May २९, २०२० १७:४४ Asia/Kolkata
  • क्या ट्रम्प अब भी ईरान पर हमले की सोच रहे हैं?   हमला हुआ तो क्या होगा?  अलअरबी अलजदीद ने दिया इस सवाल का जवाब

अरब पत्रकार एसाम अब्दुश्शाफी ने लंदन से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र अलअरबी अलजदीद में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि हालिया महीनों में कई घटनाएं ऐसी घटी हैं जिनसे यह अंदाज़ा हो रहा था कि ईरान और अमरीका के बीच टकराव हो जाएगा लेकिन क्या अब भी वही स्थिति है या कोई बदलाव आया है?     

 

     हालिया कुछ महीनों में अमरीका ने बहुत सी एसी हरकतें की हैं जिनसे यह लगने लगा था कि वह ईरान के खिलाफ कुछ कार्यवाही करने का मन बना चुका है। अमरीका ने ईरान के प्रसिद्ध व ताक़तवर जनरल, जनरल क़ासिम सुलैमानी की एक हमले में हत्या कर दी, इसके साथ ही उसने इराक़ में ईरान के समर्थक स्वंय  सेवी बल के ठिकानों पर हमले किये और इराक़ में उन क्षेत्रों से अपनी छावनी खाली कर दी जहां ईरान या उसके समर्थक सगंठनों की पहुंच आसान था। अमरीका ने अलअंबार में अलअसद और अरबील में अलहरीर छावनियों में अपने सैनिकों को एकत्रित कर लिया और इस इलाक़े में पेट्रियोट मिसाइल सिस्टम भी लगा दिया।

     इन सब क़दमों के दौरान अचानक ही अमरीका ने एलान किया कि वह सऊदी अरब से अपने पेट्रियोट मिसाइल सिस्टम को हटा रहा है। इसके लिए अमरीका ने यह कारण बताया कि अब ईरान, बड़ा खतरा नहीं रह गया है इस लिए सऊदी अरब में पेट्रियोट मिसाइल सिस्टम की ज़रूरत नहीं है लेकिन मामला इसके उलट है। अस्ल बात यह है कि अमरीका को यह  डर लग रहा था कि कहीं ईरान उसके पेट्रियोट मिसाइल सिस्टम को ही न निशाना बना दे जिसकी वजह से इस मिसाइल डिफेंस सिस्टम की मार्केंटिंग में समस्याएं उत्पन्न हो जांएगीं इसी लिए उसने सऊदी अरब से इस सिस्टम को हटाने का फैसला किया और इस फैसले के पीछे अमरीका और सऊदी अरब में मतभेद  या अमरीका की तरफ से सऊदी अरब को सज़ा देने जैसी कोई बात नहीं है।

दूसरा दूसरा चिन्ह यह है कि चूंकि कोरोना की वजह  से ईरान को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा है इसके अलावा तेल के संकट ने भी सऊदी अरब और रूस के साथ  ही साथ ईरान को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है इस लिए ईरान फिलहाल टकराव नहीं चाहता।

     तीसरा चिन्ह यह है कि कोरोना की वजह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार कम हो गया है इस लिए हुरमुज़ स्ट्रेट का वह महत्व नहीं रह गया जबकि पहले यह रास्ता ईरान के हाथ में इलाक़े के अरब देशों की गर्दन की तरह था।

     चौथी बात यह कि हो सकता है कि अमरीका फार्स की खाड़ी के देशों के और खास तौर पर सन 2017 में क़तर की घेराबंदी के संकट को खत्म करना चाहता है ताकि पूरे इलाक़े को ईरान के खिलाफ एकजुट किया जा सके।

 

     पांचवी बात यह कि कुछ लोग यह समझते हैं कि ईरान आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है जिसकी एक वजह तेल की कीमत है कोरोना का संकट है इसी तरह उसे सीरिया व इराक व रूस की ओर से भी चिंताओं का सामना है।

     इन हालात और अनुमानों की वजह से बहुत से लोगों को यह लगता है कि अमरीका ईरान के खिलाफ सैन्य कार्यवाही का फैसला कर चुका है और इसकी भी वह कई वजहें बताते हैं।

     पहली वजह तो यह है कि अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और कोरोना के समय में ट्रम्प सरकार की कार्यशैली की वजह से राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की पोज़ीशन काफी कमज़ोर हुई है इसी लिए वह अमरीका के भीतर का संकट बाहर भेजने की कोशिश कर रहे हैं इस तरह से अगर वह एक सैन्य कार्यवाही करते हैं तो इससे वह अपने दुश्मन यानि ईरान के साथ अमरीकी जनता को अपने साथ मिला कर राष्ट्रपति चुनाव में जीत निश्चित बना सकते हैं।

     इसके अलावा यह भी एक सच्चाई है कि ईरान के सभी पड़ोसी देशों में अमरीका की छावनियों  मौजूद हैं और उसके युद्धपोत ईरान की समुद्री सीमा के आस पास मंडराते रहते हैं।

     ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के बजट की भी अमरीका को चिंता नहीं है क्कि फार्स की खाड़ी के अरब देश ईरान के खिलाफ कार्यवाही के लिए अमरीका को इस तरह के किसी भी युद्ध का खर्चा देने पर तैयार है। इस काम में सऊदी अरब और यूएई सब से आगे रहेंगे।

     यह भी हो सकता है कि कोई तीसरा पक्ष अमरीकी हितों पर हमला करे और उसका आरोप ईरान पर लगा दिया जाए ताकि अमरीका को ईरान के खिलाफ कार्यवाही का बहाना मिल सके जैसा कि अमरीकी इतिहास से पता चलता है कि वह कई देशों के खिलाफ और कई अवसरों पर यही हथंकडा इस्तेमाल कर चुका हैं।

     इस तरह  के अनुमान तो बहुत लगाए जा रहे हैं मगर यह भी सच्चाई है कि इन अनुमानों और चिन्हों का यह मतलब नहीं है कि निश्चित रूप से अमरीका व ईरान में  युद्ध हो ही जाएगा क्योंकि युद्ध का फैसला इतनी आसानी से नहीं  किया जाता लेकिन अगर ऐसा कुछ होता है तो यह बहुत से पक्षों और देशों के लिए भयानक होगा, मध्य पूर्व की हर सरकार को नुक़सान पहुंचेगा।

     ईरान के खिलाफ अगर कोई कार्यवाही हुई तो उसका असर संघर्षरत देशों या ईरान के पड़ोसियों  तक ही सीमित नहीं होगा बल्कि इस हमले का बहुत भयानक और व्यापक असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा और उसकी वजह भी  यही है कि ईरान का प्रभाव और नेटवर्क पूरी दुनिया में फैला हुआ है इसी लिए दुनिया के कई क्षेत्रों में भी सैन्य टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। Q.A. साभार अरअरबी अलजदीद, लंदन, पार्स टूडे का लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।

 

 

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