Jan २१, २०२० २०:१६ Asia/Kolkata
  • क्या ईरान एक परमाणु शक्ति बनने जा रहा है? पढ़ें रूसी न्यूज़ एजेन्सी की रिपोर्ट

  ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते के प्रति युरोप ने जो व्यवहार अपनाया उसकी वजह से समझौते के पालन के बारे में युरोप की नीयत शक के दायरे में आ गयी।

      एक साल और कुछ महीनों पहले जब अमरीका, ईरान के साथ किये गये परमाणु समझौते से निकला था तो युरोप ने वादा किया था कि वह परमाणु समझौते से ईरान को मिलने वाले लाभ को रुकने नहीं देंगे और ईरान के साथ व्यापार का एक नया रास्ता निकालेंगे, युरोप ने इसके लिए इंस्टेक्स नाम की एक व्यवस्था बनायी थी लेकिन ईरानी अधिकारियों के अनुसार अब तक कोई व्यवहारिक क़दम नहीं उठाया गया। फिर ईरान ने अमरीका के निकलने के एक साल पूरे होने के बाद परमाणु समझौते में अपनी प्रतिबद्धताओं के पालन में चरणबद्ध रूप से कमी करना शुरु कर दी ताकि युरोप को अपने वचनों के पालन पर तैयार किया जा सके मगर युरोप ने केवल बयानों से ही काम चलाया। ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों पर परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी की कड़ी निगरानी स्वीकार की है और आईएईए कड़ी निगरानी कर भी रहा है इस निगरानी का बड़ा हिस्सा, ईरान द्वारा स्वेच्छा से स्वीकार किया गया है और इसी लिए जैसा कि ईरान के स्पीकर डाक्टर अली लारीजानी ने भी कहा है कि जो देश इतने व्यापक और कड़े रूप से अपने ऊपर निगरानी की अनुमति देता हो उसके साथ यह व्यवहार कदापि नहीं होना चाहिए और उसके परमाणु मामले को सुरक्षा परिषद में ले जाने की धमकी नहीं दी जानी चाहिए।

अली लारीजानी

 

     इस लिए अगर ईरान पर दबाव डालने के लिए इस प्रकार की हरकत की गयी तो फिर ईरान आईएईए के साथ सहयोग  कम करने पर मजबूर होगा। उदाहरण स्वरूप ईरान परमाणु समझौते के दायरे में स्वेच्छा से किया जाने वाला सहयोग खत्म कर सकता है या पूरक प्रोटोकोल का पालन बंद कर सकता है जिसे अभी तक ईरानी संसद ने भी मंज़ूर नहीं किया है। ईरान केवल एनपीटी के दायरे में ही अपना सहयोग जारी रख सकता है। ईरान आईएईए के साथ सहयोग चरणबद्ध रूप से, कम कर सकता है जिससे दूसरे पक्षों को यह पता चलेगा कि ईरान गंभीर है।

     ईरान के संसद सभापति अली लारीजानी कह चुके हैं कि अगर युरोप का  अन्यायपूर्ण व्यवहार जारी रहा तो तेहरान आईएईए के साथ सहयोग पर पुनर्विचार कर सकता है।

            विशेषज्ञों के अनुसार युरोप ने ईरान के खिलाफ जो फैसला किया है उसके पीछे इस्राईल का हाथ हो सकता है। इस्राईल आरंभ से ही ईरान के साथ परमाणु समझौते का विरोधी रहा है। इस्राईल ने सऊदी अरब की मदद से अमरीकियों और ट्रम्प, को यह समझा दिया कि उन्हें परमाणु समझौते से निकल जाना चाहिए। ट्रम्प के इस फैसले के परिणाम भी सामने आ चुके हैं और पूरा इलाक़ा खतरे में पड़ गया है और ईरान एनपीटी से निकलने की धमकी दे रहा है हालांकि एनपीटी से निकलना भी ईरान के हित में नहीं है क्योंकि ईरान की परमाणु गतिविधियां पूर्ण रूप से शांतिपूर्ण है लेकिन एनपीटी से निकलने के बाद उसकी परमाणु गतिविधियां संदिग्ध हो सकती हैं।  इसी लिए विशेषज्ञों का कहना है कि एनपीटी से निकलने की बात मात्र धमकी है लेकिन पूरी तरह से इस संभावना का खंडन नहीं किया जा सकता है कि ईरान एनपीटी से निकल सकता है क्योंकि युरोप ने जो रास्ता अपनाया है कि वह अगर जारी रहा तो ईरान मजबूरी की दशा में यह क़दम उठा भी सकता है।

     विशेषज्ञों के अनुसार ईरान  भले ही यह कह रहा हो कि वह एनपीटी से निकल सकता है किंतु इसकी संभावना बहुत कम है और ईरान ने अब तक जो भी क़दम उठाए हैं वह सब परमाणु समझौते के अनुसार ही हैं इस लिए ईरान का अगला क़दम, काफी सीमा तक, युरोप क रवैये पर निर्भर करता है। बहुत से विशेषज्ञ और ईरानी नेताओं का मानना है कि ईरान अंत में एनपीटी से निकल भी सकता है। इस्राईल, भारत और पाकिस्तान परमाणु सपंन्न हैं किंतु एनपीटी के सदस्य नहीं हैं और उत्तरी कोरिया, एनपीटी से निकल चुका है। Q.A. साभार, स्पूतनिक न्यूज़ एजेन्सी।  

 

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