Feb १४, २०२० १२:१७ Asia/Kolkata
  • क्या वाक़ई अर्दोग़ान दमिश्क़ पर क़ब्ज़ा करने और बश्शार असद को हटाने की सलाह मानेंगे? नैटो ने किस तरह तुर्कों की पीठ में छुरा घोंपा?

अब्दुल बारी अतवान का विशलेषणः तुर्क राष्ट्रीय आंदोलन संगठन के नेता दौलत बहिश्त अली लगता है कि 21वीं शताब्दी नहीं बल्कि 15वीं शताब्दी में जीवन गुज़ार रहे हैं।

उन्होंने तुर्क सेना को सलाह दी कि वह तत्काल दमिश्क़ की ओर प्रस्थान करे, इस शहर पर क़ब्ज़ा करके राष्ट्रपति बश्शार असद को सत्ता से हटा दे और उनके महलों को ध्वस्त कर दे क्योंकि सीरियाई सेना ने तुर्की के 13 सैनिकों को मार दिया है।

दौलत बहिश्त अली तुर्क राष्ट्रपति अर्दोग़ान के घटक समझे जाते हैं। उन्होंने सीरियाई राष्ट्रपति पर हमला करने के साथ ही रूस को भी निशाना बनाया और कहा कि तुर्की को चाहिए कि रूस से अपने संबंधों पर पुनरविचार करे।

रूसी विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया दिखाई और तुर्क सरकार से कहा कि इस तरह की बयानबाज़ी पर अंकुश  लगाए। सवाल यह है कि अगर तुर्क सेना के पास यह ताक़त होती कि वह दमिश्क़ पर क़ब्ज़ा करके राष्ट्रपति बश्शार असद की सरकार गिरा दे तो वह 9 साल तक प्रतीक्षा क्यों करती? बहिश्त अली को पता ही नहीं है कि ज़मीन पर ताक़त का संतुलन पूरी तरह बदल चुका है और अब नए समीकरण सामने हैं। देश के 80 प्रतिशत भाग को आज़ाद कराने के बाद सीरियाई सेना ने कुछ ही दिनों के भीतर इदलिब के आसपास 600 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़ा चरमपंथियों के क़ब्ज़े से छुड़ा लिया जिसमें चार स्ट्रैटेजिक शहर भी शामिल हैं।

यह महसूस होता है कि बहिश्त अली जैसे तुर्क नेता बल्कि शायद ख़ुद राष्ट्रपति अर्दोग़ान भी किसी और दुनिया में जीवन व्यतीत कर रहे हैं क्योंकि उन्हें ज़मीनी सच्चाई की कोई ख़बर ही नहीं है।

अमरीकी युद्ध मंत्री मार्क इस्पर जो तुर्की को उकसा रहे थे कि इदलिब और आसपास के इलाक़ों में सीरियाई सेना की प्रगति को रोक दे और कह रहे थे कि उनका देश तुर्की की योजनाओं का समर्थन करता है, अब साफ़ साफ़ कह रहे हैं कि वह तुर्की को कोई सैनिक मदद नहीं देंगे। इसका मतलब यह है कि तुर्की ने अगर नैटो से आस लगाई थी तो उसने बहुत बड़ी भूल की थी। शायद स्थिति का आभास हो जाने की वजह से राष्ट्रपति अर्दोग़ान और उनके रक्षा मंत्री ख़लूसी आकार ने अपने घटक चरमपंथी संगठन अन्नुस्रा फ़ंट पर दबाव डालना शुरू कर दिया है कि वह संघर्ष विराम का पालन करे क्योंकि रूस ने यह मांग रखी है।

सीरियाई सेना इदलिब के इलाक़े में लड़ रही है और चरमपंथियों के नियंत्रण से अपने इलाक़ों को आज़ाद करा रही है तो यह उसका अधिकार है जबकि इस इलाक़े में तुर्क सैनिकों की उपस्थिति ग़ैर क़ानूनी है और देर या जल्दी इस ग़ैर क़ानूनी सैनिक उपस्थिति को समाप्त होना है।

हम केवल बहिश्तअली नहीं बल्कि राष्ट्रपति अर्दोग़ान को भी आख़िरी नसीहत यही करेंगे कि धमकीपूर्ण बयान देना बंद करें और राष्ट्रपति असद को सत्ता से हटाने के ख़्वाब न देखें क्योंकि यह संभव नहीं है। अब तो अर्दोग़ान के घटकों को भी इस तरह की बातों पर विश्वास नहीं रह गया है।

अर्दोग़ान की नीतियों को लेकर अब तुर्की के भीतर भी असंतोष पैदा हो रहा है। तुर्की के साइप्रस इलाक़े के नेता मुसतफ़ा ओकिंजी तो साइप्रस के पूरे इलाक़े को एकजुट करने की बात करने लगे हैं और अर्दोग़ान की धमकी का उन पर कोई असर नहीं हुआ है। मतलब यह है कि तुर्क सरकार के सामने अब भीतरी समस्याएं गंभीर रूप से सिर उभार रही हैं।

 

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