Jun ०१, २०२० ०८:३१ Asia/Kolkata
  • सऊदी अरब के केस में कहां फ़ेल हुई अमरीकी इंटैलीजेन्स?

अमरीकी इंटैलीजेन्स और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडल ने 21 नवम्बर 2017 को वाशिंग्टन में ब्रोकिंग्ज़ थिंक टैंक की एक बैठक में बोलते हुए अमरीका और सऊदी अरब के संबंधों के बारे में चौंका देने वाले ख़ुलासे किए।

अमरीकी मैग्ज़ीन पोलिटिको ने विख्यात लेखक डगलस का एक लेख प्रकाशित किया है जिसमें लेखक का कहना है कि रीडल ने जो अलग अलग ओहदों पर रहते हुए 40 साल से सऊदी अरब के मामलों को देखते रहे हैं मध्यपूर्व में अमरीका के सबसे क़रीबी घटक के बारे में दो महत्वपूर्ण बिंदु बयान करने की कोशिश की।

एक तो यह कि सऊदी अरब में हालिया समय में बड़े चिंताजनक बदलाव आए हैं। सऊदी अरब की नीतियों में पहले स्थिरता थी मगर 2014 के बाद सऊदी अरब की नीतियां लगातार बदलने लगी हैं और उनके बारे में पहले से अनुमान लगाना संभव नहीं रह गया है।

दूसरा बिंदु यह था कि अमरीकी सरकार ने वर्तमान सऊदी नेतृत्व को अच्छी तरह समझे बग़ैर उसका भरपूर समर्थन करने का फ़ैसला कर लिया है। रीडल ने यहां तक कहा कि ट्रम्प प्रशासन ने सऊदी अरब को आंतरिक और विदेशी नीतियों के बारे में ब्लैंक चेक दे दिया है। इसका नतीजा यह है कि सऊदी अरब पर जुनून सवार हो गया है।

लेखक का कहना है कि मुहम्मद बिन सलमान को ट्रम्प प्रशासन ने उसी तरह स्वीकार कर लिया जिस तरह ओबामा सरकार ने मुहम्मद बिन नाएफ़ को अपना बेहद क़रीबी घटक मान लिया था। यानी सरकार ने अपना दृष्टिकोण केवल इंटैलीजेन्स एजेंसियों के इनपुट्स के आधार पर तैयार किया। इस प्रकार के दृष्टिकोण की बुराई यह होती है कि बहुत सी बेहद गंभीर कमियों को जानते हुए भी नज़रअंदाज़ किया जाता है।

अगर ग़ौर किया जाए तो बिन सलमान ने सत्ता में बिताए गए थोड़े से समय के भीतर ही सऊदी अरब को एक तरफ़ यमन युद्ध में फंसा दिया और दूसरी ओर वरिष्ठ पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या करवा दी। ऊर्जा के बाज़ार में अराजकता फैला दी और इसके साथ ही रूस और चीन से रिश्ते बढ़ाने के इशारे भी दिए।

अमरीका ने सऊदी अरब के मामले में हमेशा इंटैलीजेन्स की मदद से काम किया। यानी अमरीकी इंटैलीजेन्स ने सऊदी अधिकारियों के बारे में जानकारियां जुटाईं और उन्हीं के आधार पर सऊदी अधिकारियों को समझने की कोशिश की गई।

इस समय सऊदी अरब का शासन 84 साल के सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ के हाथ में हैं जो अकसर बीमार रहते हैं। हक़ीक़त में सत्ता मुहम्मद बिन सलमान के हाथ में है। इस हालत में बहुत ज़रूरी हो जाता है कि अमरीका सऊदी अधिकारियों के बारे में हर पहलू से जाने।

अमरीकी सीआईए ने हालिया वर्षों में सऊदी अरब के मामले में पेशेवर अंदाज़ में काम करने के बजाए राजनैतिक अंदाज़ में काम किया। यानी अपना मूड बना लिया तो उसके ख़िलाफ़ अगर कहीं कोई जानकारी मिली तो उसे नज़रअंदाज़ कर देना बेहतर समझा। यही राजनैतिक रवैए अब भी जारी है। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो की यह ख़बर सामने आ चुकी है कि उन्होंने अपने मंत्रालय के अधिकारियों को आदेश दिया कि वह सऊदी अरब के साथ आठ अरब डालर के हथियार सौदों के लिए अमरीकी कांग्रेस को ओवरटेक करने के तर्क तलाश करें।

वाइट हाउस के अधिकारियों के सामने इस समय एक ख़तरनाक और जटिल घटक है और उन्होंने यह तय किया है कि इस घटक के रवैए और गतिविधियों को नज़रअंदाज़ करेंगे और उसके संबंध में इंटेलीजेन्स एजेंसियों की सिफ़ारिशों पर ध्यान नहीं देंगे।

रीडल का कहना था कि उन्होंने बहुत लंबे समय तक इंटेलीजेन्स में काम किया है लेकिन जो रवैया ट्रम्प का है उसका कोई और उदाहरण उनके पास नहीं है।

यह भी उल्लेखनीय है कि शाह अब्दुल्लाह जब सऊदी अरब के नरेश थे तो उस समय अमरीकी इंटैलीजेन्स मुहम्मद बिन नाएफ़ का समर्थन करती थी और उसे आशा थी कि बिन नाएफ़ सऊदी अरब की बागडोर संभाल लेंगे। शायद इसी लिए वह जून 2017 में सऊदी शाही महल के भीतर होने वाली बग़ावत को भांप नहीं सकी जिसके नतीजे में बिन नाएफ़ हाशिए पर चले गए और बिन सलमान ने देश की बागडोर संभाल ली।

यही नहीं पिछले दो साल के दौरान बिन सलमान ने उन सारे मोहरों को हाशिए पर डाल दिया जिनसे अमरीकी इंटैलीजेन्स को उम्मीदें थीं। ट्रम्प ने बिन सलमान पर दांव लगाया है और इंटेलीजेन्स की सिफ़ारिशों को नज़रअंदाज़ किया हो तो अब देखना पड़ेगा कि ट्रम्प की यह रणनीति सफल रहती है या अमरीका को किसी बड़ी मुशकिल में फंसा देगी।

स्रोतः पोलिटिको

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