Jun ०१, २०२० ०९:१५ Asia/Kolkata
  • फ़िलिस्तीनोफ़ोबिया और इस्लामोफ़ोबिया से ग्रस्त सऊदी लेखक ने दुनिया से फ़िलिस्तीनियों का नामो-निशां ही मिटा डालने की मांग कर डाली

अरब जगत में एक नारा बहुत मशहूर रहा है, जिसके पक्ष और विपक्ष में काफ़ी कुछ लिखा और कहा गया है कि आले सऊद आले यहूद हैं।

लेकिन हालिया कुछ वर्षों के दौरान, इस्राईल के प्रति आले सऊद शासन का प्रेम और फ़िलिस्तीनियों से उनकी दुश्मनी खुलकर सामने आ गई है, जिससे यह बात साबित हो गई है कि भले से मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र भूमि हिजाज़ पर शासन करने वाला आले सऊद परिवार, मुसलमान हो, लेकिन उसकी नीतियां कभी भी इस्लाम और मुसलमानों के हित में नहीं रही हैं।

इस्लामी जगत में वहाबियत जैसी संकीर्ण विचारधारा का बीज बोकर आले सऊद शासन ने पैट्रो डॉलर पानी की तरह बहाकर मुसलमानों के बीच फूट, कट्टरवाद, आतंकवाद और बदमानी की फ़सल काटी और सीरत के नाम पर मुसलमानों का ऐसा हुलिया और स्वरूप पेश किया, जिसे देखकर किसी भी आम इंसान के दिमाग़ में मुसलमान की एक नकारात्मक तस्वीर उभरे और वह उससे बचने लगे।

फ़िलिस्तीनोफ़ोबिया और इस्लामोफ़ोबिया आले सऊद समर्थक वहाबियों की रग रग में ख़ून बनकर दौड़ने लगा है। हाल ही में एक सऊदी लेखक ने तो फ़िलिस्तीनियों की नस्ल मिटा देने तक की मांग कर डाली।

सऊदी लेखक रवाफ़ अल-सईन ने इस्राईली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू से मांग की है कि फ़िलिस्तीनियों का दुनिया से नाम व निशान मिटा दें।

यू-ट्यूब पर एक वीडियो जारी करके अल-सईन ने यह ग़ैर इंसानी, नस्लवादी और अनैतिक टिप्पणी करते हुए दावा किया था कि फ़िलीस्तीनी अरब नहीं हैं और उन्हें इस क्षेत्र में भूमि ग्रहण करने का कोई अधिकार नहीं है।

7 दशकों से ज़्यादा समय से ज़ायोनियों के अमानवीय अत्याचार और बदतरीन ज़ुल्म झेल रहे फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ अल-सईन की नफ़रत यहीं ख़त्म नहीं हुई, बल्कि उनकी ज़बान ने ज़हर उगलते हुए आगे कहाः मैं एक यहूदी के साथ रह सकता हूं, लेकिन फ़िलिस्तीनी के साथ नहीं। मैं एक यहूदी को अपने घर पर मेहमान के रूप में स्वीकार कर सकता हूं, लेकिन एक फ़िलिस्तीनी की मेज़बानी नहीं कर सकता।

इस्लाम जहां मज़लूमों के समर्थन और पीड़ितों के साथ खड़े होने पर सबसे ज़्यादा बल देता है, वहीं आज का मुसलमान धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से इतना अपरिपक्व हो गया है कि वह बुरे और भले और सही और ग़लत में अंतर ही नहीं कर पा रहा है। दुनिया भर के कितने ही मुसलमान ऐसे हैं, जो आले सऊद परिवार के झांसे में सिर्फ़ इसलिए आ जाते हैं, क्योंकि वह ख़ुद को इस्लाम के सबसे पवित्र दो धार्मिक स्थलों का संरक्षक होने का दावा करता है। जबकि अगर वे सिक्के के दूसरे रुख़ पर ध्यान दें और सच्चाई को सही से परखें तो उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि आले सऊद परिवार सेवक या संरक्षक नहीं, बल्कि ठेकेदार है जो इन धार्मिक स्थलों की इस्लामी पहचान मिटाने में लगा हुआ है और मुसलमानों की आस्था के साथ खिलवाड़ करता रहा है।

अब वक़्त आ गया है कि मुसलमान नींद से जागे और देखे कि दुनिया भर में जहां कहीं भी मुसलमानों के हित की बात होती है, सऊदी अरब उसके विपरीत ही क़दम उठाता है। अब चाहे वह भारतीय मुसलमान हों या कश्मीरी मुसलमान, तुर्की के मुसलमान हों या मिस्र के।

मुसलमानों को शक, संदेह और असमंजस की स्थिति से बाहर निकलना होगा और क़ौम के ग़द्दारों तथा पीड़ितों के मुक़ाबले में अत्याचारियों का साथ देने वालों से दूरी रखकर उन्हें अलग-थलग करना होगा। इसलिए कि यह आस्तीन के वह सांप हैं, जो सामने खड़े शक्तिशाली दुश्मन से कहीं ज़्यादा नुक़सान पहुंचाते हैं। msm

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