Feb २७, २०२० १८:५९ Asia/Kolkata
  • इदलिब में हम मेहमान नहीं मेज़बान हैं, अर्दोगान। वह युद्ध जिसे तुर्की शुरू होने से पहले ही हार चुका था, पढ़िए एक विश्लेषण

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान ने सीरियाई प्रांत इदलिब में आतंकवादी गुटों की सहायता के लिए मौजूद अपने सैनिकों को बाहर निकालने से इनकार कर दिया है।

केवल इतना ही नहीं बल्कि तुर्क राष्ट्रपति ने सीरियाई सैनिकों को अपनी ही भूमि उत्तरी सीरिया से निकलने के लिए अल्टीमेटम भी दे रखा है, जहां तुर्क सेना ने ग़ैर क़ानूनी रूप से चौकियां बना रखी हैं।

अर्दोगान का कहना था कि हम इदलिब से पीछे नहीं हटेंगे। इस इलाक़े में हम मेहमान नहीं हैं,  बल्कि हम मेज़बान हैं।

उन्होंने दमिश्क़ सरकार को धमकी देते हुए कहा कि वह इदलिब में अपने हमले रोक दे।

तुर्क राष्ट्रपति का कहना था कि अंकारा ने दमिश्क़ को इदलिब से अपने सैनिकों को निकालने के  लिए इस महीने के आख़िर तक का अल्टीमेटम दे रखा है और समय बहुत तेज़ी से गुज़रता जा रहा है।

अर्दोगान ने कहा कि इदलिब में कोई भी सख़्त कार्यवाही से पहले उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का समर्थन हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन ट्रम्प ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है। ऐसा लगता है कि हमें उनके साथ इस समय एक और मुलाक़ात करना होगी।

ग़ौरतलब है कि इदलिब पर क़ब्ज़ा करने की तुर्की की योजना के क्षेत्र पर एक बार फिर गंभीर परिणाम सामने आयेंगे और अंकारा की इस इच्छा ने उसे मास्को के रूबरू लाकर खड़ा कर दिया है।

उत्तरी सीरिया में अपनी नीतियों के कारण, तुर्की दुनिया में अलग थलग पड़ता जा रहा है। इस मुद्दे को लेकर जहां अमरीका से उसका पहले से ही टकराव चल रहा था, अब रूस से भी रिश्तों में खटास आती जा रही है। यूरोप और अरब जगत में वह पहले ही से अलग थलग पड़ा हुआ है।

अर्दोगान के पास चलने के लिए बस एक ही चाल बची थी, जिसे कामयाबी से चलने की वह बहुत कोशिश कर रहे थे, लेकिन उसमें सफल नहीं हो सके हैं। उनका प्रयास था कि उत्तरी सीरिया में वह रूस और अमरीका को एक दूसरे के मुक़ाबले में लाकर खड़ा कर दें।

अंतरराष्ट्रीय मामलों में अर्दोगान की समझ और कूटनीतिक बारीकियों की परख पर अब उनके कट्टर समर्थक भी शक करने लगे हैं।

अर्दोगान के कुछ पूर्व समर्थकों समेत तुर्की के अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि सीरिया में अंकारा ख़ुद को जिस स्थिति में फंसा हुआ देख रहा है, वह काफ़ी हद तक अर्दोगान के ग़लत आंकलन और नीतियों का परिणाम है।

तुर्की ने जो ग़लती उत्तरी सीरिया में दोहराई है, वही ग़लती लीबिया में अपने सैनिक तैनात करके दोहराई है।

अभी सिर्फ़ चार महीने ही गुज़रे हैं, जब अर्दोगान ने उत्तरी सीरिया में अमरीका समर्थित कुर्द मिलीशिया वाईपीजी के ख़िलाफ़ पीस स्प्रिंग ऑप्रेशन शुरू किया था और उत्तरी सीरिया में सैन्य चौकियों की स्थापना की थी।

उसी समय, तुर्की ने रूस के साथ रणनीतिक संबंधों को मज़बूत बनाने की ओर क़दम बढ़ाया था।

अंकारा को उम्मीद थी कि रूस के साथ मज़बूत रिश्तों से पश्चिम और अमरीका के ख़िलाफ़ एक संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।

अर्दोगान ने पश्चिमी और अमरीका से अपने संबंधों की क़ीमत पर रूस से मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम एस-400 ख़रीदा।

लेकिन पुतिन को असद के ख़िलाफ़ खड़ा करने का प्रयास करना और यह समझना कि मास्को, दमिश्क़ के मुक़ाबले में अंकारा को वरीयता देगा, अर्दोगान की एक बड़ी भूल साबित हुई।

तुर्क राष्ट्रपति अब रूस पर ही आरोप लगा रहे हैं, जो उत्तरी सीरिया में तुर्की की सैन्य कार्यवाही को आक्रामक क़रार देकर इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन बता रहा है।

रूस से निराश होकर अर्दोगान ने एक बार फिर अमरीका का दरवाज़ा खटखटाया है और उससे रूस और सीरिया के ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए सीमा पर पैट्रियट मिसाइल तैनात करने की गुहार लगाई है।

तुर्की ने अमरीका से यह मांग ऐसी स्थिति में की है कि जब उसके पास रूस से ख़रीदा गया एस-400 सिस्टम है, जो हर तरह से अमरीकी एयर डिफ़ेंस सिस्टम से बेहतर साबित हुआ है।

लेकिन क्या तुर्की ख़ुद रूस के ख़िलाफ़ इसका इस्तेमाल करने का साहस रखता है और रूस के ख़िलाफ़ उसका ही बनाया गया सिस्टम कितना कारगर होगा यह सवाल अपनी जगह हैं।

उत्तरी सीरिया में पिछले एक महीने के दौरान तुर्की अब तक 19 से अधिक अपने सैनिकों को खो चुका है, जिनमें से कुछ की जान रूसी हवाई हमलों में गई है।

ऐसा अनुमान है कि आने वाले दिनों में मरने वाले तुर्क सैनिकों की संख्या में और अधिक बढ़ोतरी होगी, इसलिए कि अर्दोगान उस दलदल में फंसने का इरादा कर चुके हैं, जिसे विपक्ष ग़ैर की लड़ाई क़रार दे रहा है।

तुर्की के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक फ़करेट बिला का मानना है कि यह एक ऐसा युद्ध है, जिसे अर्दोगान जीत नहीं सकते। सीरिया में तुर्की का मुख्य उद्देश्य असद शासन को ख़त्म करना और कट्टरपंथियों की आवाज़ की रक्षा करना था।

लेकिन सीरियाई सेना को पराजित करना, जिसका समर्थन रूस कर रहा है, तुर्की के लिए संभव नहीं है।

इसलिए निश्चित रूप से यह बात कही जा सकती है कि 2011 से तुर्की ने सीरिया के संबंध में जो भी नीति अपनाई है और उसमें जो भी बदलाव किए हैं, उनका परिणाम अर्दोगान की पराजय और तुर्की के कमज़ोर होने के अलावा कुछ नहीं निकलेगा। msm

टैग्स

कमेंट्स