी प्रतिक्रिया को रोक सके और उसे अपने निरंतर हमलों की क़ीमत न चुकानी पड़े। अंतिम बात यह कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार की रणनीति का इस बात से कोई संबंध नहीं है कि नेतनयाहू सत्ता में रहें या कोई दूसरा। ज़ायोनी शासन की शुरू से ही यह आदत रही है कि वह हर हमले के बाद, उसकी क़ीमत चुकाए बिना वार्ता शुरू कर देता है और संघर्ष विराम करके अपने संभावित नुक़सान को कम से कम करने की कोशिश करता है। (HN)

टैग्स

कमेंट्स