Feb १३, २०२० १८:३० Asia/Kolkata
  •  धीमी आंच, खतरनाक साज़िश, यहूदियों के प्रति इस्लामी नज़रिये में बदलाव कर रहा है सऊदी अरब!

कहते हैं धीमी आंच पर जो खाना पकाया जाता है वह अधिक स्वादिष्ट और ज़्यादा अच्छी तरह से गला हुआ होता है। इसी हर धीमी भाप, भाप के इंजन से चलने वाले पानी के जहाज़ों के लिए प्रयोग की जाती है लेकिन जो मज़बूती होती है उससे यही समझा जाता है कि बहुत सी जगहों पर तेज़ी से अधिक धीमेपन की ज़रूरत होती है।

           अमरीका की द हील पत्रिका में प्रकाशित होने वाले एक आलेख में जेम्स ज़ोम वॉल्ट ने कुछ चौंका देने वाली बाते लिखी हैं। हील पत्रिका को कांग्रेस से निकट माना जाता है। इस आलेख में बताया गया है कि सऊउ अरब धीमी गति के सिद्धान्त पर इस्लामी शिक्षाओं को बदल रहा है ताकि पश्चिमी एशिया में स्थिरता पैदा की जा सके।

    

     लेखक ने बताया है कि सऊदी अरब किस तरह से इस्लामी शिक्षाओं में अपने हिसाब से नरमी लाने की कोशिश कर रहा है और जो लोग इस्लामी जगत की घटनाओं पर नज़र रखते हैं उनके सामने यह हक़ीक़त छुपी हुई नहीं है।

अमरीका में सऊदी राजदूत

 

ज़ोम वॉल्ट लिखते हैं कि 2019 में मई के महीने में रियाज़ ने " मक्का घोषणापत्र" जारी किया जो निश्चित रूप से कैथोलिक ईसाइयों से चर्च के गेट पर लिखे गये उन सिद्धान्तों की याद दिलाता है जो बदलाव के लिए चेतना के उद्देश्य से लिखे जाते हैं।

रियाज़ सम्मेलन में दुनिया के 139 देशों के 1200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था जो सब के सब बदलाव को लागू करने का प्रयास करते नज़र आए। इसके साथ ही यह भी संदेश देने की कोशिश की गयी कि इस्लामवाद, इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करता और पहली बार इस सम्मेलन में यह सब के लिए मानवाधिकार को समान रूप से स्वीकार किया गया जबकि इस से पहले यह कहा जाता था कि मुसलमान, पूरी दुनिया में सब श्रेष्ठ हैं।

रियाज़ घोषणापत्र में विभिन्न धर्मों को औपचारिकता दी गयी है और यह कहा गया है कि विविधता, विवाद का कारण नहीं, कहा जाता है कि सऊदी अरब ने इस घोषणापत्र द्वारा मुसलमानों और गैर मुस्लिमों को एक ही पोज़ीशन में स्वीकार करने की बात की है। यह दुनिया के डेढ़ अरब से अधिक मुसलमानों की विचरधारा बदलने की एक कोशिश भी है।

 

ज़ोम वॉल्ट ले लिखा है कि सऊदी अरब वास्तव में अधर्मियों और विशेष कर यहूदियों के प्रति मुसलमानों का नज़रिया बदलने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसकी यह कोशिश, धीमी आंच पर पकाने वाली शैली में की जा रही है ताकि इस्लामी जगत में यहूदियों को पक्की स्वीकारोक्ति मिले। इसकी एक मिसाल, होलोकास्ट की याद में आयोजित कार्यक्रम में सऊदी अरब का शामिल होना है।

ज़ोम वॉल्ट ने अपने इस लेख में दावा किया है कि अधिकांश मुस्लिम, यहूदियों से नफरता करते हैं और उनकी यह नफरत , ईश्वरीय दूत हज़रत मुहम्मद के ज़माने से चली आ रही है लेकिन इस्लामी जगत के नेता, विशेषकर सऊदी अरब में रहने वाले नेता, इस्लामी जगत में यहूदियों को मुस्लिमों ज़ैसी और समान पोज़ीशन दिलाने का प्रयास कर रहे हैं।

लेखक ने इसके लिए होलोकास्ट देखने गये सऊदी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख के उस नोट का भी उल्लेख किया है जिसमें उन्होंने लिखा थाः होलोकास्ट को देखना, पवित्र कर्तव्य और बड़ा गौरव है। इसके बाद उन्होंने झुक कर उन सभी यहूदियों के लिए दुआ की जो इस स्थान पर मारे गये। Q.A. लेखक के विचारों से सहमति होना आवश्यक नहीं। साभार, अलकुद्सुलअरबी, लंदन

 

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