May ३१, २०२० १३:०८ Asia/Kolkata
  • सऊदी अरब की नीतियां इस्लाम और मुसलमान दोनों को नुक़सान पहुंचा रही हैं

सऊदी मीडिया आजकल हमास समेत फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधी संगठनों को आतंकवादी और ज़ायोनी शासन को अरबों का दोस्त साबित करने में दिन रात एक किए हुए है।

सऊदी अरब में तानाशाही तथा राजशाही व्यवस्था है, जहां मीडिया सिर्फ़ वही प्रोपैगंडा करता है, जो बादशाह चाहता है। इसलिए मीडिया सऊदी जनता को यही समझाने में अपनी पूरी ताक़त झोंके दे रहा है कि इस्राईल के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनियों का साथ देना रियाज़ की सबसे बड़ी भूल थी।

हालांकि दूसरे पड़ोसी अरब देशों की तरह सऊदी अरब ने कभी भी इस्राईल के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष में सीधे तौर पर भाग नहीं लिया है, लेकिन वह इस्राईल से तथाकथित शांति वार्ता और समझौते करने वाली फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी को फ़ंडिंग करता रहा है।

लेकिन महमूद अब्बास के नेतृत्व में फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी द्वारा वेस्ट बैंक को हड़पने की इस्राईली भूख और ट्रम्प की डील ऑफ़ द सेंचरी का विरोध करना सऊदी शासन को बिल्कुल नहीं भाया, और उसने फ़िलिस्तीनियों के इस धड़े से भी अपने रिश्ते तोड़कर उनकी हर प्रकार की सहायता बंद कर दी।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वहाबी सऊदी शासन अब खुलकर फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध इस्राईल और अमरीका के पाले में खड़ा है।

सऊदी अरब की इस्लाम और मुसलमान विरोधी इस नीति को सऊदी राष्ट्र के हित में क़रार देने के लिए पश्चिमी मीडिया की मदद से इस देश के मीडिया ने फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले हर देश और संगठन के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ रखा है।

हाल ही में पवित्र रमज़ान में विशेष सीरियलों का प्रसारण करके इस लक्ष्य को साधने की कोशिश की गई। इन सीरियलों में ज़ायोनियों को अरबों का दोस्त, जबकि उनके ख़िलाफ़ प्रतिरोध करने वालों को अरबों का दुश्मन बताया गया।

सऊदी अधिकारी बड़े पैमाने पर इस्लामोफ़ोबिया से ग्रस्त हैं। यही वजह है कि इस देश के सरकारी टीवी चैनल अल-अरबिया ने अमरीका और यूरोपीय देशों में स्थित मस्जिदों और इस्लामी केन्द्रों को मुस्लिम ब्रदरहुड तथा तुर्की के साथ जोड़कर उनके ख़िलाफ़ अभियान शुरू कर रखा है। इस अभियान के तहत यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि यह मस्जिदें और इस्लामी केन्द्र इन देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा हैं।

यूरोप में मुस्लिमानों की समस्त धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को अल-अरबिया द्वारा आतंकवादी गतिविधियों के रंग में रंगा जा रहा है। यहां तक कि नई दिल्ली, पेरिस और बर्लिन के दूर दराज़ इलाक़ों से कहीं ज़्यादा इस्लामोफ़ोबिया, अब सऊदी अरब के सत्ता के गलियारों में पनप रहा है।

इसी के साथ सऊदी शासन अपनी ग़लत नीतियों और लगातार पराजयों पर पर्दा डालने के लिए राष्ट्रवाद की लहरों पर सवार होने की कोशिश कर रहा है।

क्षेत्र में ईरान के सामने दाल नहीं गलने के कारण, इस सिद्धांत के तहत कि दुश्मन का दुश्मन, दोस्त है, सऊदी शाही परिवार पूरी तरह से तेल-अवीव की गोद में जा बैठा है। लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि किंग सलमान और प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह क़दम, उलटा भी पड़ सकता है और इस देश की जनता कभी भी विद्रोह कर सकती है। msm

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