Jan २५, २०२० २०:४९ Asia/Kolkata
  • अमरीका क्यों नहीं फार्स की खाड़ी से हटना चाहता? निक्सन से ट्रम्प तक बस एक ही वजह!

अमरीका ने 70 के दशक के अंत में और 80 के दशक के आरंभ में फार्स की खाड़ी के बारे में दो अलग अलग शैली अपनायी, अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने जो रणनीति अपनायी उसके आधार पर फार्स की खाड़ी में अमरीका की सैन्य उपस्थिति की आवश्यकता नहीं थी।

वियतनाम युद्ध के वारिस, निक्सन ने नयी रणनीति अपनायी और इस क्षेत्र से अमरीकी सैनिकों की वापसी की बात की। उनका और उनके सलाहकारों का ख्याल था कि क्षेत्र में अमरीका की सीधी उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसकी जगह क्षेत्र में अमरीकी घटकों को हथियार देकर मज़बूत किया जाए ताकि वह इलाक़े में अमरीकी हितों की रक्षा करें।

कुछ रिपब्लिकन्स ने निक्सन की रणनीति का समर्थन किया लेकिन कुछ ने आलोचना भी की और जब डेमोक्रेट जिमी कार्टर राष्ट्रपति बने तो उन्होंने निक्सन की रणनीति को खत्म करके फार्स की खाड़ी में अमरीका की सीधी उपस्थिति पर बल दिया। उनके बाद रोनाल्ड रीगन अमरीका के राष्ट्रपति बने लेकिन जिमी कार्टर के कड़े विरोधी होने के बावजूद उन्होंने उनकी रणनीति को जारी रखा यही नहीं उन्होंने सेन्टकॉम बना कर कार्टर के अधूरे काम को पूरा कर दिया। उन्होंने सेन्टकॉम को अमरीका की सशस्त्र सेना से अलग बताया जो केवल अमरीका के तेल हितों की रक्षा के लिए बनायी गयी है। सेन्टकॉम हर उस  जलमार्ग पर तैनात कर दी गयी जहां- जहां से ऊर्जा गुज़रती हो। अमरीका के इस सैन्य बल का उद्देश्य ऊर्जा की आवाजाही को सुनिश्चित बनाना था। अगले चरण में इस सैन्य बल ने तेल से समृद्ध देशों में छावनियां बनायीं।

 

सेन्टकॉम नामक अमरीकी सैन्य बल की पहली सैन्य कार्यवाही सन 1987 में हुई जब रीगन ने सेन्टकॉम के युद्धपोतों को आदेश दिया कि वह अमरीकी झंडे के साथ चलने वाले कुवैती जहाज़ों को सुरक्षा प्रदान करें। सेन्टकॉम ने इसी प्रकार कुवैत को इराक़ से स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेन्टकॉम पर अमरीका की दो मुख्य पार्टियों के मतभेदों का प्रभाव नहीं पड़ता और वाइट हाउस में चाहे जिस पार्टी की सत्ता हो, वह सेन्टकॉम को पूरा समर्थन देती है।

 

अमरीका, फार्स की खाड़ी के क्षेत्र में चाहता क्या है?

 सन 2016 में जब अमरीका में चुनावी प्रचार चरम पर था तो डोनाल्ड ट्रम्प बार बार अपनी चुनावी सभाओं में कहते थे कि वह अमरीकी सैनिकों को स्वदेश वापस बुलाएंगे। डोनाल्ड ट्रम्प अमरीका के राष्ट्रपतियों पर अकारण युद्ध और भारी खर्चा करने का आरोप लगाते और कहा करते थे कि इस प्रकार के युद्धों से लाभ के बजाए अमरीकी हितों को नुक़सान पहुंचा है। ट्रम्प को अच्छी तरह से मालूम था कि अमरीकी जनता, सैनिकों के बारे में संवेदनशील है और मध्य पूर्व व फार्स की खाड़ी में अमरीकी सैनिकों की मौत की खबर से जनता में बेचैनीअमरीकी जनता, सैनिकों के बारे में संवेदनशील है और मध्य पूर्व व फार्स की खाड़ी में अमरीकी सैनिक फैलती है। इसी लिए ट्रम्प ने केवल चुनावी लाभ के लिए अमरीकी सैनिकों की वापसी की बातें की थी और राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प ने इसी विचार को सही सिद्ध किया। आज वह इस इलाक़े और विशेषकर इराक़ से किसी भी दशा में निकलना नहीं चाहते क्योंकि आर्थिक दृष्टि से अमरीका के लिए इस इलाक़े में रहना ज़रूरी है क्योंकि इस तरह से वह एक तो क्षेत्र की ऊर्जा की आवाजाही पर नियंत्रण रखता है और दूसरे उसे इराक़ के तेल में अपना हिस्सा भी चाहिए।

वैसे यह कोई नयी रणनीति नहीं है, अमरीका बरसों से ऊर्जा को केन्द्र बना कर इस क्षेत्र के लिए रणनीतियां तैयार करता रहा है। भले ही ट्रम्प यह कहते हों कि उन्हें फार्स की खाड़ी के तेल की कोई ज़रूरत नहीं और आंकड़ों से भी पता चलता है कि इस इलाक़े से अमरीका ने तेल आयात काफी कम कर दिया है लेकिन सारी कहानी यही नहीं है। अमरीकी, तेल के बाज़ार में उथल पुथल को अपने लिए हानिकारक समझते हैं दूसरी तरफ, वह अपना वर्चस्व बनाए रखना भी चाहते हैं। अमरीकी यह नहीं चाहते कि इस क्षेत्र में अपनी 40 साल की भूमिका को यूंही गवां दें इसी लिए अपना प्रभाव बनाए रखना भी अमरीका के लिए ज़रूरी है।

वास्तव में अमरीका ने विश्व की ऊर्जा की सुरक्षा को अपने हितों से जोड़ रखा है और इसके साथ ही तेल से समृद्ध देशों की आमदनी पर भी उसकी नज़र है। यह सब कुछ पहले ढंके छुपे रूप में होता था अब ट्रम्प उसे खोल कर बयान करते हैं और कहते हैं कि सऊदी अरब उस  दूधारु गाय  की तरह है जिसका दूध खत्म हो जाने के बाद काट कर खा लिया जाता है। हालांकि सारे अमरीकी राजनेताओं का यही मानना है लेकिन वह निजी बैठकों में भी इस बात को ज़बान पर नहीं लाते थे लेकिन ट्रम्प ने खुल कर वाइट हाउस की नीतियों और सोच कर दुनिया के सामने पेश कर दिया।  वह सऊदी अरब और फार्स की खाड़ी के अन्य देशों से कहते हैं कि वह अपनी सुरक्षा की क़ीमत अदा करें। अमरीका इराक़ से भी इसी तरह की वसूली चाहता है, ट्रम्प ने इराक की तेल की आमदनी का आधा भाग लेने के लिए बगदाद पर बहुत दबाव भी  डाला  लेकिन ईरान पर उसका बस नहीं चल रहा है, ईरान से अमरीका की दुश्मनी की सब से बड़ी वजह यही है।  

ट्रम्प अपने सभी दावों के बावजूद इलाक़े से अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाने पर तैयार नहीं हैं। ट्रम्प की नीति भी वही है जो उनसे पहले के अमरीकी राष्ट्रपतियों की रही है लेकिन ट्रम्प की बदक़िस्मती यह है कि अब इस इलाक़े के हालात वैसे नहीं हैं जैसे उनके पहले के अमरीकी राष्ट्रपतियों के काल में थे। Q.A.  

 

 

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