Feb २७, २०२० १९:५४ Asia/Kolkata
  • किसी फ़िल्म की पटकथा जैसी घटना, लेबनानी युवा को 35 साल बाद इराक़ में मिला अपना परिवार!

एक लेबनानी युवा के साथ अजीब घटना हुई जो असली जीवन की घटना से बढ़कर फ़िल्म की पटकथा प्रतीत होती है।

35 साल से अधिक लंबी तलाश के बाद लेबनानी युवा मुहम्मद दाऊद अहमद को इराक़ के करकूक प्रांत में अपना परिवार मिला।

40 साल के मुहम्मद दाऊद अहमद के जीवन में पीड़ा का दौर तब शुरू हुआ जब 1986 में लेबनान के गृह युद्ध में उनके पिता मारे गए। उस समय मुहम्मद दाऊद अहमद की उम्र छह साल थी। अब वह अपनी दो साल छोटी बहन तथा मां के साथ बेहद कठिन जीवन गुज़ारने पर मजबूर थे।

मुहम्मद दाऊद अहमद के पिता दाऊद अहमद 1970 के दशक में इराक़ से बैरूत गए थे और वहां उन्होंने 1979 में ख़दीजा नाम की लेबनानी लड़की से शादी कर ली और लेबनान में ही रहने लगे। इराक़ में अपने घरवालों और रिश्तेदारों से उनका संबंध केवल पत्रों तक सीमित हो गया। इस्राईली सेना  ने 1983 में दऊद को गिरफ़तार कर लिया और और 1984 तक उन्हें क़ैद में रखा। जब वह जेल से छूटे तो दो ही साल बाद 1986 में उनकी मौत हो गई। दाऊद की मौत के बाद उनकी पत्नी ने इराक़ में उनके परिजनों से संपर्क करने की बड़ी कोशिश की लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

दाऊद अहमद 1986 में लेबनान के गृह युद्ध में मारे गए

 

धीरे धीरे मुहम्मद बड़ा हुआ और उसने इराक़ में अपने पिता दाऊद के घरवालों को खोजना शुरू किया। मुहम्मद का कहना है कि उन्हें कई इराक़ियों ने धोखा भी दिया, उनसे मदद का वादा किया और पैसे भी लिए लेकिन कोई मदद नहीं की। मैंने कई बार बैरूत में इराक़ी दूतावास से संपर्क किया लेकिन चूंकि इस्राईली जेल में क़ैद रहने के दौरान दाऊद के सारे काग़ज़ात नष्ट हो गए थे अतः मुहम्मद के पास दूतावास में दिखाने के लिए कोई काग़ज़ात नहीं थे।

35 साल जारी रहने वाली तलाश के बाद मुहम्मद दाऊद अहमद को फ़ेसबुक पर करकूक का एक सामाजिक कार्यकर्ता मिला जिसका नाम नब्ज़ हमावंदी था। मुहम्मद ने उससे अपनी पूरी कहानी बताई और मदद की दरख्वास्त की।

सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि मुहम्मद ने अपने पिता के जीवन के बारे में बताया और उसने इराक़ में अपने रिश्तेदारों को खोजने के लिए कितनी मेहनत की तो मैंने मुहम्मद से कहा कि तुम अपने पिता का पूरा नाम और तसवीर भेजो। मैंने वो तसवीर अपने फ़ेसबुक पेज पर डाली तो दो घंटे भी नहीं गुज़रे थे कि अचानक मुझे फ़ोन आया। मैंने फ़ोन उठाया तो देखा दूसरी ओर कोई महिला थी। उसने पूछा कि तुमने मेरे भाई की तसवीर और उनका नाम अपने फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट किया है जो पिछले 35 साल से लापता है।

करकूक में मुहम्मद को अपने पिता के रिश्तेदार मिले

 

सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि मैंने अपने तौर पर जब सारी जानकारियों की पुष्टि कर ली तो बैरूत में लेबनानी युवा मुहम्मद को फ़ोन किया और उसके पिता के घरवालों से उसकी बात करवा दी। एक हफ़्ते के भीतर मुहम्मद बैरूत से करकूक पहुंच आया। कार्यकर्ता का कहना है कि जब परिवार के बिछड़े हुए सदस्य एक दूसरे से मिले तो अजीब वातावरण बन गया  वह लोग तो रो ही रहे थे मैं भी अपने आंसू नहीं रोक सका। एसा लगा जैसे कोई फ़िल्म चल रही है।

मुहम्मद की छोटी बहन मीसा का कहना है कि पिता के भाइयों बहनों और अन्य रिश्तेदारों से हमारी मुलाक़ात किसी चमत्कार से कम नहीं है।

(इनपुट अलजज़ीरा डाट नेट से)

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