Dec १३, २०१९ १२:२३ Asia/Kolkata
  • इराक में ईरान का विरोध, हक़ीक़त या अमरीका और उसके घटकों का अफसाना? गहरी साज़िश के गहरे राज़!

इराक़ में जो कुछ हो रहा है और जिस तरह से संदिग्ध घटनाए घट रही हैं उन पर ध्यान देने से यह हक़ीक़त खुल जाती है कि इसके पीछे, ईरान व इराक़ की दोस्ती से नुक़सान उठाने वालों का हाथ है।

 

     इराक़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन आरंभ हुए और फिर चूंकि इमाम हुसैन का चालीसवां आ गया था इस लिए प्रदर्शन रुक गये और लोग ज़ियारत के लिए कर्बला जाने वालों के स्वागत में व्यस्त हो गये। चालीसवें के बाद फिर से प्रदर्शन आरंभ हुए लेकिन बहुत जल्द यह प्रदर्शन अपनी राह से भटकता नज़र आया।

     भ्रष्टाचार के खिलाफ आरंभ होने वाले इराक़ के प्रदर्शन बड़ी जल्दी उस दिशा में मुड़ गये जो निश्चित रूप से इराक़ के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ थे और इस दौरान होने वाली घटनाओं पर हैरत होने लगी। प्रदर्शनों के दौरान शहीद सैयद मुहम्मद बाक़िर अस्सद्र जैसे राष्ट्रीय नायकों  के मज़ार में हंगामा किया गया, राष्ट्रीय प्रतीकों और इराक़ के लिए जान देने वाले जवानों की कब़्रों को नुक़सान पहुंचाया गया और आतंकवादी संगठन दाइश के खिलाफ सब से पहले आगे बढ़ कर और सब  से अधिक इराक़ की मदद  करने वाले ईरान के खिलाफ नारे लगाए गये।

     इराक़ में होने वाले प्रदर्शनों में ईरान का विरोध बहुत स्पष्ट रूप से नज़र आया जबकि ईरान और इराक़ की जनता के मध्य संबंध इतने मज़बूत हैं कि अरब व फार्स की जातिवादी सोच रखने वाले सारी शक्तियां उसके सामने बेबस नज़र आती हैं।

आदिल अब्दुलमेहदी

 

     दर अस्ल इराक़ में आदिल अब्दुलमेहदी की सरकार बनने के बाद से ही अमरीका और उसके घटकों ने इस सरकार को गिराने की साज़िश तैयार करना शुरु कर दी थी और जब इराक़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन आरंभ हुए तो चूंकि प्रदर्शनों का कोई नेता भी नहीं था इस लिए अमरीका को अपनी योजना पर काम करने का अवसर मिल गया।

     अमरीक योजना के पहले चरण में मेजर जनरल " अब्दुल वह्हाब साएदी " के नेतृत्व में सैनिक विद्रोह कराना था जिस पर गत सितंबर में खूब हंगामा भी हुआ लेकिन इराक़ी सरकार ने इस साज़िश को नाकाम बना दिया। उन पर इस्राईल से संबंध रखने का आरोप लगा और पद से हटा दिया गया। स्वंय सेवी बल के कई अन्य कमांडर भी गिरफ्तार कर लिये गये। दर अस्ल इराक़ के प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल मेहदी को इस सैनिक विद्रोह और अब्दुल वह्हाब सायदी के साथ कुछ दूतावासों के संदिग्ध संपर्क की खबर मिल गयी थी। इस साज़िश के नाकाम होने के बाद अमरीका ने " प्लान बी " पर काम शुरु कर दिया। इस बार इराक़ में ईरान से अच्छे संबंध रखने वाली शिया सरकार को गिराना और सुन्नी सरकार को सत्ता में लाना था जो अमरीका का साथ दे। इराक़ की अलबुरासा न्यूज़ एजेन्सी ने बताया कि इस साज़िश में अमरीका के सहयोगी कौन हैं?

अब्दुल वह्हाब अस्साएदी

 

     न्यूज़ एजेन्सी के अनुसार सद्दाम की बास पार्टी के बचे खुचे सदस्य, शिया विरोधी वह्हाबी, ज़ायोनी लाबी , अमरीकी एजेन्टों, वरिष्ठ  धार्मिक नेतृत्व से बदला लेने के लिए " सरखी गुट " और सेकुलर सरकार बनाने की इच्छा रखने वालों ने इस साज़िश में एक दूसरे का साथ दिया। इस अघोषित गठबंधन का मक़सद इराक़ी सत्ता से शिया नेताओं और ईरान को पूरी तरह से दूर करना था।

 

अमरीकी दूतावास की भूमिका!

यह पहली बार नहीं है जब इराक़ में अमरीकी दूतावास ने प्रदर्शनों से फायदा उठाने का प्रयास किया हो। इस से पहले भी दक्षिणी इराक़ के बसरा नगर में होने वाले प्रदर्शनों को अमरीकी दूतावास ने ईरान विरोधी दिशा में मोड़ दिया और उसके परिणाम में बसरा में ईरान के कांसलेट को  आग लगा दी गयी। इराक़ की सरकार कमज़ोर है और उसकी वजह से इस देश में प्रदर्शन स्वाभाविक  हैं लेकिन अगर इन प्रदर्शनों में ईरान और इराक़ को आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्वंय सेवी बल के खिलाफ क़दम उठाए जाएं तो सब कुछ सदिंग्ध हो जाता है। बसरा पिछले प्रदर्शनों के दौरान सार्वाजनिक  संपत्तियों को जम कर नुकसान पहुंचाया गया जबकि इराक के वरिष्ठ धर्मगुरु ने एसा न करने की अपील की थी। तो सवाल यह है कि क्या वजह थी कि आतंकवादी संगठन दाइश के खिलाफ वरिष्ठ धर्म गुरु के आह्वान पर सब से अधिक बलिदान देने वाले बसरा के लोग, वरिष्ठ नेतृत्व और स्वंय सेवी बल और ईरान के खिलाफ इस प्रकार से उग्र हो गये? बाद में जी जाने वाली जांच में इन सभी घटनाओं में अमरीकी  दूतावास का हाथ  सिद्ध हो  गया था।

हालिया प्रदर्शनों में भी वही सब कुछ हुआ और सरकारी इमारतों, पार्टियों के कार्यालयों और ईरानी कांस्लेट को आग लगा दी गयी। इस सिलसिले में अलअहद न्यूज़ वेबसाइट ने कई अहम सवाल उठाए। वेब साइट ने लिखा कि अगर इराक़ी प्रदर्शनकारी बसरा में विदेशियों की उपस्थिति  के खिलाफ हैं तो उन्होंने क्यों  सिर्फ ईरान के कांस्लेट को आग लगायी? उन्होंने अमरीका, ब्रिटेन या किसी अन्य देश के कांस्लेट पर धावा क्यों नहीं बोला?  ईरान के कांस्लेट और स्वंय सेवी बल और दलों के कार्यालयों पर हमले पर जिस तरह से दुनिया भर में चुप्पी छायी रही उससे भी यह साबित होता है कि इसके पीछे किस का हाथ है।

अमरीका ने इस प्रकार की साज़िश की तैयारी बहुत पहले से कर ली थी। अमरीका इराक़ में " आईलेप " नाम का एक कार्यक्रम चलाता है जो वास्तव में इराक़ के युवा नेताओं के आदान प्रदान का कार्यक्रम है अर्थात Iraqi Young Leaders Exchange Program ।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत अमरीका बहुत पहले से इराक़ी युवाओं को कुछ दिन अमरीका में जाकर रहने का अवसर देता है जिसके दौरान उनकी ट्रेनिंग भी हो जाती है। चार हफ्तों  का यह अमरीकी दौरा, पूरी तरह से मुफ्त होता है और इसका सारा खर्चा अमरीका उठाता है। यही  वजह है कि जांच से यह पता चला कि अमरीका के इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले बहुत से युवा, प्रदर्शनों में आगे आगे रहे हैं जिसका वीडियो और फोटो इराक़ी संचार माध्यमो में जारी हो चुका है।

लेबनान के अलअखबार समाचार पत्र ने सुबूतों के साथ अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि किस प्रकार से इराक़ में अमरीकी दूतावास, समितियां बना कर प्रदर्शनों को मनचाही दिशा देता है।(Q.A.)

 

 

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