Apr ०५, २०२० ०८:३६ Asia/Kolkata
  • क्यों कोरोना से भी ज़्यादा घातक है सऊदी अरब और रूस का तेल युद्ध? हमें क्यों लगता है कि आख़िरकार रूस और अमरीका एक होकर सऊदी अरब पर टूट पड़ेंगे!

इन दिनों सऊदी नेतृत्व ख़ुद को एक साथ कई जंगों में उलझा हुआ पा रहा है और इनमें सबसे बड़ी लड़ाई कोरोना के ख़िलाफ़ है क्योंकि इस वायरस के कारण तेल की बिक्री और क़ीमत बहुत कम हो गई है और बाज़ारों में उथल पुथल है।

एक अंग्रेज़ी कहावत है कि जब तुम गढ़े में गिर जाओ तो पहला काम यह करो कि खोदना बंद कर दो। मगर लगता है कि सऊदी नेतृत्व को इस कहावत के बारे में पता नहीं है और अगर पता है तो वह ज़िद में इसके उलट काम कर रहा है।

सऊदी अरब इस समय एक गढ़े में नहीं बल्कि कई गढ़ों में गिरा हुआ हैं। यमन युद्ध से लेकर तेल युद्ध तक आप देख लीजिए जिसकी आग सऊदी अरब ने भड़काई है। सऊदी अरब ने रूस से इंतेक़ाम लेने के लिए तेल की मंडियों में तेल की भरमार कर दी और रूस ने अमरीका की शेल आयल कंपनियों को दीवालिया कर देने के लिए मांग से ज़्यादा तेल का उत्पादन किया।

हमारी समझ में यह नहीं आ रहा है कि एक साथ दो ताक़तवर देशों से आज के हालात में जंग करने का क्या तुक है? इस समय आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर हालात अज्ञात दिशा में जा रहे हैं। इन हालात में तेल की क़ीमतों के 20 डालर प्रति बैरल से भी कम हो जाने का मतलब है सऊदी अरब की आमदनी में भारी कमी और बड़ा बजट घाटा। सऊदी अरब को 50 अरब डालर का बजट घाटा हो चुका है और साल पूरा होने तक यह घाटा 120 अरब डालर का हो जाएगा क्योंकि सऊदी अरब ने 55 डालर प्रति बैरल की क़ीमत के आधार पर अपना बजट बनाया था।

समस्या यह है कि इस लड़ाई के चलते केवल सऊदी अरब को नहीं बल्कि ओपेक में शामिल या उससे बाहर सारे तेल उत्पादक देशों को नुक़सान पहुंच रहा है। इनमें अलजीरिया, लीबिया, नाइजेरिया, ओमान, बहरैन, क़तर, कुवैत, इमारात सब शामिल हैं अलबत्ता रूस इससे अपवाद है।

तेल उत्पादक अरब देशों ने जो सावरेन फ़ंड या संप्रभु कोष बनाया था और जो पूंजीनिवेश का गौरव माना जाता था उसे सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंच रहा है क्योंकि यह कोष सिमटता जा रहा है क्योंकि उसमें रखी गई रक़म बजट घाटे के कारण लगातार निकाली जा रही है साथ ही शेयर बाज़ारों में उसके शेयरों की क़ीमत भी कुछ महीनों में आधी होकर रह गई है।

सऊदी अरब में बड़े फ़ैसले करने वालों की समझ में यह बात क्यों नहीं आती कि रूस की जीडीपी में केवल 16 प्रतिशत हिस्सा तेल का है जबकि सऊदी अरब की जीडीपी का 90 प्रतिशत भाग तेल पर आधारित है।

सऊदी अरब ने बहुत ग़लत समय में तेल का युद्ध छेड़ा है, इससे ओपेक का वजूद ख़त्म हो जाएगा और सबसे ज़्यादा नुक़सान सऊदी अरब को पहुंचेगा।

हमें तो यह भी लगता है कि आख़िरकार रूस और अमरीका अपना अलग तेल संगठन बना लेंगे जिसमें सऊदी अरब और कुछ अन्य अरब देशों की कोई जगह नहीं होगी।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

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